पत्नी बिमला की मौत के बाद राख में हाथ डालकर रोता रहा विद्याधर, साधु ने कमंडल पटककर जो सबक सिखाया उसने बदल दी पूरी जिंदगी


एक गरीब आदमी फूल और इत्र बेचने का काम करता था लेकिन भगवान में इतनी आस्था रखता था कि दुकान खोलते ही सबसे पहले फूलों की माला और इत्र भगवान शिव को अर्पित किया करता था। एक दिन बड़ी मूसलाधार बारिश हो रही थी सबकुछ बह निकला, लेकिन वह घर से निकल पड़ा उसकी पत्नी और पड़ोसियों ने कहा कि ऐसे मौसम में कौन फूल और इत्र खरीदने आएगा क्यों जान जोखिम में डालते ही घर पर ही रहो।

लेकिन वह आदमी बोला कि दुकान की तो देखी जाएगी पर भगवान को माला और इत्र अर्पित करना है उसके बाद लौट आउंगा। जैसे तैसे करके वह दुकान पहुंचा तो बारिश इतनी तेज हो गई कि वह बह गया और उसकी मौत हो गई। पर कहते हैं कि सत्कर्म काम आते हैं। उसका अगला जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ, विद्याधर नाम रखा गया। कांशी में पढ़ाई हुई सम्मोहन विद्या, चारों वेद, उपनिषद, पुराण सब कुछ पढ़ लिया। इतना प्रकांड विद्वान बना कि भूत भविष्य सब बता देता था।

दूर दूर से लोग आते थे अपने कष्ट लेकर और समाधान पाकर प्रसन्नचित्त लौट जाते, लेकिन किस्मत का लेख उसकी पत्नी जिसका नाम बिमला था बड़ी कलह करने वाली थी सारा दिन झगड़ा करती रहती। एक बार उस राज्य के राजा के सिर में दर्द हो गया, सभी प्रकार के वैद्य बुलाए लेकिन सिरदर्द ऐसा की ठीक न हो।

किसी ने राजा को बताया कि राजा साहब अपने राज्य में पंडित विद्याधर जी की बड़ी ख्याति फैली हुई है, सब वैद्य बुला लिए कुछ आराम नहीं एक बार पंडित जी को भी बुलाकर देख लो। राजा ने अपना वजीर विद्याधर जी के यहां भेजा, जब वजीर उनके घर पहुंचा तो बिमला बेलन लेकर विद्याधर के पीछे लगी हुई थी, वजीर को देखकर वह रूक गई। वजीर ने कहा कि पंडितजी राजा ने आपको बुलाया है कुछ समस्या है आप चलिए। विद्याधर जी वजीर के साथ दरबार पहुंचे।

राजा ने बताया कि मुझे लगातार सिरदर्द हो रहा है और ठीक होने का नाम नहीं ले रहा। विद्याधर ने कहा कि महाराज आप पिछले जन्म में तपस्वी थे, आप तपस्या कर रहे थे तभी एक तुफान आया और एक वृक्ष की मोटी टहनी टूटकर आपके सिर पर लगी और आपकी मौत हो गई, चुंकि आप उस समय ध्यान में थे तो वही दर्द अब तकलीफ दे रहा है, कुदरती आपके महल में जो शहतीर लगा हुआ है ये उसी पेड़ का है।

राजा ने कहा कि इसका क्या इलाज हो? पंडितजी ने कहा कि ये शहतीर बदलवा लिजिए। राजा ने शहतीर क्या छत ही बदलवा ली और उसके सिर का दर्द ठीक हो गया। राजा ने पंडितजी को बड़ी धनमाया दी और फिर पुछा कि पंडितजी आप भूत भविष्य जानते हैं लेकिन आपकी पत्नी इतनी क्लेशी क्यों है? जो आपको सदैव दुख देती रहती है?

पंडितजी ने बताया कि जी मेरी पत्नी पिछले जन्म में ऊंट थी और एक किसान का हल खिंचती थी इसके पैर में हल लग गया और जख्म हो गया, मैं उस समय कव्वे की योनि में था और इसके जख्म को नोचकर खाया करता था। जबतक मैंने इसका जीतना खुन पिया था ये उसका बदला नहीं ले लेगी तबतक मुझे ऐसे ही कष्ट देती रहेगी।

राजा ने विद्याधर और बिमला को अपने महल में बुला लिया और वहीं एक बड़ा कमरा दे दिया, पहले कहीं खून निकालना होता तो उसके लिए एक पद होता था जिसका नाम होता था जर्राह, ये लोग खून निकालने के एक्सपर्ट होते थे। तो राजा ने जर्राह को बुलाकर पंडितजी का खून निकलवाया और अपनी रानी को देते हुए कहा कि इससे ऐसे लड्डू तैयार करवा कि रोज एक लड्डू बिमला को दे सकें। लड्डू तैयार हुए और वो भी राजा की रसोई में, तो लड्डू बड़े स्वादिष्ट थे।

