लोअर बर्थ मिली तो खुशी से फूले नहीं समाए, महिला ने मांगी तो दे दी... बाद में जो हुआ उस पर खुद ही हंस पड़े


अफसोस की बात है कि एक कन्या को बर्थ देने पर एक नारी को ताने सुनने पड़ते हैं। और विडंबना देखिए, अपने जीवन काल में सैकड़ो महिलाओं को लोअर बर्थ देकर स्वयं उनकी अपर बर्थ लेने वाला पुरुष पूरे ‘कंपार्टमेंट-समाज’ में बहुत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है।

तब मुझे लखनऊ से काठगोदाम जाना था। कई दिनों से मैं काफी खुश था। इतना अधिक खुश इसलिए नहीं था कि मुझे पहाड़ घूमने जाना है। इतना अधिक इसलिए खुश था क्योंकि मुझे लोअर बर्थ अलॉट हुई थी। आमतौर पर मुझे अपर बर्थ अलॉट हुआ करती है। कुछ लोग तो आईआरसीटीसी पर इल्जाम भी लगाते हैं कि वह इरादतन सवर्णों को अपर बर्थ एलॉट करती है। यह एक मनुवादी संस्था है, उनका कहना है। शायद सामाजिक न्याय का प्रमाण देने के लिए इस बार आईआरसीटीसी ने मुझे लोअर बर्थ अलॉट की।

लोअर बर्थ मिलने की खुशी में मैं नियत समय से एक घंटे पहले स्टेशन पहुंच गया। ट्रेन प्लेटफार्म पर लग गई थी किंतु अभी दरवाजे नहीं खुले थे। A2,33 मेरी सीट थी। छह माह पुरानी बात है किंतु मुझे अभी तक वह सीट नंबर याद है। मेरी मिडिल या अपर सीट होती तो शायद मैं यात्रा समाप्त होने से पहले ही सीट नंबर भूल चुका होता। जैसे ही दरवाजा खुला मैं भाग कर अपनी सीट पर पहुँच गया। मैंने सीट पर चादर बिछाई और लेट गया। इस आस में कि लेटे हुए आदमी से कौन बर्थ की मांग करेगा।

हमारे टू टियर कंपार्टमेंट में मेरे बगल की लोअर बर्थ में एक बुजुर्ग व्यक्ति आए और उनके ऊपर की सीट उनके नौजवान लड़के को मिली। मेरे ठीक ऊपर एक कम उम्र के सज्जन आए। उन्होंने न मुझसे बर्थ देने को कहा और न ही मैं उनको बर्थ देता। मुझे जो बर्थ मिली है वह मेरे पास ही रहेगी इस बात की संभावना प्रबल होती जा रही थी। साइड वाली दोनों बर्थ खाली थीं। ट्रेन चल दी। मैं भी सोने का नाटक करते-करते बोर हो गया था अतः बैठ गया और मोबाइल स्क्रॉल करने लगा।

लेकिन तभी ‘सिस्टम’ से अत्यधिक नाखुश एक महिला का अंग्रेजी में प्रसारण सुनाई दिया। महिला आठ-दस एक्सक्यूज मी, ओ माय गॉड, शिट बोलती हुई हमारे कंपार्टमेंट में पहुंची। सब कुछ इतनी जल्दी हुआ कि मैं बर्थ में लेट कर फिर से सोने का नाटक करना तक भूल गया। वह लगभग तीस वर्ष की थी। जींस टॉप में। और उसके संग एक वृद्ध महिला भी थी। लगभग 70 साल की।

उस वृद्ध महिला के लिए नीचे वाली बर्थ उपलब्ध थी और जवान महिला ऊपर वाली बर्थ में चढ़ने में पूरी तरीके से समर्थ लग रही थी। अतः सारी नैतिकता और व्यवहारिकता को आँकने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि कम से कम आज तो यह लोअर बर्थ मेरा बर्थ राइट है। मैं समर्थ महिलाओं को बर्थ देना उचित नहीं समझता हूं। अगर उन्होंने साड़ी पहनी है तो मैं इसे अपवाद के रूप में देखता हूं क्योंकि ऐसी स्थिति में ऊपर की बर्थ पर चढ़ने में उन्हें दिक्कत हो सकती है।

किंतु मैं गलत था। मुझे इस हर तरह से सक्षम महिला को अपनी बर्थ देनी पड़ी। उस महिला ने मुझसे कहा था “हैलो सर, कैन वी एक्सचेंज अवर बर्थ्स?”

