मां पर पूत, पिता पर घोड़ा, घणा नहीं तो थोड़ा थोड़ा — एक राजकुमारी, घोड़ा और प्रेम की मजेदार कहानी
बहुत समय पहले की बात है। एक विशाल राज्य में एक प्रतापी राजा का शासन था। राजा के पास धन-दौलत की कोई कमी नहीं थी। महल बड़ा था, सेना मजबूत थी और राजदरबार में दूर-दूर से लोग अपनी फरियाद लेकर आते थे।
लेकिन राजा की एक बेटी थी, जिसे राजकाज से ज्यादा शौक था घुड़सवारी का।
राजमहल के पास ही राजा का विशाल अस्तबल था, जहां तरह-तरह के घोड़े रखे जाते थे। कोई घोड़ा अपनी रफ्तार के लिए मशहूर था तो कोई अपनी ताकत के लिए।
उसी अस्तबल की देखभाल एक युवा युवक करता था।
वह मेहनती, ईमानदार और घोड़ों की अच्छी समझ रखने वाला था। राजकुमारी जब भी घुड़सवारी के लिए अस्तबल आती, दोनों की मुलाकात होने लगी।
पहले घोड़ों की बातें हुईं।
फिर मौसम की बातें होने लगीं।
फिर मुलाकातें थोड़ी लंबी होने लगीं।
और देखते ही देखते दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगे।
समस्या सिर्फ एक थी—राजा।
दोनों जानते थे कि राजा शायद अपनी बेटी की शादी अस्तबल के एक साधारण कर्मचारी से कभी स्वीकार नहीं करेगा।
एक दिन दोनों ने तय किया कि अब यहां रहना मुश्किल है।
युवक बोला,
“राजकुमारी, अगर हम यहां रहे तो आपके पिता कभी हमारी शादी के लिए तैयार नहीं होंगे। क्यों न हम किसी दूसरे राज्य चले जाएं? वहां जाकर विवाह करेंगे और अपनी नई जिंदगी शुरू करेंगे।”
राजकुमारी ने भी हामी भर दी।
फिर एक रात दोनों ने भागने की योजना बनाई।
युवक ने राजा के अस्तबल से सबसे तेज और मजबूत घोड़ा चुना। रात का समय था। महल के पहरेदारों से बचते हुए दोनों घोड़े पर सवार हुए और राज्य की सीमा की ओर निकल पड़े।
सब कुछ योजना के मुताबिक चल रहा था।
लेकिन सीमा से कुछ पहले एक नदी रास्ते में आ गई।
नदी बहुत गहरी नहीं थी। पानी मुश्किल से घुटनों तक था।
युवक ने घोड़े को आगे बढ़ाने की कोशिश की।
“चल शेरू... आगे बढ़!”
घोड़ा एक कदम आगे गया और फिर अचानक रुक गया।
युवक ने लगाम खींची।
फिर समझाया।
फिर थोड़ा डांटा।
लेकिन घोड़ा टस से मस नहीं हुआ।
राजकुमारी ने कहा,
“इसे क्या हो गया? पानी तो बहुत कम है।”
युवक बोला,
“पता नहीं... अभी तो यही घोड़ा सबसे तेज दौड़ रहा था।”
उसने घोड़े को दूसरी तरफ मोड़ा और फिर नदी की ओर लाया।
लेकिन घोड़ा नदी देखकर फिर पीछे हट गया।
अब युवक भी परेशान हो गया।
कुछ देर वह चुपचाप घोड़े को देखता रहा।
अचानक उसके चेहरे के भाव बदल गए।
उसने राजकुमारी से कहा,
“चलो वापस चलते हैं।”
राजकुमारी हैरान रह गई।
“क्या? अभी तो हम राज्य छोड़कर भाग रहे थे और अब वापस?”
युवक ने कहा,
“हां। तुम्हें वापस महल छोड़ना होगा।”
राजकुमारी ने बहुत पूछा,
“आखिर हुआ क्या है?”
लेकिन युवक ने उस समय कुछ नहीं बताया।
दोनों वापस महल पहुंचे। राजकुमारी को सुरक्षित उसके कक्ष तक पहुंचाकर युवक अगली सुबह सीधे राजदरबार में जा पहुंचा।
दरबार लगा हुआ था।
युवक ने राजा के सामने जाकर सिर झुका दिया।
“महाराज, मैं अपराधी हूं। मुझे दंड दीजिए।”
राजा ने हैरानी से पूछा,
“तुमने ऐसा क्या अपराध कर दिया?”
