एक घर में नई-नवेली बहू बड़े पद पर एक निजी बैंक में नौकरी करती थी।
नौकरी अच्छी थी, लेकिन जिम्मेदारियां भी कम नहीं थीं। सुबह जल्दी उठना, घर का काम निपटाना, तैयार होना और समय पर ऑफिस पहुंचना उसकी रोज की दिनचर्या थी।
घर में उसके पति और बुजुर्ग ससुर के अलावा कोई नहीं था। उसकी सास का करीब एक साल पहले ही निधन हो चुका था।
ससुर उम्रदराज थे और उनका ज्यादातर समय घर पर ही बीतता था।
शुरुआत में बहू अपने ससुर का पूरा ध्यान रखती थी। उनके खाने-पीने से लेकर दवाइयों और दूसरी जरूरतों का ख्याल रखती थी।
लेकिन कुछ दिनों बाद उसने ससुर की एक आदत नोटिस की।
हर सुबह जब वह ऑफिस जाने के लिए तैयार होकर घर से निकलने लगती, ठीक उसी समय ससुर उसे आवाज देते—
“बहू, जरा मेरा चश्मा साफ करके देती जा।”
बहू रुकती, चश्मा लेती और साफ करके ससुर को दे देती।
पहले उसे इसमें कोई परेशानी नहीं हुई।
लेकिन रोज यही होने लगा।
कभी उसे ऑफिस के लिए देर हो रही होती, कभी जरूरी मीटिंग होती, कभी रास्ते में ट्रैफिक का डर होता।
फिर भी ससुर की आवाज आती—
“बहू, मेरा चश्मा साफ कर देना।”
बहू मन ही मन झुंझला जाती।
वह सोचती—
“सुबह से काम में लगी हूं। चश्मा भी क्या सुबह ही साफ करवाना जरूरी है?”
लेकिन ससुर बुजुर्ग थे, इसलिए वह कुछ कह नहीं पाती।
एक दिन आखिरकार उसने यह बात अपने पति को बता दी।
उसने कहा—
“पता नहीं पिताजी को क्या हो गया है। मैं रोज ऑफिस के लिए निकलती हूं और उसी समय उन्हें अपना चश्मा साफ करवाना याद आता है।”
पति ने कुछ देर सोचा और फिर मुस्कुराकर कहा—
“ऐसा करो, सुबह उठते ही उनका चश्मा साफ करके उनके कमरे में रख दिया करो। फिर शायद रोज तुम्हें आवाज नहीं देंगे।”
बहू ने भी यही सोचा कि इससे समस्या खत्म हो जाएगी।
अगली सुबह उसने उठते ही ससुर का चश्मा अच्छी तरह साफ किया और उनके कमरे में रख दिया।
फिर वह अपने काम में लग गई।
उसे लगा आज तो समय पर ऑफिस निकल जाएगी।
लेकिन जैसे ही वह दरवाजे से निकलने लगी, पीछे से वही आवाज आई—
“बहू... जरा मेरा चश्मा साफ करके देती जा।”
बहू एक पल के लिए रुक गई।
उसे गुस्सा भी आया।
वह मन ही मन सोचने लगी—
“मैं अभी तो साफ करके रखकर आई हूं!”
लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
वह वापस गई, चश्मा उठाया और ससुर को साफ करके दे दिया।
अब यह रोज का सिलसिला बन गया।
बहू ने कई बार कोशिश की कि किसी तरह यह आदत खत्म हो जाए।
कभी वह चश्मा रात में साफ करके रखती।
कभी सुबह जल्दी साफ करती।
कभी पति से कहती कि आप पिताजी को समझाइए।
लेकिन ससुर हर सुबह उसे जरूर बुलाते।
धीरे-धीरे बहू ने उस बात को गंभीरता से लेना बंद कर दिया।
अब ससुर आवाज देते तो वह चुपचाप चश्मा साफ कर देती।
फिर कुछ समय बाद उसने जवाब देना भी कम कर दिया।
ससुर कुछ कहते तो बहू अपने काम में लगी रहती।
समय बीतता गया।
महीने गुजरते गए।
फिर एक दिन वह खबर आई, जिसका घर में किसी ने कल्पना नहीं की थी।
बुजुर्ग ससुर का निधन हो गया।
घर में सन्नाटा छा गया।
बहू को भी दुख हुआ, लेकिन जिंदगी अपनी रफ्तार से चलती रही।
समय बीतता गया।
करीब दो साल बाद एक छुट्टी के दिन बहू घर की सफाई कर रही थी।
पुरानी चीजें हटाते समय उसे ससुर की एक डायरी मिली।
उसने डायरी उठाई और यूं ही उसके पन्ने पलटने लगी।
कई पन्नों पर रोजमर्रा की छोटी-छोटी बातें लिखी थीं।
फिर अचानक उसकी नजर एक तारीख पर जाकर रुक गई।
उस पन्ने पर लिखा था—
“मेरी प्यारी बहू...”
बहू आगे पढ़ने लगी।
ससुर ने लिखा था कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में बच्चे अक्सर घर से निकलते समय बड़ों का आशीर्वाद लेना भूल जाते हैं।
फिर उन्होंने लिखा—
“जब मेरी बहू रोज ऑफिस जाने से पहले मेरा चश्मा साफ करने के लिए मेरे सामने झुकती है, तब मैं मन ही मन अपना हाथ उसके सिर पर रखकर उसे आशीर्वाद देता हूं।”
बहू की आंखें वहीं ठहर गईं।
उसके हाथ कांपने लगे।
डायरी में आगे लिखा था—
“तुम्हारी सास ने मरने से पहले मुझसे कहा था कि हमारी बहू को कभी यह महसूस मत होने देना कि वह इस घर में पराई है। उसे बेटी की तरह रखना। उसकी छोटी-छोटी गलतियों को माफ कर देना और हमेशा उसका साथ देना।”
बहू की आंखों से आंसू निकलने लगे।
जिस काम को वह महीनों से एक परेशानी समझती रही थी, उसके पीछे तो ससुर का इतना गहरा स्नेह छिपा था।
हर सुबह जब वह चश्मा साफ करने के लिए उनके सामने झुकती थी, ससुर उसके सिर पर हाथ रखकर मन ही मन उसे आशीर्वाद देते थे।
डायरी की आखिरी पंक्तियों ने तो बहू को पूरी तरह तोड़ दिया।
“मैं रहूं या न रहूं, मेरा आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ रहेगा। सदा खुश रहना, बेटी।”
बहू डायरी को सीने से लगाकर फूट-फूटकर रोने लगी।
उस दिन उसे पहली बार एहसास हुआ कि जिसे वह रोज की एक छोटी-सी परेशानी समझती थी, वह दरअसल उसके ससुर के प्यार और आशीर्वाद का तरीका था।
जिस बुजुर्ग को वह कभी-कभी अपनी व्यस्तता के कारण अनदेखा कर देती थी, वह हर दिन उसके लिए दुआ करता था।
कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
उस दिन के बाद बहू ने ससुर का चश्मा संभालकर रख लिया।
अब वह रोज ऑफिस जाने से पहले उनका चश्मा अच्छी तरह साफ करती और उसी जगह रख देती, जहां ससुर बैठा करते थे।
वह जानती थी कि वहां अब कोई उसे आवाज नहीं देगा।
लेकिन उसके मन में एक उम्मीद जरूर रहती—
शायद उस अदृश्य हाथ का आशीर्वाद आज भी उसके सिर पर है।
सीख
रिश्तों की कीमत अक्सर हमें तब समझ आती है, जब वह रिश्ता हमारे पास नहीं रहता।
किसी बुजुर्ग की छोटी-सी बात को बोझ समझने से पहले यह जरूर सोचिए कि उसके पीछे कहीं आपका भला चाहने वाली कोई भावना तो नहीं छिपी है।
क्योंकि कुछ आशीर्वाद शब्दों से नहीं मिलते, वे जिंदगी भर हमारे साथ रहने वाली यादों के रूप में मिलते हैं।
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