हर आरती की अंतिम लाइन में कहत सिवानंद स्वामी क्यों लिखा होता है और सिवानंद स्वामी कौन है?


अरे बबुआ, तूने एकदम सिस्टम हिलाने वाला सवाल दाग दिया है! सीन ये है कि तू जब भी किसी मंदिर या घर की पूजा में ताली बजा-बजा के "कहत सिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे" चिल्लाता है, तो तेरे को लगता होगा कि ये शिवानंद बाबा हर भगवान की आरती के एंड में जबरदस्ती अपनी एंट्री क्यों ठोक रहे हैं? पर असली फैक्ट ये है कि हर आरती में उनका नाम नहीं होता, बल्कि जो पूरे उत्तर भारत की सबसे वायरल आरती है—"ओम जय जगदीश हरे"—ये ट्रेडमार्क लाइन उसी की है। बाकी आरतियों में तो उनके अपने राइटर्स का नाम चिपकता है, जैसे दुर्गा जी की आरती में 'ध्यावे प्रणव शिवरी' टाइप सीन रहता है या अम्बे माँ की आरती में 'कहत शिवानंद स्वामी' भी आता है क्योंकि वो भी इन्हीं बाबा की कलम का कमाल था। पुरानी भक्ति परम्परा में कॉपीराइट का रूल यही था भाई, जिसे 'छाप' या 'भणिता' बोलते हैं; मतलब जैसे आज के रैपर अपने गानों के बीच में "इट्स योर बॉय बादशाााह" या "डिवाइन" चिल्ला के अपना वॉटरमार्क मारते हैं, वैसे ही पुराने संत-कवि अपनी कविता के लास्ट पैराग्राफ में अपना नाम ठोक देते थे ताकि कोई दूसरा उनका कंटेंट चुरा के अपना क्रेडिट न ले उड़े।

अब तू सोच रहा होगा कि ये शिवानंद स्वामी हैं कौन, जिन्होंने 16वीं सदी में ऐसा तगड़ा भजन लिखा कि आज सदियों बाद भी हर सत्संग का डीजे इन्हीं के बोल पे बजता है? तो बॉस, कान खोल के सुन, इतिहास में दो मेन थ्योरी चलती हैं। पहली और सबसे तगड़ी थ्योरी ये है कि ये गुजरात के वलसाड/सूरत इलाके के रहने वाले एक जबरदस्त शिव-विष्णु भक्त संत थे, जो 16वीं सदी के आस-पास हुए। कहते हैं कि वो जन्म से या किसी बीमारी की वजह से काफी लाचार थे, पर भगवान की भक्ति में उनका ऐसा लेवल सेट हुआ कि उन्होंने 'ओम जय जगदीश हरे' और 'जय आद्य शक्ति' जैसी कालजयी आरतियां रचीं।

 कई लोग यहाँ भारी कन्फ्यूजन पाल लेते हैं और 19वीं सदी वाले पंजाब के पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी को इसका क्रेडिट दे देते हैं। असली सीन ये है कि 1870 के दशक में फिल्लौरी जी ने इसी आरती को री-राइट, पॉलिश और इतना प्रमोट किया कि वो पंजाब से निकलकर पूरे भारत में आग की तरह फैल गई, लेकिन उन्होंने भी ओरिजिनल रचयिता का सम्मान करते हुए आखिरी लाइन से "कहत सिवानंद स्वामी" का क्रेडिट नहीं हटाया।

तो कुल मिलाकर सीन एकदम शीशे जैसा साफ है—ये कोई गलती या स्पैम नहीं, बल्कि प्रॉपर रॉयल रॉयल्टी और ओरिजिनल ओनरशिप का मामला है। संत शिवानंद स्वामी ने अपनी कलम से भगवान की ऐसी महिमा गाई कि उन्होंने लास्ट में लिख दिया कि जो भी इस भाव से आरती गाएगा, उसको 'मनवांछित फल' (यानी मनचाहा वरदान) मिलेगा।


 जब बाद में प्रिंटिंग प्रेस आई और गीता प्रेस गोरखपुर जैसी बड़ी-बड़ी कंपनियों ने आरतियों की किताबें घर-घर छापना शुरू की, तो उन्होंने ओरिजिनल लिरिक्स के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की। इसलिए आज जब तू हाथ में कपूर की थाली लेके मस्त मगन हो के घूमता है, तो तू अनजाने में सदियों पुराने उस संत का नाम ले रहा होता है, जिसने ये अमर लाइनें रची थीं—और इसी को बोलते हैं असली ऑर्गेनिक रीच, जो बिना किसी सोशल मीडिया पेड प्रमोशन के सैकड़ों साल से बिना रुके नंबर 1 पे ट्रेंड कर रही है!

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