रात के करीब साढ़े ग्यारह बज चुके थे। पहाड़ी कस्बे से लगे घनेरी गांव तक पहुंचने वाली मुख्य सड़क मरम्मत के कारण बंद थी। गांव जाने के लिए अब सिर्फ एक कच्चा रास्ता बचा था, जो सूखी नदी के किनारे से होकर श्मशान घाट के पास से गुजरता था। स्थानीय लोग इस रास्ते को ‘श्मशान वाली पगडंडी’ कहते थे।
गांव वालों का दावा था कि सूर्यास्त के बाद इस रास्ते पर जाना ठीक नहीं है। बुजुर्ग अक्सर कहते थे कि रात में यहां रास्ता अपनी दिशा बदल देता है और जो व्यक्ति डरकर पीछे लौटने की कोशिश करता है, वह बार-बार उसी जगह पहुंच जाता है।
लेकिन शहर से आया युवा सिविल इंजीनियर आलोक इन बातों को सिर्फ अंधविश्वास मानता था।
उस रात उसे किसी जरूरी काम से घनेरी गांव जाना था। उसने बाइक स्टार्ट की और मुख्य सड़क बंद देखकर बिना ज्यादा सोचे उसी सुनसान पगडंडी की ओर बाइक मोड़ दी।
शुरुआत में सब कुछ सामान्य था।
लेकिन जैसे-जैसे वह श्मशान के करीब पहुंचा, माहौल बदलने लगा।
हवा में अचानक ठंडक बढ़ गई। आसपास घने पेड़ों की शाखाएं अंधेरे में अजीब आकृतियां बना रही थीं। बाइक की हेडलाइट मुश्किल से कुछ मीटर आगे तक रोशनी कर पा रही थी। हवा में गीली मिट्टी और जली हुई लकड़ी जैसी गंध भी महसूस होने लगी।
आलोक ने बाइक की रफ्तार थोड़ी कम की।
तभी अचानक बाइक का इंजन झटके के साथ बंद हो गया।
उसने दोबारा सेल्फ लगाया।
कुछ नहीं हुआ।
फिर किक मारी।
फिर भी इंजन ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
आलोक ने मोबाइल निकाला ताकि किसी को फोन कर सके, लेकिन स्क्रीन पर सिर्फ ‘No Service’ दिखाई दे रहा था।
चारों तरफ ऐसा सन्नाटा था कि उसे अपनी धड़कन तक सुनाई देने लगी।
तभी उसकी नजर रास्ते के बाईं तरफ गई।
श्मशान घाट की तरफ एक हल्की लाल रोशनी दिखाई दे रही थी।
आलोक ने ध्यान से देखा तो वहां एक चिता जल रही थी।
लेकिन इस दृश्य में कुछ ऐसा था जिसने उसके शरीर में सिहरन पैदा कर दी।
चिता जल रही थी, लेकिन उससे धुआं नहीं उठ रहा था।
आग की लपटें भी असामान्य रूप से शांत थीं।
और चिता के पास कोई व्यक्ति बैठा हुआ था।
वह साया पीठ करके बैठा था।
आलोक ने सोचा कि शायद कोई व्यक्ति रात में अंतिम संस्कार के लिए वहां आया होगा।
उसने आवाज लगाई—
“कोई है?”
कोई जवाब नहीं आया।
उसने दोबारा आवाज लगाई।
इस बार वह साया धीरे-धीरे हिला।
उसका पूरा शरीर अपनी जगह स्थिर रहा, लेकिन सिर अस्वाभाविक तरीके से घूमकर आलोक की ओर मुड़ गया।
आलोक का खून जम गया।
उस चेहरे पर आंखें और नाक जैसी कोई स्पष्ट आकृति नहीं थी। राख से ढका चेहरा और उसके बीच एक चौड़ी, डरावनी मुस्कान दिखाई दे रही थी।
आलोक ने एक पल भी वहां रुकना ठीक नहीं समझा।
वह बाइक छोड़कर दौड़ पड़ा।
उसे लगा कि जितनी जल्दी हो सके इस रास्ते से बाहर निकल जाना चाहिए।
लेकिन कुछ देर दौड़ने के बाद अचानक उसके कदम रुक गए।
सामने उसकी वही बाइक खड़ी थी।
आलोक अवाक रह गया।
वह जिस दिशा में भागा था, उसके हिसाब से बाइक पीछे छूट जानी चाहिए थी।
लेकिन वह फिर उसी जगह कैसे पहुंच गया?
