मध्य प्रदेश के इंदौर में रहने वाली 31 वर्षीय राधिका की शादी को पांच साल हो चुके थे। उसका पति निखिल एक निजी कंपनी में काम करता था। दोनों की जिंदगी सामान्य चल रही थी, लेकिन पिछले कुछ महीनों से निखिल को राधिका के व्यवहार में बदलाव नजर आने लगा था। हर गुरुवार रात करीब साढ़े नौ बजे राधिका तैयार होकर घर से निकल जाती और एक घंटे बाद लौट आती। पूछने पर वह हमेशा यही कहती कि उसे एक जरूरी काम से बाहर जाना पड़ता है।
शुरुआत में निखिल ने इस बात को गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन एक दिन उसने राधिका के बैग में एक पुरानी पर्ची देखी, जिस पर शहर के एक बंद पड़े अस्पताल का नाम लिखा था। हैरानी की बात यह थी कि उस अस्पताल को कई साल पहले बंद किया जा चुका था। निखिल ने राधिका से पूछना चाहा, लेकिन वह पर्ची देखकर घबरा गई और बोली कि यह पुरानी चीज है, इसका अब कोई मतलब नहीं।
उस रात निखिल के मन में कई सवाल उठने लगे। अगले गुरुवार उसने राधिका से कहा कि वह काम के सिलसिले में बाहर जा रहा है। राधिका के घर से निकलते ही वह कुछ दूरी बनाकर उसके पीछे चल पड़ा। राधिका मुख्य सड़क छोड़कर एक सुनसान रास्ते पर मुड़ी और आखिरकार उसी बंद अस्पताल के गेट के सामने पहुंच गई। उसने अपने बैग से चाबी निकाली और अंदर चली गई।
निखिल कुछ मिनट इंतजार करने के बाद अस्पताल के भीतर पहुंचा। गलियारे में अंधेरा था, लेकिन एक कमरे से हल्की रोशनी आ रही थी। जैसे ही वह दरवाजे के पास पहुंचा, अंदर का दृश्य देखकर उसके कदम रुक गए। राधिका एक मेज के सामने बैठी थी। उसके सामने एक बुजुर्ग महिला, कुछ फाइलें और तस्वीरों से भरा एक डिब्बा रखा था। मेज पर कई पुराने नामों की सूची भी थी।
निखिल ने कमरे में प्रवेश करते हुए पूछा, “राधिका, तुम यहां क्या कर रही हो? और ये सब क्या है?”
राधिका कुछ पल चुप रही। फिर उसने बुजुर्ग महिला की ओर देखा और धीरे-धीरे सच्चाई बताई। शादी से पहले वह इसी अस्पताल में स्वयंसेवक के रूप में काम करती थी। अस्पताल बंद होने के बाद वहां इलाज कराने वाले कुछ जरूरतमंद मरीजों के रिकॉर्ड और उनसे जुड़ी जरूरी जानकारी बिखर गई थी। बुजुर्ग महिला उस अस्पताल में नर्स रह चुकी थीं। दोनों मिलकर पुराने मरीजों के परिवारों तक पहुंचने और उनके जरूरी दस्तावेज लौटाने की कोशिश कर रही थीं।
लेकिन असली रहस्य उन फाइलों में छिपा था। एक फाइल में निखिल के पिता का नाम दर्ज था। निखिल ने बताया कि उसके पिता की कई साल पहले मृत्यु हो चुकी थी। राधिका ने फाइल खोलकर एक पुराना पत्र दिखाया। उसमें लिखा था कि उसके पिता ने अस्पताल में भर्ती एक अनजान मरीज के इलाज का खर्च गुप्त रूप से उठाया था। उस मरीज का परिवार वर्षों से यह जानना चाहता था कि उनकी मदद किसने की थी।
राधिका ने यह बात निखिल को इसलिए नहीं बताई थी क्योंकि वह उसके पिता के पुराने सामाजिक कार्यों को सार्वजनिक नहीं करना चाहती थी और मरीज के परिवार की निजी जानकारी भी सुरक्षित रखना चाहती थी। उस रात वह उस परिवार को आखिरी दस्तावेज सौंपने आई थी।
निखिल को एहसास हुआ कि उसने बिना पूरी बात जाने अपनी पत्नी पर शक कर लिया था। अगले दिन वह भी राधिका के साथ उस परिवार से मिलने गया। अस्पताल का रहस्य किसी अपराध का नहीं, बल्कि एक ऐसे नेक काम का था जिसे वर्षों तक गुमनाम रखा गया था। राधिका ने उससे बस इतना कहा, “हर छिपी हुई बात धोखा नहीं होती, कभी-कभी उसके पीछे किसी की निजता और एक पुराना वादा भी होता है।”
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