एक कहता था ‘ईश्वर देगा’, दूसरा कहता था ‘राजा देगा’… फिर राजा ने खीर में सोने की मुद्राएं छिपाईं और बदल गई पूरी कहानी


बहुत समय पहले की बात है। एक राजा था, जो हर दिन श्रद्धा से मंदिर जाया करता था। मंदिर के बाहर दो भिखारी रोज उसके आने का इंतजार करते थे। दोनों एक-दूसरे के पास ही बैठते थे, लेकिन भगवान पर उनका भरोसा बिल्कुल अलग था।

राजा जब मंदिर में प्रवेश करता, तो दाईं ओर बैठा भिखारी हाथ जोड़कर भगवान से कहता—

“हे ईश्वर! आपने राजा को इतना कुछ दिया है, मुझे भी कुछ दे दीजिए।”

वहीं बाईं ओर बैठा भिखारी राजा को देखकर आवाज लगाता—

“ऐ राजा! भगवान ने तुम्हें बहुत कुछ दिया है, मुझे भी कुछ दे दो।”

दाईं ओर वाला भिखारी अक्सर उसे समझाता—

“भगवान से मांगो। वह सबकी सुनता है।”

लेकिन दूसरा भिखारी हंसकर कहता—

“चुप कर मूर्ख! भगवान कब किसी को देता है? राजा से मांगो, वही कुछ देगा।”

राजा कई दिनों से दोनों की बातें सुन रहा था। एक दिन उसने अपने मंत्री को बुलाया और कहा—

“मंदिर के बाहर जो दाईं तरफ भिखारी बैठता है, वह हमेशा भगवान से मांगता है। मुझे विश्वास है कि भगवान उसकी जरूर सुनेंगे। लेकिन बाईं तरफ वाला हमेशा मुझसे ही मांगता रहता है। आज उसकी परीक्षा लेते हैं।”

राजा ने मंत्री से कहा कि एक बड़े बर्तन में स्वादिष्ट खीर भरकर उसमें कुछ स्वर्ण मुद्राएं छिपा दी जाएं और वह बर्तन बाईं ओर बैठे भिखारी को दे दिया जाए।

मंत्री ने राजा की आज्ञा का पालन किया।

अगले दिन मंत्री ने वह खीर का बर्तन भिखारी को दे दिया। भिखारी बहुत खुश हुआ। उसे लगा कि राजा ने आखिर उसकी बात सुन ली।

वह खीर खाते-खाते दाईं ओर बैठे भिखारी को चिढ़ाने लगा—

“कहां गया तेरा भगवान? हमेशा कहता रहता था कि ईश्वर देगा। देख, मैंने राजा से मांगा और राजा ने मुझे दे दिया!”

दूसरा भिखारी चुपचाप मुस्कुराता रहा।

कुछ देर बाद पहले भिखारी का पेट भर गया। उसने सोचा कि अब इतनी खीर वह अकेला क्या करेगा। उसने बची हुई खीर का बर्तन दूसरे भिखारी की तरफ बढ़ाते हुए कहा—

“ले, तू भी खा ले। हमेशा भगवान-भगवान करता रहता है।”

दूसरे भिखारी ने बिना कुछ कहे खीर का बर्तन ले लिया।

अगले दिन जब राजा मंदिर पहुंचा तो उसने देखा कि बाईं तरफ बैठने वाला भिखारी तो हमेशा की तरह वहीं मौजूद था, लेकिन दाईं तरफ वाला भिखारी गायब था।

राजा को आश्चर्य हुआ। उसने बाईं ओर बैठे भिखारी से पूछा—

“कल तुम्हें खीर से भरा बर्तन मिला था?”

भिखारी ने मुस्कुराते हुए कहा—

“हां राजा जी, मिला था। बहुत स्वादिष्ट खीर थी। मैंने भरपेट खाई।”

राजा ने पूछा—

“फिर वह दूसरा भिखारी कहां गया?”

भिखारी बोला—

“जब मेरा पेट भर गया तो बची हुई खीर मैंने उसे दे दी। मैंने उससे कहा कि तू हमेशा कहता रहता है ‘ईश्वर देगा’, तो ले, ईश्वर का दिया हुआ समझकर खा ले।”

यह सुनकर राजा के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

राजा ने मन ही मन कहा—

“सच ही तो है… ईश्वर जब देना चाहता है, तो किसी न किसी को माध्यम बना देता है।”

जिस भिखारी को लगता था कि राजा ही देने वाला है, उसे भी अंततः वही मिला जो भगवान ने उसके लिए तय किया था। लेकिन उसे यह समझ ही नहीं आया कि देने वाला कौन था और माध्यम कौन।

कहानी की सीख

ईश्वर पर विश्वास रखने वाले व्यक्ति को यह नहीं सोचना चाहिए कि भगवान उसे किस रास्ते से देगा। कई बार मदद वहां से आती है, जहां से हमें उसकी उम्मीद भी नहीं होती। ईश्वर का दिया हुआ कभी-कभी किसी इंसान के हाथों हमारे पास पहुंचता है। इसलिए कठिन समय में भी विश्वास और धैर्य बनाए रखना चाहिए।

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