एक छोटी सी मकड़ी ने सोचा कि वह एक बड़ा और सुंदर जाला बनाएगी, जिसमें ढेर सारे कीड़े-मकोड़े फँसेंगे और वह आराम से अपना जीवन बिताएगी। उसने उत्साह के साथ एक घर के कोने में जाला बुनना शुरू कर दिया।
तभी वहाँ से गुज़र रही एक बिल्ली ने उससे कहा, "अरे मकड़ी! इस कोने में जाला क्यों बना रही हो? यहाँ तो मक्खियाँ आती ही नहीं।" मकड़ी को बिल्ली की बात सही लगी, उसने अपना काम वहीं रोक दिया और जाला अधूरा छोड़ दिया।
इसके बाद उसने खिड़की के पास नया जाला बनाना शुरू किया। अभी थोड़ा ही काम हुआ था कि एक चिड़िया आकर बोली, "यहाँ खिड़की पर जाला मत बनाओ, जब भी तेज़ हवा चलेगी, तुम्हारा जाला टूट जाएगा।" मकड़ी चिड़िया की बात सुनकर डर गई और उसने वहाँ भी काम अधूरा छोड़ दिया।
फिर मकड़ी ने सोचा कि कमरे में रखी पुरानी अलमारी के अंदर जाला बनाना सुरक्षित रहेगा। वह अभी अलमारी के कोने में धागे पिरो ही रही थी कि एक चूहा वहाँ आया और बोला, "यहाँ जाला मत बनाओ, मकान मालिक इस पुरानी अलमारी को बेचने वाला है।" मकड़ी ने चूहे की बात भी मान ली और जाला बनाना बंद कर दिया।
बार-बार दूसरों की बातों में आकर अपना काम बदलने और नया जाला बनाने में मकड़ी की सारी ताकत और समय समाप्त हो गए। अब वह थककर पस्त हो चुकी थी और उसके पास इतनी ऊर्जा भी नहीं बची थी कि वह नया जाला बुन सके।
दुखी होकर वह दीवार के कोने में बैठ गई। तभी वहाँ से एक चींटी गुज़र रही थी। मकड़ी ने अपनी आपबीती सुनाते हुए उससे मदद माँगी।
चींटी ने मुस्कुराते हुए कहा, "हे मित्र! तुम्हारी इस हालत की ज़िम्मेदार तुम खुद हो। तुम हर बार नया काम शुरू तो करती थी, लेकिन दूसरों की कही बातों में आकर अपने लक्ष्य को अधूरा छोड़ देती थी। यदि तुमने दूसरों की बातों में आने के बजाय अपने काम पर ध्यान दिया होता, तो आज तुम्हारा सुंदर जाला तैयार होता।"
चींटी की बात सुनकर मकड़ी को अपनी भूल का अहसास हो गया।
दूसरों की सलाह सुनना अच्छी बात है, लेकिन अपने लक्ष्य और फैसले अपनी समझ और विवेक के आधार पर ही लेने चाहिए। दूसरों के विचारों से भटकने वाले लोग अक्सर अपनी मंजिल तक नहीं पहुँच पाते।
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