एक संत कहीं से जा रहे थे एक विद्वान आदमी जोकि गरीब था उसने महात्मा की खुब सेवा की, पलंग बिछाया, बढ़िया खाने पीने की व्यवस्था की, लेटने पर पैर दबाए, पूछा कि महात्मा जी कोई और सेवा हो वो भी बताओ।
संत बड़ा प्रसन्न हुआ और कहा कि आज तुम निर्धन हो लेकिन भगवान करें तुम्हारे अच्छे दिन आएं और तुम धनसंपन्न हो जाओ। लेकिन उस विद्वान के विचार ही ऐसे थे बोला कि महात्मा जी कोई चीज स्थाई नहीं है अतः रहने दो कुछ जरूरत नहीं धन संपत्ति की। संत ने कहा कि नहीं भाई तू अच्छा इंसान है इसलिए मैं तुम्हें यही आशीर्वाद देता हूं।
दो चार साल बाद उस संत का फिर वहीं आना हुआ तो देखा उस झोपडी की जगह बड़ा महल खड़ा था, संत को देखते ही विद्वान प्रसन्न हुआ और पहले जैसी ही सेवा की। संत जाते हुए फिर बोला कि अबकी बार ऐसा आशीर्वाद देता हूं तू जैसा है वैसा बना रहे। विद्वान बोला कि रहने दो महात्मा जी इसकी भी क्या जरूरत है? आखिर में ये भी नहीं रहने वाला।
संत ने सोचा कि बड़ा अजीब आदमी है, खैर संत दो वर्ष बाद फिर आया, माया आनी जानी चीज़ है तब तक विद्वान के लड़के का देहांत हो चुका था। संत ने लोगों से पूछा कि यहां एक महल हुआ करता था? और उसका मालिक कहां है? लोगों ने बताया कि जी वो किसी जमींदार के साथ साझी लगा हुआ है।
संत उसके पास पहुंचा तो विद्वान बड़ा प्रसन्न हुआ और जैसी हालत थी वैसा भोजन करवाया खूब सेवा की। संत ने कहा कि भाई अब क्या आशीर्वाद दूं? विद्वान ने कहा कि जी कुछ नहीं बस जो चल रहा है ठीक ही है। संत ने कहा नहीं भाई मैं आशीर्वाद देता हूं कि फलो फुलो। विद्वान ने कहा कि रहने दो महात्मा जी आप तीन बार आ लिए रहना ये भी नहीं।
साधू कुछ सालों बाद चौथी बार उस जगह पहुंचा तो उस विद्वान से फिर मिलने की इच्छा हुई। तो उसके घर पहुंचा और पूछा कि जी वो कहां गए मालिक? बताया गया कि जी वो इस दुनिया में नहीं रहे। संत ने कहा कि बहुत बुरा हुआ वो तो बड़े संत आदमी थे संत का चोला तो मैंने लिया है मगर वे जो बातें करते थे बिल्कुल सत्य कहते थे।
विद्वान के घरवालों ने कहा कि जी दुसरे कमरे में फोटो लगाया है आप पुष्प अर्पित करें। संत उस कक्ष में पहुंचा तो देखा कि विद्वान मरने से पहले ही फोटो बनवा गया था और उसपर लिखवा दिया था कि आखिर में ये भी नहीं रहना।
धन गया, महल गया, बेटा गया और अंत में वह स्वयं भी चला गया, पीछे बस एक वाक्य छोड़ गया कि आखिर में ये भी नहीं रहना। संत ने जिंदगी भर लोगों को संसार की नश्वरता समझाई थी, लेकिन उस दिन उसे एहसास हुआ कि असली संत वह था जिसने कभी संत का चोला पहना ही नहीं था।
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