एक बार एक राजा अपने दरबार में बैठे थे। उनके सामने विद्वान, मंत्री और अनेक दरबारी मौजूद थे। तभी राजा की नजर वहां बैठे एक वृद्ध साधु पर पड़ी। राजा के मन में अचानक एक सवाल उठा, जिसका जवाब वह लंबे समय से जानना चाहते थे।
उन्होंने साधु से पूछा,
“गुरुदेव, सत्य और झूठ के बीच आखिर कितनी दूरी होती है?”
वृद्ध साधु ने राजा की ओर देखा और हल्की-सी मुस्कान के साथ बोले,
“महाराज, केवल एक कदम।”
साधु का उत्तर सुनकर राजा हैरान रह गए।
उन्होंने दोबारा पूछा, “केवल एक कदम? ऐसा कैसे संभव है?”
साधु ने कहा,
“महाराज, जब मनुष्य सत्य के साथ खड़ा होता है, तब वह सत्य बोल रहा होता है। लेकिन जैसे ही वह डर, लालच या किसी स्वार्थ के कारण सत्य से एक कदम पीछे हटता है, वहीं से झूठ की शुरुआत हो जाती है।”
राजा बड़े ध्यान से साधु की बात सुनने लगे।
साधु ने पास रखा एक दीपक उठाया और उसे जला दिया। फिर राजा से बोले,
“इस दीपक को देखिए महाराज। सत्य भी इसी दीपक की तरह होता है। सत्य को साबित करने के लिए उसे किसी लंबी कहानी या बहाने की जरूरत नहीं पड़ती। वह अपने आप प्रकाश देता है।”
फिर साधु ने दीपक के पीछे फैले अंधेरे की ओर इशारा किया और कहा,
“लेकिन झूठ अंधेरे जैसा होता है। उसे छिपाने के लिए इंसान को बार-बार नए पर्दे लगाने पड़ते हैं। एक झूठ बोलने के बाद उसे बचाने के लिए दूसरा झूठ बोलना पड़ता है, फिर तीसरा और फिर चौथा।”
राजा चुपचाप साधु की बातें सुनते रहे।
साधु ने आगे कहा,
“झूठ कभी-कभी इंसान को कुछ समय के लिए परेशानी से बचा सकता है, लेकिन वह उसके मन से डर को खत्म नहीं कर सकता। झूठ बोलने वाला व्यक्ति हमेशा इस चिंता में रहता है कि कहीं उसकी कही हुई बात खुल न जाए।”
उन्होंने कहा,
“इसके विपरीत सत्य बोलने वाले व्यक्ति को अपनी बात याद रखने के लिए कोई कहानी नहीं बनानी पड़ती। उसने जो देखा, वही कहा; जो हुआ, वही बताया। इसलिए सत्य के साथ खड़े व्यक्ति के मन पर झूठ का बोझ नहीं होता।”
राजा कुछ देर तक मौन रहे।
उन्हें महसूस हुआ कि सवाल उन्होंने सत्य और झूठ की दूरी का पूछा था, लेकिन साधु ने उन्हें उनके चरित्र की दूरी समझा दी थी।
राजा ने भावुक होकर कहा,
“गुरुदेव, आज मुझे समझ आया कि सत्य और झूठ के बीच दूरी वास्तव में कदमों की नहीं होती। यह दूरी इंसान के डर, लालच और चरित्र से तय होती है।”
साधु मुस्कुराए और बोले,
“यही सत्य है महाराज। परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि मनुष्य सत्य का साथ नहीं छोड़ता, तो अंततः उसका सम्मान बना रहता है।”
उस दिन राजा ने संकल्प लिया कि परिस्थितियां उनके विरुद्ध क्यों न हों, वह सत्य से पीछे नहीं हटेंगे।
कहानी की सीख यही है कि झूठ अक्सर बहुत छोटा कदम लगता है, लेकिन उसके बाद लौटकर सत्य तक पहुंचना कठिन होता जाता है। वहीं सत्य का रास्ता शुरुआत में कठिन जरूर हो सकता है, लेकिन मनुष्य को भीतर से मजबूत और सम्मानित बनाता है।
सत्य बोलना हमेशा आसान नहीं होता, लेकिन सत्य के साथ जीने वाला व्यक्ति अपने ही शब्दों से डरता नहीं है।
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