युवक ने पूरी कहानी राजा को बता दी।
उसने स्वीकार किया कि वह राजकुमारी को लेकर राज्य से भागने वाला था।
दरबार में सन्नाटा छा गया।
राजा ने गंभीर होकर पूछा,
“जब तुम्हें पता था कि तुम गलत कर रहे हो तो फिर नदी तक क्यों गए?”
युवक बोला,
“महाराज, मैं राजकुमारी को लेकर भाग ही रहा था। लेकिन नदी के पास पहुंचकर घोड़ा रुक गया।”
राजा ने कहा,
“तो तुम दोनों उतरकर पैदल नदी पार कर सकते थे।”
युवक कुछ देर चुप रहा।
फिर बोला,
“महाराज, नदी तो हम पैदल पार कर सकते थे। लेकिन उसी समय मुझे एक बहुत जरूरी बात याद आ गई।”
राजा ने पूछा,
“क्या बात?”
युवक बोला,
“महाराज, जिस घोड़े पर हम सवार थे, उसके माता-पिता भी पानी देखकर इसी तरह बिदकते थे। मैंने सोचा कि अगर इसके अंदर अपने माता-पिता का गुण आ सकता है, तो मेरे अंदर भी मेरे माता-पिता के गुण होंगे।”
राजा ध्यान से सुनने लगा।
युवक ने आगे कहा,
“अगर मैं आज राजकुमारी को भगाकर विवाह करता हूं तो कल हमारी संतान भी अपने माता-पिता के गुण लेकर बड़ी होगी। हो सकता है वह भी अपने प्रेम के लिए वही रास्ता चुने। इसलिए मैंने सोचा कि शुरुआत में ही गलती रोक देना बेहतर है।”
यह सुनकर दरबार में बैठे लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
राजा कुछ देर तक बिल्कुल शांत रहा।
फिर अचानक मुस्कुराया।
उसने युवक को पास बुलाया और कहा,
“तुमने बहुत बड़ी बात सोच ली।”
युवक ने सिर झुका लिया।
राजा बोला,
“लेकिन एक बात तुम नहीं जानते।”
युवक ने पूछा,
“क्या महाराज?”
राजा जोर से हंसा और बोला,
“तुम्हें अपनी मां-बाप के गुणों की चिंता है ना? तो मेरी बेटी को भी उसी की मां से कुछ गुण मिले हैं!”
युवक घबरा गया।
राजा ने मुस्कुराते हुए कहा,
“तुम्हें पता है, मैंने भी कभी अपनी पसंद की लड़की से विवाह करने के लिए उसके घरवालों की मर्जी का इंतजार नहीं किया था। मैं भी तुम्हारी तरह अपनी प्रेमिका को लेकर भागा था।”
दरबार में हंसी फैल गई।
राजा ने कहा,
“और वह प्रेमिका कोई और नहीं, मेरी आज की रानी और तुम्हारी राजकुमारी की मां है!”
अब युवक की आंखें खुली की खुली रह गईं।
राजा ने मजाकिया अंदाज में कहा,
“तो बेटा, अगर मेरी बेटी में अपनी मां के गुण आ गए हैं तो इसमें उसका क्या दोष? आखिर खानदान का असर तो होता ही है।”
फिर राजा ने राजकुमारी को बुलाया और दोनों से बातचीत की।
राजा ने कहा,
“तुम दोनों ने गलती की है कि मेरी अनुमति के बिना भागने की कोशिश की। लेकिन अगर तुम दोनों एक-दूसरे से सच्चा प्रेम करते हो और जीवनभर साथ निभाने का संकल्प रखते हो, तो मैं तुम्हारे रास्ते की दीवार क्यों बनूं?”
आखिरकार राजा ने दोनों की शादी की अनुमति दे दी।
और इस तरह जिस प्रेम कहानी की शुरुआत आधी रात को भागने से हुई थी, उसका अंत राजा की सहमति और धूमधाम से विवाह के साथ हुआ।
तभी से यह कहावत सुनाई जाती है—
“मां पर पूत, पिता पर घोड़ा, घणा नहीं तो थोड़ा-थोड़ा।”
यानी इंसान में अपने माता-पिता के गुण किसी न किसी रूप में आ ही जाते हैं। कभी आदतों में, कभी व्यवहार में और कभी फैसलों में।
और इस कहानी की सबसे मजेदार बात तो यही रही कि जिस युवक को अपने माता-पिता के गुणों का डर था, आखिर में पता चला कि राजा खुद भी कभी उसी रास्ते से गुजर चुका था।
Post a Comment