लकड़हारा अपने दुखों से टूट चुका था, कैलाश पर महादेव से मिला तो एक छोटी सी सीख ने बदल दी उसके जीवन को देखने की नजर

 

कैलाश की ऊँची चोटियों पर गहरा सन्नाटा पसरा था। बर्फ से ढके पर्वतों के बीच ठंडी हवाएँ धीरे धीरे बह रही थीं। उसी शांत वातावरण में भगवान शिव एक विशाल शिला पर ध्यानमग्न थे।उनकी जटाओं में सुशोभित चंद्रमा अपनी शीतल आभा बिखेर रहा था और उनके कंठ में वासुकि शांत भाव से विराजमान थे।

उसी दिन पर्वत के निचले भाग में रहने वाला देवदत्त जंगल से लौटते समय रास्ता भटक गया। रास्ता खोजते खोजते वह पहाड़ों की कठिन पगडंडियों पर बहुत दूर निकल आया और अनजाने में कैलाश के उस शांत भाग तक पहुँच गया।देवदत्त एक साधारण लकड़हारा था। वह हर दिन जंगल से लकड़ियाँ काटकर लाता और उन्हें बेचकर अपने परिवार का गुज़ारा करता था। वह मेहनत से कभी पीछे नहीं हटता था, फिर भी उसके घर की तंगी कम होने का नाम नहीं लेती थी।धीरे धीरे उसके मन में शिकायतें बढ़ने लगी थीं। वह दूसरों के बड़े घर देखता और अपने छोटे से घर को देखकर उदास हो जाता। किसी की संपत्ति देखकर उसे ईर्ष्या होती। उसे लगने लगा था कि जीवन ने दूसरों को उससे ज्यादा दिया है और उसके हिस्से में हमेशा कम ही आया है।उस दिन भी वह इन्हीं विचारों में डूबा रास्ता खोज रहा था। तभी उसकी नज़र कुछ दूर एक विशाल शिला पर पड़ी।

वहाँ भगवान शिव ध्यानमग्न थे।

देवदत्त कुछ क्षण विस्मय से उन्हें देखता रहा। महादेव को सामने देखकर उसके भीतर दबा हुआ दुख जैसे एक साथ जाग उठा और वह उनके चरणों में झुक गया।महादेव ने नेत्र खोले और देवदत्त की ओर देखा। उसके चेहरे पर थकान थी और आँखों में मन का बोझ साफ दिखाई दे रहा था।

महादेव ने शांत स्वर में पूछा,

“वत्स, तुम्हारे मन में ऐसा कौन सा दुख है, जिसका बोझ तुम इतने भारी मन से लिए फिर रहे हो?”

देवदत्त कुछ क्षण चुप रहा। फिर बोला,“प्रभु, मैं मेहनत करता हूँ, फिर भी मेरे जीवन के अभाव कम नहीं होते। जब मैं दूसरों को सुख और धन के बीच जीते देखता हूँ और फिर अपने जीवन की ओर देखता हूँ, तो मन में यही प्रश्न उठता है कि मेरे हिस्से में इतना संघर्ष क्यों आया?”

महादेव कुछ क्षण शांत रहे। फिर उन्होंने देवदत्त को अपने समीप बैठने को कहा। उनके सामने कुछ दूरी पर एक निर्मल जलधारा बह रही थी।महादेव बोले,

“उस जल को देखो।”

देवदत्त ने उसकी ओर देखा। जल की शांत सतह पर ऊपर फैला आकाश साफ दिखाई दे रहा था।

महादेव ने कहा,

“अब उसमें एक पत्थर डालो।”देवदत्त ने वैसा ही किया। पत्थर गिरते ही जल की सतह पर लहरें उठीं और आकाश का प्रतिबिंब टूटकर बिखर गया।

महादेव ने उसकी ओर देखा।

“आकाश नहीं बदला, वत्स। बदलने वाला केवल जल था।”

देवदत्त की दृष्टि अब भी उस जल पर थी।महादेव बोले,

“तुम्हारे जीवन में कठिनाइयाँ हैं और उन्हें नकारा नहीं जा सकता। लेकिन जब तुम दूसरों के जीवन को देखकर अपने जीवन को कम समझने लगते हो, तब वही कठिनाइयाँ तुम्हारे मन पर और भारी हो जाती हैं।”

देवदत्त ने धीरे से पूछा,“तो क्या मुझे बेहतर जीवन की इच्छा नहीं रखनी चाहिए?”

