रमेश बाबू को एक दिन अचानक शुद्ध ऊंटनी का दूध पीने की ऐसी सनक चढ़ी कि उन्होंने ठान लिया कि दूध चाहे जितना महंगा हो, लेकिन उसमें पानी की एक बूंद भी नहीं होनी चाहिए।
वैसे भी रमेश बाबू स्वभाव से कुछ ज्यादा ही शक करने वाले इंसान थे। उन्हें दुनिया के किसी दूधवाले पर भरोसा नहीं था। उनका मानना था कि दूधवाले दूध में इतना पानी मिला देते हैं कि अगर दूध को नदी में डाल दो तो नदी का पानी भी शर्मिंदा हो जाए!
एक दिन दोस्तों ने कहा, “रमेश बाबू, हमारे पास शुद्ध ऊंटनी का दूध आता है। चाहो तो तुम्हारे लिए भी ले आएं।”
रमेश बाबू ने तुरंत मूंछों पर हाथ फेरा और बोले, “नहीं भाई! ये रमेश किसी की बातों में आने वाला नहीं है। जब तक मैं अपनी इन आंखों से ऊंटनी के थन से दूध निकलते हुए नहीं देखूंगा, तब तक एक पैसा भी नहीं दूंगा।”
अगली सुबह रमेश बाबू सूरज निकलने से भी पहले, करीब साढ़े चार बजे, ऊंटनी बांधने वाली जगह पर पहुंच गए।
उन्होंने दूधवाले को पैसे दिखाते हुए कहा, “पैसे की चिंता मत करना, लेकिन दूध बिल्कुल शुद्ध होना चाहिए। पानी की एक बूंद भी मिली तो समझ लेना रमेश बाबू से पाला पड़ा है।”
दूधवाले ने मुस्कुराते हुए एक बड़ा स्टील का गिलास उनके सामने रख दिया।
रमेश बाबू ने गिलास को उलट-पलटकर देखा। अंदर झांका, बाहर से जांचा और यहां तक कि उसे रोशनी के सामने करके भी देख लिया।
उन्हें जब पूरा भरोसा हो गया कि गिलास बिल्कुल खाली है, तब बोले, “अब शुरू करो!”
शुरू हुआ दूध निकालने का खेल
ऊंटनी को बैठाया गया। दूधवाला दूध निकालने की तैयारी करने लगा।
लेकिन तभी अचानक ऊंटनी के एक तरफ एक मजबूत कद-काठी वाला आदमी और दूसरी तरफ एक महिला आकर इस तरह खड़े हो गए कि ऊंटनी का पूरा पिछला हिस्सा उनकी आड़ में छिप गया।
रमेश बाबू ने गर्दन लंबी करके देखने की कोशिश की।
“अरे भाई, थोड़ा हटो तो! मुझे दिखाई नहीं दे रहा।”
महिला ने तुरंत घूंघट आगे कर लिया।
रमेश बाबू संस्कारी आदमी थे। उन्होंने सोचा, “अब इतनी भी जांच क्या करनी कि किसी की मर्यादा ही चली जाए।”
वह दो कदम पीछे हट गए।
उधर से उन्हें बस दूध निकलने की आवाज सुनाई दी।
कुछ ही देर बाद दूधवाले ने झाग से भरा गिलास रमेश बाबू के हाथ में पकड़ा दिया।
रमेश बाबू का सीना गर्व से फूल गया।
उन्होंने दोस्तों की तरफ देखकर कहा, “देखा! मैंने कहा था ना, आंखों के सामने निकलवाऊंगा तभी भरोसा करूंगा।”
गिलास लेकर वह बड़े गर्व से घर पहुंचे।
पहला घूंट और उतर गया चेहरा
घर पहुंचते ही उन्होंने गिलास उठाया और पहला घूंट भरा।
अगले ही पल उनके चेहरे के सारे भाव बदल गए।
“अरे ये क्या!”
दूध इतना पतला था कि उन्हें शक हो गया कि वह दूध पी रहे हैं या नल का पानी!
उन्होंने गिलास को गौर से देखा और बोले, “नहीं… ऐसा नहीं हो सकता। मैंने अपनी आंखों के सामने दूध निकलवाया था!”
लेकिन अब रमेश बाबू की शंका और बढ़ चुकी थी।
अगली सुबह वह अकेले नहीं गए। दो दोस्तों को साथ लिया और बोले, “आज दूध नहीं, पूरा ऑपरेशन होगा। कल जिसने रमेश बाबू को चूना लगाया है, आज उसका पर्दाफाश करके ही लौटूंगा।”
आखिरकार खुल गया पूरा राज
तीनों ने दूर खड़े होकर दूध निकालने की प्रक्रिया को ध्यान से देखना शुरू किया।
फिर वही हुआ।
एक आदमी ऊंटनी के पास खड़ा हुआ। दूसरी तरफ महिला आकर खड़ी हो गई। दोनों ने फिर से ऐसी स्थिति बना ली कि किसी को ठीक से कुछ दिखाई न दे।
लेकिन इस बार रमेश बाबू भी पूरी तैयारी के साथ आए थे।
उन्होंने जमीन पर नजर दौड़ाई।
तभी उन्हें कुछ अजीब दिखाई दिया।
जहां दोनों लोग खड़े थे, वहां जमीन के नीचे से एक पतली पाइप जा रही थी।
रमेश बाबू ने दोस्तों से कहा, “भाइयों… दूध ऊपर से नहीं, कहानी नीचे से चल रही है!”
उन्होंने आसपास तलाश की तो कथित तौर पर जमीन के
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