उसने घबराकर पीछे देखा।
वह रास्ता भी वैसा ही था।
तभी चारों तरफ से घुंघरुओं और किसी के रोने जैसी आवाजें आने लगीं।
आलोक ने अपने कान बंद कर लिए।
लेकिन आवाजें बाहर से नहीं, जैसे उसके आसपास और उसके भीतर से आ रही थीं।
फिर उसे अपने पैरों के नीचे मिट्टी खिसकती महसूस हुई।
उसने नीचे देखा।
पगडंडी पर पड़ी राख हवा में उठने लगी।
कुछ ही क्षणों में उड़ती हुई राख अजीब-अजीब चेहरों जैसी आकृतियां बनाने लगी।
तभी उसके कान के ठीक पीछे किसी ने फुसफुसाया—
“तुमने नियम तोड़ा...”
आलोक ने घबराकर पीछे मुड़ना चाहा।
लेकिन तभी उसे शाम को ढाबे वाले की कही बात याद आ गई—
“अगर कभी उस रास्ते पर फंस जाओ, तो पीछे मत भागना… और अपनी परछाई को कभी मत देखना।”
आलोक को समझ आ गया कि घबराकर पीछे देखने से स्थिति और खराब हो सकती है।
उसने आंखें बंद कीं।
अपने इष्टदेव का नाम लिया।
फिर उसने तय किया कि अब वह सिर्फ अपने कदमों पर ध्यान देगा।
न पीछे देखेगा।
न किसी आवाज का जवाब देगा।
न चिता की तरफ नजर उठाएगा।
वह धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा।
पहला कदम।
फिर दूसरा।
उसके कानों में कभी किसी के रोने की आवाज आती, कभी कोई उसका नाम पुकारता।
कभी ऐसा लगता जैसे कोई उसके कंधे के बिल्कुल पास खड़ा है।
कभी उसकी जैकेट को कोई पीछे से खींचता महसूस होता।
लेकिन आलोक चलता रहा।
उसके पैर भारी होते जा रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी दलदली जमीन में चल रहा हो।
फिर अचानक किसी ने उसके कान में चीख मारी।
आलोक का पूरा शरीर कांप गया।
लेकिन उसने आंखें नहीं खोलीं।
वह बस अपने कदमों पर ध्यान देता रहा।
करीब बीस मिनट तक यह सिलसिला चलता रहा।
फिर अचानक—
एक तेज हॉर्न की आवाज आई।
आलोक ने आंखें खोलीं।
उसके सामने पीली रोशनी थी।
वह मुख्य सड़क के किनारे खड़ा था।
सामने घनेरी गांव का प्रवेश द्वार दिखाई दे रहा था।
आसमान में सुबह की हल्की लालिमा दिखाई देने लगी थी।
आलोक ने राहत की सांस ली।
लेकिन उसके मन में एक सवाल अभी भी था—
वह रास्ता आखिर गया कहां?
उसने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।
जहां कुछ देर पहले पगडंडी थी, वहां अब सिर्फ कंटीली झाड़ियां और एक पुराना खंडहर दिखाई दे रहा था।
आलोक ने अपनी जैकेट की तरफ देखा।
उसकी जैकेट पर राख से बने पांच उंगलियों जैसे निशान थे।
वह कुछ देर तक उन्हें देखता रहा।
उस रात उसके साथ वास्तव में क्या हुआ था—यह वह कभी समझ नहीं पाया।
क्या वह किसी मानसिक भ्रम में फंस गया था?
क्या घने अंधेरे, डर और रास्ता भटकने के कारण उसे सब कुछ अलौकिक महसूस हुआ?
या फिर उस सुनसान पगडंडी से जुड़ी गांव की पुरानी मान्यताओं में सचमुच कुछ ऐसा था, जिसे विज्ञान आज तक समझ नहीं पाया?
इसका जवाब किसी के पास नहीं था।
लेकिन उस रात के बाद आलोक ने एक बात जरूर समझ ली थी—
हर डर अंधविश्वास नहीं होता, और हर रहस्य का जवाब तुरंत मिलना जरूरी भी नहीं है।
कहानी की सीख
कहानी काल्पनिक हॉरर कथा है, लेकिन इसका संदेश वास्तविक जीवन से जुड़ा है। सुनसान, जंगली या श्मशान के आसपास के रास्तों पर रात में अकेले जाने से बचना चाहिए। डर की स्थिति में घबराकर भागने के बजाय शांत रहना, रास्ते और आसपास की स्थिति को समझना तथा सुरक्षित स्थान तक पहुंचने की कोशिश करना ज्यादा जरूरी है।
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