एक शहर में रामलीला का आयोजन चल रहा था। मंच सज चुका था और कलाकार अपनी-अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार थे। लेकिन ऐन वक्त पर हनुमान जी का किरदार निभाने वाले कलाकार को तेज बुखार हो गया। आयोजकों के सामने बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई कि अब हनुमान जी का रोल कौन करेगा।
काफी सोच-विचार के बाद उनकी नजर पास की दुकान पर बैठे एक हलवाई पर पड़ी। आयोजक उसके पास पहुंचे और बोले, “भाई, आज तुम ही हनुमान जी का रोल कर दो।”
हलवाई पहले तो थोड़ा घबराया। उसने कहा, “रोल तो कर दूंगा, लेकिन मुझे रामलीला में कुछ आता-जाता नहीं है। मुझे कैसे पता क्या बोलना है और क्या करना है?”
आयोजकों ने उसे समझाया, “बहुत आसान है। तुम्हें ज्यादा कुछ नहीं करना। जब रावण मंच पर आएगा और तुमसे पूछेगा कि ‘कौन है तू?’ तो बस कहना—‘मैं श्रीराम का दूत हनुमान हूं।’ इसके बाद कुछ देर ‘जय श्रीराम, जय श्रीराम’ के नारे लगाने हैं। बस, तुम्हारा पार्ट खत्म।”
हलवाई ने पूछा, “बस इतना ही?”
आयोजकों ने कहा, “हां भाई, इससे ज्यादा कुछ नहीं करना है।”
हलवाई को लगा कि काम तो बेहद आसान है। उसने तुरंत हामी भर दी।
कुछ देर बाद रामलीला शुरू हुई। हलवाई ने हनुमान जी का वेश धारण किया और पूरे आत्मविश्वास के साथ मंच पर पहुंच गया। दर्शक भी उत्सुकता से देखने लगे कि नया कलाकार हनुमान जी का किरदार कैसे निभाता है।
तभी मंच पर रावण की एंट्री हुई।
रावण ने आते ही जोरदार अंदाज में अपनी तलवार निकाल ली। हलवाई को इसकी बिल्कुल जानकारी नहीं दी गई थी। जैसे ही उसकी नजर रावण की चमचमाती तलवार पर पड़ी, उसके हाथ-पांव फूल गए।
रावण ने तलवार लहराते हुए गरजकर पूछा—
“कौन है तू?”
अब तक हलवाई को आयोजकों की सारी बातें याद थीं। लेकिन सामने तलवार देखकर वह डर गया और हनुमान जी का पूरा संवाद उसके दिमाग से निकल गया।
उसने घबराकर हाथ जोड़ दिए और बोला—
“भाई, मैं तो पड़ोस का हलवाई हूं… खा-कमा लेने दे!”
मंच पर सन्नाटा छा गया और अगले ही पल दर्शकों की हंसी छूट गई। आयोजक भी सिर पकड़कर रह गए कि जिस संवाद को कुछ देर पहले हलवाई को रटवाया गया था, रावण की तलवार देखते ही वह सब भूल गया।
कहानी भले ही मजाकिया अंदाज में कही गई हो, लेकिन इसका सबसे मजेदार हिस्सा यही है कि मंच पर अभिनय करने के लिए आत्मविश्वास जरूरी है, लेकिन अचानक सामने तलवार आ जाए तो बड़े-बड़े कलाकार भी अपनी स्क्रिप्ट भूल सकते हैं!
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