गरीब मोची ने अनजान मुसाफिर के फटे जूते मुफ्त में ठीक कर दिए, लेकिन कुछ साल बाद वही मुसाफिर उसके दरवाजे पर आया तो मोची की आंखें भर आईं...

 


बहुत पुराने समय की बात है। एक छोटे से कस्बे में रहीम नाम का गरीब मोची रहता था। वह बाजार के कोने में एक पुराने पेड़ के नीचे बैठकर लोगों के जूते सिलता था। उसकी कमाई इतनी कम थी कि कई बार उसे अपने परिवार के लिए दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो जाता था।

एक दिन सर्दियों की शाम को एक थका हुआ मुसाफिर उसके पास आया। उसके कपड़े धूल से भरे थे और जूते बुरी तरह फट चुके थे।

मुसाफिर ने पूछा, “भाई, इन जूतों को ठीक करने में कितने पैसे लगेंगे?”

रहीम ने जूते देखे और बोला, “दो सिक्के लगेंगे।”

मुसाफिर ने अपनी जेब टटोली, लेकिन उसमें एक भी सिक्का नहीं था। वह उदास होकर बोला, “भाई, मेरे पास अभी पैसे नहीं हैं। मुझे दूसरे गांव पहुंचना है। क्या तुम इन्हें थोड़ी देर के लिए बांध सकते हो?”

रहीम ने उसके थके हुए चेहरे की ओर देखा। फिर बिना कुछ पूछे उसे बैठने का इशारा किया। उसने पुराने चमड़े का एक टुकड़ा निकाला, जूते की सिलाई ठीक की और तलवे को मजबूती से जोड़ दिया।

काम पूरा होने पर मुसाफिर ने पूछा, “तुम्हारे पैसे कितने हुए?”

रहीम मुस्कुराकर बोला, “आज की मजदूरी समझकर छोड़ दो। जब कभी किसी जरूरतमंद की मदद करने का मौका मिले, तो उसकी मदद कर देना। मेरे पैसे उसी दिन मिल जाएंगे।”

मुसाफिर ने उसका हाथ पकड़कर धन्यवाद दिया और आगे बढ़ गया।

समय बीतता गया। रहीम बूढ़ा होने लगा। उसकी आंखें कमजोर हो गईं और हाथ पहले जैसी तेजी से काम नहीं कर पाते थे। उसका बेटा भी छोटी-मोटी मजदूरी करता था, लेकिन घर की हालत फिर भी नहीं सुधरी।

एक दिन कस्बे में खबर फैली कि दूर के शहर से एक बड़ा व्यापारी आया है। वह पुराने बाजार में किसी ऐसे आदमी को ढूंढ रहा है, जिसने कई साल पहले सर्दियों की एक रात उसके फटे जूते मुफ्त में ठीक किए थे।

लोगों को कुछ समझ नहीं आया।

अगली सुबह एक सजी हुई घोड़ागाड़ी रहीम की छोटी-सी दुकान के सामने आकर रुकी। उसमें से एक अच्छे कपड़े पहने आदमी उतरा। वह सीधे रहीम के पास आया और उसके पैरों के पास बैठ गया।

रहीम घबरा गया। उसने पूछा, “बेटा, तुम कौन हो? यह क्या कर रहे हो?”

आदमी की आंखों में आंसू आ गए। उसने कहा, “बाबा, क्या आपको याद है कि कई साल पहले एक थका हुआ मुसाफिर आपके पास आया था? उसके पास जूते ठीक कराने के पैसे नहीं थे। आपने बिना पैसे लिए उसके जूते ठीक कर दिए थे।”

रहीम ने कुछ देर याद करने की कोशिश की, फिर धीरे से सिर हिला दिया।

आदमी बोला, “वह मुसाफिर मैं ही था। उस रात मैं अपने बीमार पिता के पास जा रहा था। रास्ते में मेरे जूते टूट गए थे। अगर आप मेरी मदद नहीं करते, तो शायद मैं समय पर घर नहीं पहुंच पाता।”

वह कुछ देर रुका और फिर बोला, “उस रात मेरे पिता ने अंतिम समय में मुझे एक जरूरी बात बताई थी। उनके जाने के बाद मैंने मेहनत करके व्यापार शुरू किया और आज इस मुकाम तक पहुंचा हूं। मैं आपको कभी भूल नहीं पाया।”

रहीम की आंखें भर आईं। उसने कहा, “बेटा, मैंने तो बस तुम्हारे जूते ठीक किए थे। इसमें इतना बड़ा एहसान कैसा?”

व्यापारी ने जवाब दिया, “बाबा, आपके लिए वह छोटी-सी मदद थी, लेकिन मेरे लिए वह बहुत कठिन समय में मिला सहारा था।”

उसने रहीम के सामने पैसों की एक थैली रख दी और कहा, “यह आपकी उस मदद की कीमत नहीं है। आपकी नेकी की कोई कीमत नहीं लगा सकता। इसे मेरी तरफ से स्वीकार कर लीजिए, ताकि आपके परिवार को आगे परेशानियों का सामना न करना पड़े।”

रहीम ने पहले मना किया, लेकिन व्यापारी ने समझाया कि वह यह धन किसी एहसान का बदला चुकाने के लिए नहीं, बल्कि सम्मान और कृतज्ञता के रूप में दे रहा है।

आखिरकार रहीम ने उसकी बात मान ली। उस धन से उसने अपनी दुकान ठीक करवाई और अपने बेटे के लिए काम शुरू करने का इंतजाम किया।

व्यापारी जब विदा होने लगा, तो रहीम ने उसे आवाज देकर कहा, “बेटा, मेरी एक बात याद रखना। कभी किसी की मदद करो तो यह मत सोचो कि वह तुम्हें क्या लौटाएगा। बस इतना सोचो कि तुम्हारी वजह से किसी की परेशानी थोड़ी कम हो जाए।”

व्यापारी ने सिर झुकाकर उसकी बात स्वीकार की।

उस दिन रहीम की छोटी-सी दुकान पर केवल एक पुरानी याद नहीं लौटी थी, बल्कि यह विश्वास भी लौट आया था कि दुनिया में सच्ची नेकी और कृतज्ञता आज भी जीवित हैं।

कहानी की सीख: किसी की मदद छोटी या बड़ी नहीं होती। जिस समय हम किसी का सहारा बनते हैं, उस समय हमें अंदाजा भी नहीं होता कि हमारी छोटी-सी कोशिश उसके जीवन में कितनी बड़ी भूमिका निभा सकती है। इसलिए बिना स्वार्थ के भलाई करते रहना चाहिए।

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