हलवे में घुली अक्ल
एक बार एक ब्राह्मण और एक बनिया की दोस्ती हो गई। बनिया ने ब्राह्मण से कहा कि मित्र आप यहां आते हैं मैं हर बार आपको कुछ न कुछ खिलाता पिलाता हूं एक दिन तुम मुझे निमंत्रण दो और हलवा खिलाओ।
ब्राह्मण ने कहा कि अरे सेठजी ये भी कोई बड़ी बात है आप कभी भी आ जाओ मैं आपको उत्तम दर्जे का हलवा खिलाऊंगा ऐसा हलवा आपने कभी नहीं खाया होगा। दोनों ने दिन फिक्स कर लिया और तय समय पर बनिया ब्राह्मण के घर पहुंच गया।
ब्राह्मण ने हलवा प्रस्तुत किया तो उस बर्तन में हाथ जा तो सकता था मगर मुट्ठी बंद करके बाहर नहीं आ सकता था और चम्मच अंदर डालें तो सीधा करके बाहर न निकले, तो बनिया करे तो क्या करे? हलवा खाने का मन कर रहा लेकिन हलवा बाहर न आए। ब्राह्मण ने कहा कि सेठजी खाओ हलवा! बनिया ने कहा कि अरे पंडित जी मैं भूल गया था कि आज मेरा व्रत है मैं फिर कभी आऊंगा।
अगले दिन बनिया ने ब्राह्मण से कहा कि पंडितजी आज मैं आपको हलवा खिलाऊंगा आप आइए, ब्राह्मण खाने पर बैठा तो बनिया ने ठीक वैसे ही बर्तन में हलवा परोसा जैसा ब्राह्मण ने दिया था। ब्राह्मण समझ गया कि लालाजी मेरी ट्रिक मुझी पर इस्तेमाल कर रहे हैं तो ब्राह्मण ने कहा सेठजी हलवे से बड़ी अच्छी खुशबू आ रही है लेकिन इसमें घी कम है तो आप थोड़ा घी लाएं सेठ ने घी का लौटा मंगवाया क्योंकि उसे पता था कि खा तो सकता नहीं हलवा भी तेरे घर रहेगा और घी भी तेरे घर रहेगा लेकिन ब्राह्मण ने उस घी को हलवे में डाल दिया और चम्मच से घोलने लगा जब घी घुल गया और हलवे की रबड़ी बन गई तो ब्राह्मण ने हलवे का पात्र मुंह से लगाया और पी गया।
बनिया ने सोचा यार ये मुझे क्यों नहीं सुझा मैं तो इसे निरा पोंगा पंडित समझता था मगर ये तो बड़ा तेज निकला। कुछ दिन बाद बनिया ने फिर बदला लेने का विचार किया और ब्राह्मण से कहा कि पंडितजी आज मैं आपके घर हलवा खाने आऊंगा और मेरा एक दोस्त भी साथ आएगा, ब्राह्मण ने कहा कि कोई बात नहीं सेठजी आइए खिला देंगे।
सेठ और उसका दोस्त ब्राह्मण के घर पहुंचे सेठ ने कहा कि पंडितजी पिछली बार की तरह हलवा मत परोसना कि हम खा न सकें आप थाली में हलवा दें साथ में चम्मच भी दें ताकि हम आराम से खा सकें। ब्राह्मण ने कहा कि ठीक है पंडित जी ऐसा ही सही।
ब्राह्मण दोनों के सामने थालियों में हलवा परोसा और चम्मच साथ में रखीं, जैसे ही खाने के लिए हाथ आगे बढ़ाया ब्राह्मण बोल उठा कि अरे सेठजी हमारे यहां एक रिवाज है अगर आप बूरा न मानें तो क्या हम उसे पूरा कर सकते हैं? बनिया ने कहा क्यों नहीं जरूर। तभी ब्राह्मण ढाई ढाई फुट लंबी चार लकड़ी और रस्सी लेकर आया और बनिया और उसके दोस्त की कलाई से लेकर कंधे तक बांध दीं इस ढंग से की वे हलवा चम्मच से उठा तो सकते थे लेकिन हाथ मुड़ता नहीं तो खा भी नहीं सकते। बड़ी जद्दोजहद के बावजूद बनिया और उसका दोस्त हलवा न खा सके अंततः उन्हें जाना पड़ा।
अगले दिन बनिया ने ब्राह्मण से कहा कि आज मैं आपको हलवा खिलाऊंगा आप अपने दोस्त को लेकर आ जाइए, ब्राह्मण और उसका दोस्त बनिया के घर पहुंचे तो बनिया ने सुंदर प्लेटों में हलवा परोसा सामने चम्मच भी रखीं थीं लेकिन जैसे ही ब्राह्मण और उसका दोस्त हलवा खाने के लिए तैयार हुए बनिया ने कहा कि पंडितजी रूकिए, जैसे आपके यहां रिवाज़ थी वैसी ही रिवाज़ हमारे यहां है अगर बूरा न मानें तो हम उसे निभा लें? ब्राह्मण ने हामी भरी। बनिया ने ठीक उसी प्रकार ब्राह्मण और उसके दोस्त के हाथों पर लकड़ी बांध दी जैसे ब्राह्मण ने बांधी थीं।
ब्राह्मण मन ही मन हंसा और सोचा लालाजी मेरी ट्रिक मुझी पर आजमाकर थके नहीं। उसने अपने दोस्त से कहा कि हाथ नहीं मोड़ सकते अतः चम्मच का हलवा मुंह तक नहीं आ सकता लेकिन तुम मेरे सामने बैठे हो मेरी चम्मच तुम्हारे मुंह तक जा सकती है और तुम्हारी चम्मच मेरे मुंह तक आ सकती है इसलिए ऐसा करो तुम मुझे खिलाओ और मैं तुम्हें खिलाता हूं।😃 ऐसा बोलकर वे दोनों सारा हलवा खा गए।
बनिया ने मन ही मन कहा मैं तो इसे पोंगा पंडित समझ रहा था, पर ये तो हलवे के साथ-साथ अक्ल भी घोलकर पीता है! ये तो कुछ भी कर सकता है इसे मुर्ख समझना बहुत घातक है।
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