राजस्थान के जयपुर में रहने वाली 32 वर्षीय नेहा की शादी को छह साल हो चुके थे। उसका पति अमित एक निजी कंपनी में काम करता था। दोनों की जिंदगी सामान्य थी, लेकिन पिछले कुछ दिनों से नेहा के पास एक अजीब फोन आने लगा था। हर बार फोन पर कुछ सेकंड तक खामोशी रहती और फिर दूसरी तरफ से एक ही सवाल पूछा जाता—“क्या आपको वह आखिरी दिन याद है?”
नेहा फोन काट देती, लेकिन उसके चेहरे पर डर साफ दिखाई देने लगा था। अमित ने कई बार पूछने की कोशिश की, मगर वह हर बार बात टाल देती। एक रात अमित ने देखा कि नेहा फोन पर किसी से धीमी आवाज में कह रही थी, “मैं वहां जरूर आऊंगी, लेकिन इस बार कोई गलती नहीं होनी चाहिए।” अमित ने पूछा तो नेहा ने कहा कि यह उसके पुराने परिचित का फोन था।
अगले दिन अमित के ऑफिस जाने के बाद नेहा ने अलमारी से एक पुराना लिफाफा निकाला। उसमें एक तस्वीर थी, जिसमें नेहा कुछ महिलाओं के साथ एक स्कूल के सामने खड़ी थी। तस्वीर के पीछे तारीख लिखी थी—बारह साल पुरानी। अमित को यह तस्वीर पहले कभी नहीं दिखाई गई थी। तस्वीर में स्कूल का नाम पढ़कर वह चौंक गया। वह स्कूल पिछले आठ साल से बंद पड़ा था।
गुरुवार की रात नेहा घर से निकली तो अमित ने उसका पीछा किया। वह शहर के बाहरी इलाके में बने उसी बंद स्कूल तक पहुंची। स्कूल के मुख्य दरवाजे पर ताला लटका था, लेकिन नेहा पीछे की ओर बने छोटे दरवाजे से अंदर चली गई। अमित भी कुछ दूरी बनाकर अंदर पहुंचा। एक पुराने कमरे की खिड़की से उसने देखा कि नेहा के सामने करीब चालीस साल की एक महिला बैठी थी। दोनों के बीच मेज पर एक पुराना रजिस्टर रखा था।
अचानक उस महिला ने रजिस्टर नेहा की ओर बढ़ाते हुए कहा, “अब सच बताने का समय आ गया है। इतने सालों से तुम अकेले यह बोझ उठाती रही हो।”
अमित कमरे में पहुंचा और उसने दोनों से जवाब मांगा। नेहा की आंखों में आंसू आ गए। उसने बताया कि शादी से पहले वह इसी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के लिए चलाए जा रहे एक सहायता कार्यक्रम से जुड़ी थी। बारह साल पहले स्कूल में एक गंभीर प्रशासनिक गड़बड़ी सामने आई थी। कुछ बच्चों को मिलने वाली छात्रवृत्ति उनके नाम पर दर्ज होने के बावजूद उन तक नहीं पहुंची थी। नेहा ने उस समय एक शिकायत दर्ज कराने में मदद की थी, लेकिन मामले की जांच अधूरी रह गई और कुछ बच्चों के रिकॉर्ड गायब हो गए।
सामने बैठी महिला उस स्कूल की पूर्व शिक्षिका थी। उसे हाल ही में पुराने दस्तावेज मिले थे, जिनसे पता चला कि छात्रवृत्ति की राशि का हिसाब गलत दर्ज किया गया था। वह नेहा की मदद से प्रभावित बच्चों के परिवारों तक पहुंचना चाहती थी। फोन पर पूछा जाने वाला “आखिरी दिन” दरअसल वह दिन था, जब नेहा ने स्कूल में आखिरी बार शिकायत की थी।
लेकिन रजिस्टर के आखिरी पन्ने पर अमित का नाम देखकर दोनों चौंक गए। वहां उसके पिता के हस्ताक्षर थे। अमित को पता चला कि उसके पिता उस समय स्कूल की प्रबंधन समिति में थे और उन्होंने जांच के दौरान कुछ दस्तावेज सुरक्षित रखे थे। इसका मतलब यह नहीं था कि वह गड़बड़ी में शामिल थे—बल्कि उन्हीं दस्तावेजों से अब सच सामने आ सकता था।
अमित ने अपनी पत्नी से कहा कि वह उससे बात छिपाने के बजाय उस पर भरोसा कर सकती थी। नेहा ने माना कि पुराने मामले के कारण वह किसी को परेशान नहीं करना चाहती थी। अगले दिन दोनों ने पूर्व शिक्षिका के साथ संबंधित अधिकारियों को दस्तावेज सौंप दिए। वर्षों से अधूरा पड़ा मामला दोबारा जांच के लिए खुल गया।
उस रात अमित को समझ आया कि उसकी पत्नी किसी गुप्त रिश्ते या गलत काम को छिपाने नहीं जा रही थी। वह बारह साल पुराने अधूरे सच को पूरा करने की कोशिश कर रही थी—एक ऐसा सच, जिसका असर आज भी कई परिवारों पर पड़ रहा था।
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