देवात्मा और परमात्मा में क्या अंतर है? दादाजी ने दीपक और सूर्य के उदाहरण से नकुल को समझाया गहरा रहस्य

हिमाचल के सुरम्य पहाड़ों के बीच बसे 'ज्ञानगिरि' गाँव में नकुल नाम का एक जिज्ञासु बालक रहता था। अक्सर ढलती शाम को वह अपने दादाजी के साथ नदी किनारे टहलने जाया करता था।

​एक दिन नकुल ने पूछा, "दादाजी, हम मंदिर में देवी-देवताओं को भी पूजते हैं और ईश्वर को भी याद करते हैं। यह देवात्मा और परमात्मा में क्या अंतर है?"

​दादाजी मुस्कुराए। उन्होंने नदी किनारे से मिट्टी का एक छोटा सा दीपक उठाया, उसमें तेल डाला और उसे जला दिया। अंधकार में दीये की लौ टिमटिमाने लगी।

​दादाजी ने कहा, "नकुल, इस दीपक को देखो। यह देवात्मा है। यह मिट्टी और तेल रूपी शरीर से बँधा है, लेकिन इसके भीतर का प्रकाश अत्यंत पवित्र और निर्मल है। जो आत्मा अपने जीवन में सत्कर्म, तपस्या और ज्ञान से इतनी उच्च हो जाती है कि दूसरों का मार्ग रोशन करे, वह देवात्मा कहलाती है—जैसे हमारे पूज्य देवी-देवता, ऋषि-मुनि और महापुरुष।"

​नकुल ने कौतूहल से पूछा, "और परमात्मा?"

​दादाजी ने आसमान की ओर इशारा करते हुए कहा, "अब कल्पना करो उस असीम, अनंत सूर्य की! जो बिना किसी मिट्टी या तेल के पूरे ब्रह्मांड को जीवन और प्रकाश देता है। वह सर्वव्यापी, निराकार और परम शक्ति ही परमात्मा है। वह किसी एक रूप या बंधन में सीमित नहीं है।"

​दीपक की लौ हवा में मुस्कुरा रही थी। दादाजी ने बात पूरी करते हुए कहा, "दीपक का प्रकाश भी उसी सूर्य की ऊष्मा का अंश है। ठीक वैसे ही, देवात्मा वह है जिसने ईश्वर के गुणों को अपने भीतर उतारा है, और परमात्मा वह स्वयं परमेश्वर है जहाँ से संपूर्ण सृष्टि और समस्त आत्माओं का उद्गम होता है।"

​नकुल जलते हुए दीपक को देखने लगा। उसके मन का भ्रम दूर हो चुका था—उसे समझ आ गया था कि राह दिखाने वाला दीपक देवात्मा है, और संपूर्ण जगत् को प्रकाशित करने वाला अनंत सूर्य परमात्मा।

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