राजर्षि जनक केवल एक महान राजा ही नहीं, बल्कि उच्च कोटि के ज्ञानी और योगी भी माने जाते थे। अपने गहन आत्मज्ञान, वैराग्य और योग-साधना के कारण वे विदेह कहलाते थे अर्थात् ऐसे महापुरुष, जो देह और सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठ चुके हों।
अपने ज्ञान और योग-सामर्थ्य पर उन्हें अत्यंत विश्वास था। उन्हें लगता था कि संसार का कोई भी आकर्षण उनके स्थिर चित्त को विचलित नहीं कर सकता। किंतु परम सत्य की महिमा तो तब प्रकट होती है, जब साधक अपने ज्ञान के सूक्ष्म अहंकार से भी मुक्त हो जाए।
कथा के अनुसार, एक अवसर पर राजर्षि जनक परमधाम गोलोक पहुँचे। वहाँ जब उन्होंने भगवती श्री राधा के दिव्य प्रांगण में प्रवेश किया, तो श्री राधा ने अपनी करुणामयी दृष्टि उन पर डाली।
भगवती की उस दिव्य दृष्टि का ऐसा प्रभाव हुआ कि जनक के भीतर वर्षों से संचित योगाभिमान और विदेह होने का सूक्ष्म गर्व क्षण भर में विलीन होने लगा। उनके हृदय में अद्भुत प्रेम और भक्ति का उदय हुआ। वे स्वयं को राजा, ज्ञानी या योगी के रूप में नहीं, बल्कि भगवती के चरणों का एक विनम्र सेवक अनुभव करने लगे।
राजर्षि जनक ने वहाँ ऐसा दिव्य दृश्य देखा कि जिन योग-सिद्धियों और मुक्ति को मनुष्य महानतम उपलब्धि मानता है, वे भी भगवती श्री राधा की सेवा में समर्पित दिखाई देती हैं।
यह देखकर जनक को अनुभूति हुई कि केवल ज्ञान, योग और सिद्धियों का अहंकार साधक को पूर्णता तक नहीं ले जा सकता। जब ज्ञान में प्रेम और भक्ति का समावेश होता है, तभी उसकी पूर्णता प्रकट होती है।
श्री राधा की कृपामयी उपस्थिति ने राजर्षि जनक के भीतर के सूक्ष्म अभिमान को भी समाप्त कर दिया। उन्होंने समझा कि परमात्मा की प्राप्ति केवल बौद्धिक ज्ञान या योग-सामर्थ्य का विषय नहीं, बल्कि निष्काम प्रेम, समर्पण और भक्ति का भी मार्ग है।
अश्रुपूर्ण नेत्रों से उन्होंने भगवती श्री राधा के श्री चरणों में प्रणाम किया। उनकी विनम्रता और समर्पण से प्रसन्न होकर भगवती ने उन्हें अभय प्रदान किया और अपनी अनन्य प्रेम-भक्ति का परम धन प्रदान किया।
यह कथा हमें स्मरण कराती है कि साधना की ऊँचाइयों पर पहुँचने के बाद भी यदि मन में अहंकार का अंश शेष रह जाए, तो पूर्णता अभी बाकी है। सच्चा ज्ञान वही है जो मनुष्य को विनम्र बनाए और अंततः प्रेम तथा भक्ति की ओर ले जाए।
ज्ञान मार्ग हमें सत्य का बोध कराता है, योग मन को स्थिर करता है और भक्ति उस सत्य के प्रति प्रेमपूर्ण समर्पण सिखाती है।
इसीलिए भगवान और भगवती के चरणों में निष्कपट प्रेम, विनम्रता और समर्पण को सनातन परंपरा में सर्वोच्च आध्यात्मिक संपदा माना गया है।
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