महादेव के मुख पर हल्की मुस्कान आई।

“अपने जीवन को बेहतर बनाने की इच्छा गलत नहीं है, वत्स। अपने परिवार के लिए सुख जुटाने की चाह भी गलत नहीं है।”उन्होंने कुछ क्षण बाद कहा,

“लेकिन जिस दिन किसी वस्तु के बिना तुम्हें अपना जीवन अधूरा लगने लगे, उस दिन अपने मन से पूछना कि तुम्हें सच में उसकी जरूरत है...... या तुम्हारा मोह तुम्हें उसके पीछे दौड़ा रहा है।”

देवदत्त चुप हो गया।उसके भीतर जैसे कोई पुरानी बात पहली बार साफ दिखाई देने लगी। वह अपने अभावों से दुखी था, लेकिन उससे भी अधिक दुख उसे तब होता था, जब दूसरों की समृद्धि देखकर वह अपने ही जीवन से नाराज़ हो जाता था।

उसे अपना छोटा सा घर याद आया। पत्नी याद आई, जो हर शाम उसके लौटने की राह देखती थी। बच्चों की हँसी याद आई, जो दिन भर की थकान के बाद भी उसके घर में अपनापन भर देती थी।

वह इन बातों से अनजान नहीं था।लेकिन दूसरों के पास क्या है, यह देखते देखते वह भूल गया था कि उसके अपने जीवन में क्या है।

महादेव के सामने बैठे देवदत्त ने पहली बार अपने दुख को एक अलग नज़र से देखा।

कठिनाइयाँ थीं, अभाव भी थे।

लेकिन उसका पूरा जीवन केवल दुख से नहीं भरा था।

उसके छोटे से संसार में कुछ ऐसे चेहरे भी थे, जिनके बिना उसका संसार अधूरा हो जाता।

उसने धीरे से महादेव की ओर देखा।महादेव शांत बैठे थे।

अब शब्दों की आवश्यकता नहीं थी।

देवदत्त के भीतर एक ऐसी बात धीरे धीरे साफ हो रही थी, जिसे वह बहुत समय से दूसरों के जीवन को देखते देखते भूल गया था।

उसके जीवन की कठिनाइयाँ उसी क्षण समाप्त नहीं हुईं। अगले दिन उसे फिर जंगल जाना था, लकड़ियाँ काटनी थीं और अपने परिवार के लिए मेहनत करनी थी।लेकिन अब उसे अपने जीवन को दूसरों की आँखों से देखना छोड़ना था।

देवदत्त ने मौन भाव से महादेव के चरणों में अपना सिर झुका दिया।

उस दिन कैलाश से लौटते समय देवदत्त के पास पहले से अधिक धन नहीं था। उसके जीवन की कठिनाइयाँ भी वहीं थीं और आगे की राह भी उतनी ही कठिन थी।

लेकिन उसके भीतर देखने का एक नया ढंग लौट आया था, जिसे वह दूसरों के जीवन को देखते देखते कहीं खो चुका था।जीवन को बेहतर बनाने की इच्छा गलत नहीं है।

लेकिन आगे बढ़ने की चाह में जब इंसान अपने पास मौजूद हर सुख को कम समझने लगता है, तब उसे जो मिला है, उसका सुख भी धीरे धीरे महसूस होना बंद हो जाता है।

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