सूखी जमीन जोतते-जोतते ऊब गया दामाद, ससुराल में मिला कीचड़ वाला उपजाऊ ‘खेत’, फिर जो हुआ वह बेहद मजेदार है


कानपुर देहात का मामला है, जहाँ चार वर्ष पूर्व एक युवक का विवाह हुआ। उसकी पत्नी अत्यंत सुंदर थी। सामान्यतः जैसे दामाद का ससुराल में आना-जाना होता है, वैसे ही उनका भी नियमित आना-जाना बना रहता था। किंतु इस सामान्य आवागमन के क्रम में कुछ असामान्य घटनाएँ घटित होने लगीं।

दामाद जी निस्संदेह हृष्ट-पुष्ट और बलशाली युवक थे तथा हल चलाने की कला में भी निपुण थे। किंतु उन्हें सूखी अथवा कठोर भूमि जोतने में विशेष आनंद नहीं आता था। उन्हें तो दलदली और कीचड़युक्त खेत जोतना अधिक प्रिय था। बुजुर्ग लोग भी कहा करते हैं कि वास्तविक हलवाहे की पहचान और परीक्षा तो कीचड़युक्त खेतों में ही होती है। सूखी भूमि में तो नए हलवाहों को अभ्यास कराया जाता है, ताकि बैलों को कोई चोट न पहुँचे। जब वे साधारण खेतों में निपुण हो जाते हैं, तब उन्हें कठिन और दलदली खेतों में उतारा जाता है।

सूखी भूमि में हल चलाते समय यह भय बना रहता है कि कहीं कोई पत्थर अथवा जड़ न आ जाए, अन्यथा हल का फाल टूट सकता है। वहीं कीचड़युक्त खेतों में ऐसी समस्या नहीं होती। वहाँ तो ऐसा प्रतीत होता है मानो सहजता और चिकनाई के बीच हल चलाया जा रहा हो। चारों ओर पानी, छप-छप की ध्वनियाँ, और गहराई में धँसते पैरों को बल लगाकर बाहर निकालते हुए हल चलाना पड़ता है। ऐसे खेतों में अनुभवी हलवाहे की ही आवश्यकता होती है।

अब कानपुर देहात के ये हरहवा बाबू भी सूखी भूमि जोतते-जोतते ऊब चुके थे। उन्हें लगने लगा था कि अब वे पूर्णतः दक्ष हो चुके हैं और उन्हें अब अधिक उपजाऊ तथा चुनौतीपूर्ण खेत चाहिए।

इसी खोज में उन्हें एक अत्यंत उपजाऊ और उत्तम खेत प्राप्त हुआ — उनकी सास के रूप में। इस खेत का पूर्व हलवाहा अब वृद्ध हो चुका था। खेत में उतरना भी उसके लिए कठिन हो गया था। यदि उतर भी जाता, तो धँसे हुए पैर निकालने में ही उसकी सारी शक्ति समाप्त हो जाती। खेत अत्यंत उपजाऊ था, उसे किसी खाद या उर्वरक की आवश्यकता भी नहीं थी, किंतु योग्य हलवाहे के अभाव में वह वर्षों से परती पड़ा हुआ था।

एक योग्य हलवाहे की यही पहचान होती है कि वह किसी भी खेत को परती न रहने दे, विशेषकर तब जब खेत इतना उपजाऊ हो।

खेत को एक समर्थ और अनुभवी हलवाहे की आवश्यकता थी और हलवाहे को एक ऐसे खेत की, जहाँ वह अपने कौशल का प्रदर्शन कर सके।

प्रकृति ने इन दोनों आवश्यकताओं को एक-दूसरे के समीप ला दिया। वर्षा की हल्की फुहारों के बीच वर्षों से परती पड़े उस खेत में एक बलशाली हलवाहा अपना हल लेकर उतरा। उसने ऐसी गहरी जुताई की कि खेत पूर्णतः मुलायम हो गया। सारी घास-फूस और खरपतवार मिट्टी में मिल गए। उसने इतनी गहराई तक हल चलाया कि भीतर छिपी मछलियाँ तक बाहर आ गईं।

वह उपजाऊ खेत अत्यंत संतुष्ट था। वर्षों बाद कोई ऐसा हलवाहा मिला था, जिसने पूरे मनोयोग से उसकी जुताई की थी। उसे ऐसा प्रतीत हुआ मानो वह इसी हलवाहे की प्रतीक्षा वर्षों से कर रहा था। अब वह उसे छोड़ना नहीं चाहता था। उसने निश्चय कर लिया कि अब यही उसका स्थायी हलवाहा रहेगा। जब जुताई इतनी उत्तम हो, तो फसल भी अवश्य ही लहलहाती हुई निकलेगी।

अंततः हरहवा जी उस खेत की रजिस्ट्री कराने कानपुर विवाह न्यायालय पहुँच गए और विधिवत विवाह कर लिया।

अब हरहवा जी पूरे उत्साह से उस उपजाऊ खेत को जोतेंगे और लहलहाती फसल काटेंगे।

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