बहुत समय पहले की बात है। एक परम तेजस्वी और तपस्विनी कन्या थीं—वेदवती। उनके जीवन का उद्देश्य सांसारिक सुख या राजसी वैभव नहीं था। उनके मन में केवल एक ही संकल्प था—भगवान विष्णु को अपने पति के रूप में प्राप्त करना।
इसी संकल्प को पूरा करने के लिए वेदवती ने घोर तपस्या शुरू कर दी। कठिन परिस्थितियों में भी उनका ध्यान नहीं टूटा। वर्षों तक तप करते हुए उनका तेज इतना बढ़ गया कि जो भी उन्हें देखता, उनके व्यक्तित्व और तपोबल से प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाता।
एक दिन लंकापति रावण उसी वन प्रदेश से गुजर रहा था। जब उसकी नजर तपस्या में लीन वेदवती पर पड़ी, तो वह उनके तेज और सौंदर्य से प्रभावित हो गया। रावण ने उनके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा और अपने वैभव, शक्ति तथा लंका के ऐश्वर्य का वर्णन करते हुए उन्हें अपनी पत्नी बनने के लिए कहा।
लेकिन वेदवती ने शांत स्वर में उसका प्रस्ताव ठुकरा दिया।
उन्होंने कहा, “मैं अपने मन और हृदय से भगवान विष्णु को पति रूप में स्वीकार कर चुकी हूं। मेरा संकल्प अटल है।”
वेदवती का उत्तर सुनकर रावण का अहंकार भड़क उठा। वह अपनी शक्ति और सामर्थ्य के मद में उन्हें अपमानित करने का प्रयास करने लगा। लेकिन जिस स्त्री के सामने रावण खड़ा था, वह कोई साधारण कन्या नहीं, बल्कि वर्षों की तपस्या से सिद्ध हुई तपस्विनी थी।
वेदवती ने रावण के इस व्यवहार को अपना अपमान ही नहीं, बल्कि अपने तप और संकल्प का भी अपमान माना। उनके भीतर क्रोध की ज्वाला उठी और उन्होंने रावण को चेतावनी देते हुए कहा कि उसके इस अधर्म का परिणाम उसे अवश्य भुगतना पड़ेगा।
कथा के अनुसार, उन्होंने रावण को श्राप दिया कि एक दिन वही उसके विनाश का कारण बनेगी।
इसके बाद वेदवती ने अपने शरीर का त्याग करने का निर्णय लिया और अग्नि में प्रवेश कर गईं। लेकिन उनकी प्रतिज्ञा और रावण को दिया गया श्राप समय के साथ समाप्त नहीं हुआ।
फिर समय बदला...
वर्ष बीत गए और त्रेतायुग की कथा आगे बढ़ी। कहा जाता है कि वही वेदवती आगे चलकर माता सीता के रूप में प्रकट हुईं। मिथिला के राजा जनक को एक दिन खेत में हल चलाते समय धरती से एक दिव्य कन्या प्राप्त हुई। राजा जनक ने उस बालिका को अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया और उसका नाम रखा—सीता।
यही सीता आगे चलकर भगवान श्रीराम की अर्धांगिनी बनीं।
लेकिन रावण को शायद अपने पुराने कर्मों का वह प्रसंग याद नहीं था।
जब उसने माता सीता का हरण किया और उन्हें लंका ले गया, तब वास्तव में वह उसी मार्ग पर आगे बढ़ रहा था, जिसकी शुरुआत उसके पुराने अधर्म से हुई थी।
रावण के पास अपार शक्ति थी। उसके पास विशाल सेना थी, सोने की लंका थी और उसे अनेक वरदान प्राप्त थे। उसे अपने सामर्थ्य पर इतना अभिमान था कि उसे लगता था कि कोई उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
लेकिन विधि का विधान कुछ और ही लिख चुका था।
सीता के हरण के बाद भगवान श्रीराम और रावण के बीच युद्ध हुआ। लंका की धरती पर ऐसा महासंग्राम छिड़ा, जिसमें रावण की विशाल शक्ति भी धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी।
अंततः भगवान श्रीराम के हाथों रावण का वध हुआ और उसका अभिमान, उसका अत्याचार तथा उसका अधर्म समाप्त हो गया।
इस कथा का आध्यात्मिक संदेश यही माना जाता है कि अधर्म कितना भी शक्तिशाली क्यों न दिखाई दे, उसके कर्मों का परिणाम उससे बच नहीं सकता। अहंकार इंसान को अपनी शक्ति पर भरोसा करना सिखाता है, लेकिन धर्म और सत्य अंततः अपना मार्ग बना ही लेते हैं।
और शायद इसी कारण वेदवती की कथा केवल एक श्राप की कथा नहीं, बल्कि कर्म, संकल्प और अहंकार के परिणाम की कथा भी मानी जाती है।
Post a Comment