85 साल के पिता से बिस्तर गीला हो गया, बहू ने कहा- अब नहीं साफ करूंगी… बेटे ने दिया ऐसा जवाब कि पूरा घर भावुक हो गया
मनोहर जी की उम्र 85 साल हो चुकी थी। उम्र के इस पड़ाव पर शरीर पहले जैसा साथ नहीं देता था। कुछ समय से उन्हें किडनी से जुड़ी परेशानी भी थी, जिसकी वजह से कभी-कभी नींद में उनका बिस्तर गीला हो जाता था।
हर बार ऐसा होने पर उन्हें खुद से ज्यादा अपने बेटे और बहू की चिंता होती थी।
उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ।
सुबह-सुबह मनोहर जी की आंख खुली तो उन्हें एहसास हुआ कि चादर भीग चुकी है। उन्होंने घबराकर चारों तरफ देखा। मन में सबसे पहला ख्याल यही आया कि कहीं बेटा रवि और बहू काजल उन्हें देख न लें।
उन्हें पिछली शाम की बहू की कही बात याद आ गई।
काजल अपने पति से नाराज होकर कह रही थी, “अगर अबकी बार पापा जी ने फिर चादर गीली कर दी तो मैं नहीं साफ करूंगी। रोज-रोज यही सब नहीं हो सकता।”
मनोहर जी ने वह बात सुन ली थी। उन्हें इतना बुरा लगा कि उन्होंने अगले दिन पानी भी कम पीने की कोशिश की, ताकि रात में दोबारा ऐसी स्थिति न बने।
लेकिन बीमारी पर किसी का बस नहीं चलता।
उन्होंने जल्दी से भीगी चादर हटाई और उसे लेकर बाथरूम में पहुंच गए। उनका शरीर कमजोर था, लेकिन मन में एक डर था—बहू को पता चला तो वह नाराज हो जाएगी।
भूख भी लगी थी, मगर हाथ लगातार जल्दी-जल्दी चल रहे थे।
गीली चादर भारी हो गई थी। उसे उठाते-उठाते मनोहर जी की सांस फूलने लगी। तभी अचानक उन्होंने सामने अपने बेटे रवि और बहू काजल को खड़ा देखा।
मनोहर जी घबरा गए।
उन्होंने धीमी आवाज में बस इतना कहा—
“बहू... अब नहीं होगा। मैंने साफ कर दी है।”
रवि तुरंत आगे बढ़ा और अपने पिता को सहारा देकर कुर्सी पर बैठाया।
काजल कुछ कहती, उससे पहले रवि ने उसकी ओर देखा और बोला—
“तुम देख रही हो कि पापा की हालत क्या है? इन्हें अस्पताल ले जाने की जरूरत है, ताना देने की नहीं।”
फिर रवि ने अपने पिता का हाथ पकड़ लिया।
उसकी आंखों में भी भावुकता थी।
वह बोला, “पापा ने बचपन में मेरी कितनी गंदगी साफ की है, कभी मुझे बोझ नहीं समझा। मैं जब छोटा था और कपड़े खराब कर देता था तो पापा ने कभी मुंह नहीं बनाया।”
“एक बार तो मैं उनकी वर्दी पर ही टॉयलेट कर बैठा था। उस दिन पापा किसी सम्मान समारोह में जाने वाले थे। उन्होंने मुझ पर गुस्सा नहीं किया। कपड़े साफ किए और फिर चले गए।”
रवि की आवाज भर्रा गई।
“आज अगर उम्र और बीमारी की वजह से उनसे बिस्तर गीला हो गया है तो इसमें उनकी क्या गलती है? जिस पिता ने मेरे बचपन को संभाला, मैं उनके बुढ़ापे को कैसे नहीं संभाल सकता?”
कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
मनोहर जी की आंखों से आंसू बहने लगे।
रवि ने नई चादर निकाली और बिस्तर पर बिछा दी। उसने पिता के गीले कपड़े बदले और उन्हें आराम से बैठाया।
फिर मुस्कुराकर बोला—
“पापा, आपको भूख लगी होगी। मैं आपके लिए चाय बनाता हूं।”
कुछ देर बाद रवि अपने हाथों से चाय लेकर आया और पिता को पिलाने लगा।
कांपते हुए मनोहर जी ने अपना हाथ बेटे के सिर पर रख दिया। उनके होंठ कुछ कह नहीं पा रहे थे। आंखों से आंसू लगातार बह रहे थे।
सामने दीवार पर उनकी दिवंगत पत्नी विमला की तस्वीर लगी थी।
मनोहर जी ने तस्वीर की ओर देखा और मन ही मन कहा—
“विमला, तुम कहती थीं न कि मेरे बाद इस बूढ़े का कौन ख्याल रखेगा? देख... हमारा रवि आज अपने बूढ़े बाप को संभाल रहा है।”
दरवाजे के पास खड़ी काजल सब सुन रही थी।
उसकी आंखों से भी आंसू निकल रहे थे।
उसे शायद पहली बार एहसास हुआ कि बीमारी और बुढ़ापा किसी इंसान की इज्जत या उसके महत्व को कम नहीं करते। जिस तरह एक माता-पिता अपने बच्चों की बेबसी में उनका हाथ नहीं छोड़ते, उसी तरह बुढ़ापे में उन्हें भी सहारे और सम्मान की जरूरत होती है।
कहानी का संदेश:
माता-पिता का बुढ़ापा उनकी कमजोरी नहीं, बल्कि हमारे संस्कारों की परीक्षा का समय होता है। उन्होंने बचपन में हमारी मजबूरियां संभाली थीं; जब उनकी उम्र उन्हें मजबूर करे, तब हमारा हाथ उनके साथ होना चाहिए।
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