बाली की शत्रुता के कारण सुमेरु पर्वत पर इंद्रकूप का प्रचंड प्रभाव फैल गया। देखते ही देखते पूरे सुमेरु पर संकट छा गया। बाल हनुमान ने अपनी पूरी शक्ति लगाकर सुमेरु को बचाने का प्रयास किया, लेकिन इंद्रकूप के प्रभाव को रोकने का कोई उपाय उन्हें दिखाई नहीं दिया।
तभी देवराज इंद्र स्वयं हनुमान के सामने प्रकट हुए। हनुमान ने विनम्रता से पूछा कि देवराज! इस संकट से सुमेरु की रक्षा कैसे होगी?
इंद्रदेव ने कहा कि वत्स! इस संकट का समाधान केवल महादेव कर सकते हैं। तुम उनकी शरण में जाओ।
हनुमान तुरंत महादेव की शरण में जाने के लिए आगे बढ़े। तभी इंद्रदेव ने उन्हें रोकते हुए कहा कि पहले पार्थिव शिवलिंग का निर्माण करो। पुष्प, बेलपत्र और जल से उसका अभिषेक करके महादेव की विधिपूर्वक पूजा करो। इसके बाद उनकी शरण में जाना।
हनुमान ने मिट्टी से पार्थिव शिवलिंग बनाया और पूजा के लिए पुष्प लेने निकल पड़े लेकिन जैसे ही वे किसी वृक्ष से पुष्प तोड़ने के लिए हाथ बढ़ाते, उससे पहले ही कोई अत्यंत तीव्र गति से आता और सारे पुष्प लेकर चला जाता।
हनुमान दूसरे वृक्ष के पास पहुँचे। वहाँ भी वही हुआ।
तीसरी बार जब ऐसा हुआ, तो हनुमान ने उस हाथ को पकड़ लिया। सामने स्वयं नंदी महाराज खड़े थे। हनुमान ने हाथ जोड़कर कहा कि नंदी महाराज! आप मेरे पुष्प क्यों ले जा रहे हैं? मुझे महादेव की पूजा करनी है। सुमेरु संकट में है और मेरे पास समय बहुत कम है।
नंदी महाराज मुस्कुराकर बोले कि मुझे भी पुष्प चाहिए। मुझे भी तो महादेव की पूजा करनी है।
इसके बाद हनुमान बेलपत्र लेने पहुँचे। लेकिन जिस बेलपत्र के वृक्ष के पास वे जाते, नंदी महाराज उससे पहले ही सारे बेलपत्र तोड़ लेते।
हनुमान ने कहा कि नंदी महाराज, कृपा करके मेरा मार्ग मत रोकिए। सुमेरु संकट में है। मुझे शीघ्र महादेव की पूजा करनी है।
नंदी बोले तो क्या तुम मेरे साथ युद्ध करोगे?
हनुमान ने विनम्रता से उत्तर दिया कि मैं आपसे युद्ध नहीं करना चाहता। लेकिन सुमेरु की रक्षा के लिए यदि युद्ध करना भी पड़े, तो मैं विवश हूँ।
नंदी महाराज ने कहा, तो फिर युद्ध हो!
अगले ही क्षण बाल हनुमान और नंदी महाराज के बीच भयंकर युद्ध आरंभ हो गया।
हनुमान पूरी शक्ति से प्रहार करते, लेकिन नंदी महाराज उनके प्रत्येक वार को सहजता से रोक देते। हनुमान जितना अपना वेग बढ़ाते, नंदी उतनी ही सरलता से उनके प्रहारों को विफल कर देते।
समय बीतता जा रहा था। हनुमान को चिंता होने लगी कि यदि नंदी महाराज के साथ युद्ध में ही समय निकल गया, तो सुमेरु का क्या होगा?
तब हनुमान ने अपनी दिव्य शक्ति का आह्वान किया। उनके तेज से चारों दिशाएँ प्रकाशित हो उठीं और उनके हाथों में दिव्य अस्त्र प्रकट हुआ लेकिन नंदी पर प्रहार करने से ठीक पहले हनुमान रुक गए। उन्होंने कहा कि नंदी महाराज, मैं आप पर यह अस्त्र नहीं चलाना चाहता। मेरी आपसे केवल एक प्रार्थना है कि मेरी बात महादेव तक पहुँचा दीजिए। सुमेरु संकट में है। मुझे महादेव की शरण चाहिए।
हनुमान की यह प्रार्थना सुनते ही वहाँ स्वयं महादेव और माता पार्वती प्रकट हो गए।
हनुमान ने तुरंत महादेव को प्रणाम किया और कहा कि भोलेनाथ! मैं बहुत देर से आपकी शरण में आने का प्रयास कर रहा हूँ। लेकिन नंदी महाराज मुझे आपके पास आने नहीं दे रहे थे। मैं आपकी पूजा के लिए पुष्प और बेलपत्र लेने गया, तो उन्होंने उन्हें भी ले लिया। सुमेरु संकट में है। प्रभु, कृपा करके मेरी सहायता कीजिए।
माता पार्वती ने नंदी और हनुमान की ओर देखा और महादेव से कहा कि महादेव! अब मैं समझ गई। नंदी और हनुमान के बीच हुआ यह प्रसंग भी आपकी ही दिव्य लीला है। इसके माध्यम से संसार को यह संदेश मिला कि भक्त की प्रार्थना आपके प्रिय नंदी महाराज के माध्यम से ही आप तक पहुँचती है। महादेव मुस्कुराए और बोले, हाँ देवी। नंदी मेरी सेवा और द्वारपाल के रूप में सदैव तत्पर रहते हैं। भक्त जब श्रद्धा से नंदी के समक्ष अपनी बात रखता है, तो उसकी प्रार्थना भी मुझ तक पहुँचती है।
महादेव ने आगे कहा कि आज हनुमान ने भी अपनी प्रार्थना नंदी के माध्यम से मेरे पास पहुँचाई है। उनकी भक्ति और पुकार मुझ तक पहुँचते ही मैं स्वयं उनके सामने उपस्थित हो गया।
यह सुनकर हनुमान ने नंदी महाराज की ओर देखा और श्रद्धापूर्वक उन्हें प्रणाम किया।
नंदी महाराज ने भी प्रेमपूर्वक बाल हनुमान को आशीर्वाद दिया। इस प्रकार बाल हनुमान और नंदी महाराज के बीच हुआ यह प्रसंग केवल एक युद्ध नहीं, बल्कि महादेव की एक अद्भुत दिव्य लीला बन गया, जिसमें भक्ति, श्रद्धा, सेवा और समर्पण का सुंदर संदेश छिपा है।
🙏 हर हर महादेव 🙏
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