श्रद्धा के बिना गंगास्नान अधूरा है
एक बार भगवान शिव और माता पार्वती हरिद्वार में विचरण कर रहे थे। गंगा तट पर अपार जनसमूह स्नान कर रहा था। हर ओर "हर-हर गंगे" का जयघोष गूँज रहा था। लेकिन माता पार्वती ने देखा कि गंगा स्नान करने वाले अधिकांश लोग अभी भी दुखी, चिंतित और पापपूर्ण आचरण में लिप्त हैं।
माता ने आश्चर्य से भगवान शिव से पूछा,
"प्रभु! यदि माँ गंगा समस्त पापों का नाश करती हैं, तो फिर इतने लोग स्नान करने के बाद भी दुःख और पाप से मुक्त क्यों नहीं हुए?"
भगवान शिव मुस्कुराए और बोले,
"देवि, गंगा की महिमा आज भी उतनी ही महान है। किंतु इन लोगों ने केवल शरीर को जल में डुबोया है, श्रद्धा और पूर्ण विश्वास से गंगास्नान नहीं किया। जहाँ विश्वास नहीं, वहाँ पूर्ण फल कैसे मिलेगा?"
माता पार्वती को यह बात समझ में नहीं आई। तब भगवान शिव ने कहा,
"कल मैं तुम्हें इसका रहस्य प्रत्यक्ष दिखाऊँगा।"
अगले दिन तेज वर्षा हुई। मार्ग कीचड़ से भर गए और एक स्थान पर गहरा गड्ढा बन गया। भगवान शिव ने एक वृद्ध असहाय व्यक्ति का रूप धारण किया और उसी गड्ढे में गिर पड़े। उन्होंने माता पार्वती से कहा कि वे लोगों से सहायता माँगें और साथ ही यह भी कहें—
"मेरे पति निष्पाप हैं। उन्हें वही व्यक्ति हाथ लगाए जो स्वयं भी सर्वथा निष्पाप हो, अन्यथा वह भस्म हो जाएगा।"
माता पार्वती राहगीरों से विनती करने लगीं। गंगा स्नान करके लौट रहे असंख्य लोग वहाँ से गुज़रे। किसी ने उपेक्षा की, किसी ने मज़ाक उड़ाया, तो किसी के मन में दया तो आई, पर अपने पापों का स्मरण होते ही वह पीछे हट गया।
सबके मन में यही विचार था—
"हम गंगा में स्नान करके तो आए हैं, लेकिन क्या सचमुच निष्पाप हो गए हैं?"
धीरे-धीरे पूरा दिन बीत गया, पर कोई भी उस वृद्ध को बाहर निकालने का साहस नहीं कर पाया।
संध्या के समय एक युवा "हर-हर गंगे" का जयघोष करता हुआ वहाँ पहुँचा। माता पार्वती ने उसे भी वही बात बताई।
युवक ने बिना किसी भय के उत्तर दिया—
"माता! मैं अभी श्रद्धा और विश्वास के साथ माँ गंगा में स्नान करके आया हूँ। यदि गंगा मेरे पाप भी न मिटा सके, तो फिर उनकी महिमा ही क्या? मुझे पूर्ण विश्वास है कि माँ गंगा ने मुझे पवित्र कर दिया है।"
इतना कहकर उसने तुरंत वृद्ध को गड्ढे से बाहर निकाल लिया।
उसी क्षण भगवान शिव और माता पार्वती अपने दिव्य स्वरूप में प्रकट हुए। युवक ने उनके चरणों में प्रणाम किया और स्वयं को धन्य समझा।
भगवान शिव मुस्कुराकर माता पार्वती से बोले—
"देवि, आज इतने लोगों में केवल इसी युवक ने सच्चे मन, अटूट श्रद्धा और पूर्ण विश्वास के साथ गंगास्नान किया था। बाकी लोग केवल जल में डुबकी लगाकर लौट आए थे।"
कथा का संदेश
सिर्फ बाहरी आडंबर, कर्मकांड या दिखावे से आध्यात्मिक लाभ प्राप्त नहीं होता। जब पूजा, जप, दान, तीर्थ या गंगास्नान श्रद्धा, विश्वास और निर्मल हृदय से किया जाता है, तभी उसका वास्तविक फल मिलता है।
माँ गंगा सदैव पापों का नाश करने वाली हैं, किंतु उनकी कृपा उसी पर बरसती है जो पूर्ण आस्था और समर्पण के साथ उनकी शरण में जाता है।
हर-हर गंगे!
हर-हर महादेव!
ॐ नमः शिवाय।
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