रोज एक लड्डू बिमला को दिया जाता, जैसे जैसे बिमला लड्डू खाती गई बिल्कुल सीधी होती चली गई। जबतक वह लड्डू खत्म हुए बिमला का कायापलट हो गया, वो इतनी स्वामीभक्त बन गई जिसका कोई तोड़ नहीं हो। पंडित विद्याधर का अपनी पत्नी से इतना लगाव पैदा हो गया कि इतनी सेवा कोई कर ही नहीं सकता, इससे बड़ी पतिव्रता समाज में ही नहीं।

ऐसे सेवा करते करते क‌ई साल बीत गए। जब घर में सबकुछ सही चल रहा होता है तो आदमी भूल जाता है कि मैं संसार में क्या करने आया था? एक दिन रानी बड़ी मायूस थी तो बिमला ने पूछा कि पटरानी तू इतनी उदास क्यों है? रानी ने कहा कि क्या बताऊं मेरा भाई गुजर गया और उसकी पत्नी बहुत अच्छी औरत है लेकिन बेचारी को सती होना पड़ेगा। बिमला ने कहा कि इतनी बड़ी बात नहीं कि आप दुखी हों अगर वह इतनी सीधी औरत है तो सती होने की आवश्यकता ही क्या थी? उसे तो जब आपका भाई मरा तभी उसके प्राण निकल जाने चाहिए थे।

रानी ने कहा कि बिमला बहुत बड़ी बात कह दी तुमने तो? बिमला बोली कि पतिव्रता होती तो साथ में ही प्राण निकल जाते। रानी ने सोचा कि क्यों न बिमला की परीक्षा ली जाए कि बिमला कैसी है?

एक दिन पंडितजी किसी काम से बाहर गए, तो रानी ने पंडितजी जैसे वस्त्रों को हिरन के खून में भिगोया और बिमला के पास पहुंची बोली बिमला आज गजब हो गया राजा ने पंडितजी को किसी काम से भेजा था और रास्ते में उन्हें शेर खा गया। एकदम बिमला के मुंह से निकला हैं? और हैं कहते ही बिमला ने प्राण त्याग दिए। रानी को बड़ा दुख हुआ कि ये तो सच कहती थी और बड़ी पतिव्रता नारी थी। राजकीय सम्मान के साथ बिमला का अंतिम संस्कार किया गया, अंतिम संस्कार के बाद सभी वापस लौट आए लेकिन विद्याधर वहीं बैठे राख में हाथ मार रहे और बारंबार चिल्लाते हाय बिमला हाय बिमला।

सभी लोग पंडितजी को देखकर कहते कि इतना बड़ा विद्वान और कैसे पत्नी को रो रहा है? जब पंडित जी को क‌ई दिन रोते हो ग‌ए तो वहां से एक साधू गुजरा उसने देखा कि कोई बारंबार राख में हाथ फेर रहा है और बिमला बिमला करके रो रहा है। साधू ने पूछा कि भाई क्यों रो रहे हो और ये बिमला कौन थी?

पंडित विद्याधर ने कहा कि जी बिमला मेरी घरवाली थी और मुझे छोड़कर चली गई अब मैं जीवन कैसे काटूं इसलिए रो रहा हूं। साधू के हाथ में कमंडल था, उसने जोर से कमंडल पटक दिया और बैठकर रोने लगा कि हाय कमंडल हाय कमंडल। पंडितजी ने कहा कि महात्मा जी ये क्या बात हुई ऐसे ऐसे 10 कमंडल ला दूं क्यों रो रहे हो?

साधू ने कहा कि मैं भी वैसी दस बिमला ला दूं क्या तू विवाह कर लेगा? नहीं ना तो मुझे भी वही कमंडल चाहिए। कहते हैं बात की चोट गहरी होती है, उसे याद आया कि तू तो पंडित विद्याधर है और ये जो बिमला थी ये तो अस्थाई है, पंडित विद्याधर भी अस्थाई है। देर सवेर सबको इस दुनिया से जाना है लेकिन जिस उद्देश्य से हम दुनिया में आए हैं , अपनी जिम्मेदारियां पूरी करना, दान धर्म करना, अच्छे कर्म करना ही परम उद्देश्य है ताकि दुनिया याद रखे।

विद्याधर को उस दिन समझ आया कि बिमला से उसका प्रेम गलत नहीं था, लेकिन बिमला को ही अपना पूरा संसार समझ लेना भूल थी। संसार में कोई किसी का स्थायी साथी नहीं है। आदमी आता है, अपनी भूमिका निभाता है और चला जाता है। पीछे रह जाते हैं उसके कर्म। इंसान के जाने के बाद उसकी दौलत नहीं, उसका व्यवहार और उसके कर्म ही लोगों की जुबान पर जिंदा रहते हैं।

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