मैं हमेशा सोचता था कि मैंने मनुष्य योनि में बर्थ तो लिया है, किंतु क्या मैंने ऐसे काम किए हैं कि कोई यह कहना चाहे: “काश मैं आपकी जगह ले पाता/पाती”। और आज यह महिला मेरी बर्थ को इतनी अहमियत दे रही है। अपने बर्थ को त्यागकर मेरे बर्थ की चाहत करने लगी है। मेरा बर्थ सफल हुआ, ऐसा लग रहा था।

अब मेरे पास दो विकल्प थे। पहला विकल्प था कि मैं उसे मना कर देता। परंतु इस स्थिति में नीचे अपनी बर्थ पर लेटे हुए मेरी गर गाहे-बगाहे उस महिला पर नज़र पड़ती तो वह मुझे मुंह बनाती ही नज़र आती। दूसरा विकल्प था कि मैं उसे बर्थ दे देता और ऊपर वाली बर्थ से एक परोपकारी महात्मा की तरह उसको यह जतलाता रहता कि हां, मैं ही वह महान पुरुष हूँ जिसके कारण तुम इस बर्थ को प्राप्त हुई हो।

बहरहाल मैंने उसको अपनी बर्थ दे दी।

अफसोस! उसने अपनी मम्मी(या शायद सास) को उस मेरे द्वारा प्रदत्त बर्थ पर सुला दिया और वह मेरे नीचे वाली बर्थ पर सो गई। अब ऊपर वाली बर्थ से झांक कर ठीक नीचे वाली बर्थ पर सोई महिला को बीच-बीच में अपनी महानता जतलाना थोड़ा अव्यावहारिक सा लगा। अब इस आस में कि सुबह ट्रेन से उतरने से पहले वह मुझे मेरी महानता के लिए धन्यवाद देगी, मैं सो गया।

सुबह जब काठगोदाम स्टेशन पर मेरी नींद खुली तो वह देवी मुझे नहीं दिखी। पिछले किसी स्टेशन पर उतर चुकी होगी। हो सकता है मुझे धन्यवाद देने के लिए वह बहुत देर तक मुझे निहारती रही होगी, किंतु जब उसने मुझे गहरी नींद में सोया हुआ देखा होगा तो मन ही मन मुझे धन्यवाद देती हुई उतर चुकी होगी।

कुछ दिन पूर्व टेबल टेनिस खेलते समय अचानक से मेरे पैर में असहनीय दर्द होने लगा। हड्डी रोग विशेषज्ञ को दिखाया, एक्स-रे हुआ तो टखने की हड्डी बढ़ी हुई दिखी। डॉक्टर ने मुझे इसे ऑपरेट करवाने की सलाह दी, अन्यथा इसमें अक्सर दर्द रहेगा, ऐसा उन्होंने बताया। मैं बहुत खुश हुआ। इतना खुश कि मैं आपको बता भी नहीं सकता। मैंने ऑपरेशन करवाने से साफ-साफ मना कर दिया। अब भविष्य में जब भी कभी मुझे ट्रेन में लोअर बर्थ मिलेगी और कोई महिला यदि मुझसे कहेगी, “भाई साहब, क्या आप मुझे बर्थ दे सकते हैं?”, तो मैं तुरंत अपना मोबाइल खोलूंगा, उन्हें अपने टखने की एक्स-रे रिपोर्ट दिखाऊंगा और कहूंगा, “माफ कीजिएगा बहन जी, पैर में बहुत दर्द है, अन्यथा मेरा तो बर्थ ही लोगों को बर्थ देने के लिए हुआ है।”

एक सहयात्री सज्जन, जिन्हें अपनी लोअर बर्थ एक महिला को देनी पड़ी, मुझसे ट्रेन से उतरने के बाद प्लेटफार्म पर पूछने लगे, “पंत जी, टखने की हड्डी बढ़ानी हो तो क्या आप इसका कोई उपाय बता सकते हैं?”

मुझे तो लगता है माउंट एवरेस्ट फ़तह करने के बाद बछेंद्री पाल जब पद्मश्री लेने के लिए देहरादून से दिल्ली गई होंगी तो शायद उन्होंने तक किसी पुरुष से अनुरोध किया होगा: “भाई साहब क्या आप मुझे नीचे वाली बर्थ दे सकते हैं, मुझे इतना अधिक ऊपर चढ़ने में दिक्कत होती है”।

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