भैया जल्दी चलिए, मां मेरा इंतजार कर रही हैं…” रात में लड़की की बात सुनकर ओला ड्राइवर ने जो किया, दिल छू लेगा


रात के करीब 11 बजे शहर की सड़कें लगभग खाली हो चुकी थीं। हल्की बारिश हो रही थी और सड़क पर लगी पीली लाइटें पानी में चमक रही थीं।

एक ओला कैब धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। ड्राइवर महेश पिछले कई घंटों से गाड़ी चला रहा था। दिनभर की थकान उसके चेहरे पर साफ दिखाई दे रही थी, लेकिन वह लगातार गाड़ी चला रहा था क्योंकि घर में उसकी छोटी बेटी की स्कूल फीस जमा करनी थी।

तभी उसके मोबाइल पर एक नई राइड का नोटिफिकेशन आया।

Pickup: रेलवे स्टेशन

महेश ने कैब स्टेशन के बाहर रोक दी।

कुछ सेकंड बाद करीब 22-23 साल की एक लड़की तेजी से वहां आई। उसके हाथ में एक छोटा सा बैग था और आंखें लाल थीं।

वह पिछली सीट पर बैठते ही बोली,

“भैया… जल्दी चलिए।”

महेश ने शीशे में उसकी तरफ देखा।

“कहां जाना है मैडम?”

लड़की ने एक पता बताया।

महेश ने कहा,

“जी, करीब 35-40 मिनट लगेंगे।”

लड़की ने बस इतना कहा,

“भैया… जितनी जल्दी हो सके पहुंचा दीजिए।”

कैब चल पड़ी।

रास्ते में लड़की बार-बार फोन देख रही थी

कुछ मिनट तक गाड़ी में बिल्कुल खामोशी रही।

लड़की बार-बार अपना फोन देखती। किसी नंबर पर कॉल करती, लेकिन सामने से कोई जवाब नहीं आता।

फिर उसने एक मैसेज लिखा।

कुछ देर बाद फोन उसकी गोद में गिर गया और वह खिड़की की तरफ देखने लगी।

महेश ने शीशे में देखा तो उसकी आंखों से आंसू निकल रहे थे।

उसने धीरे से पूछा,

“मैडम, सब ठीक है?”

लड़की ने तुरंत अपने आंसू पोंछे।

“हां भैया… सब ठीक है।”

महेश मुस्कुराया।

“अगर सब ठीक होता तो रात के 11 बजे कोई इस तरह अकेले बैठकर नहीं रोता।”

लड़की कुछ नहीं बोली।

महेश ने फिर कहा,

“आप चिंता मत कीजिए। जहां जाना है, मैं सुरक्षित पहुंचा दूंगा।”

इतना सुनते ही लड़की की आंखें फिर भर आईं।

कुछ देर बाद उसने धीमी आवाज में कहा,

“भैया… मुझे डर लग रहा है।”

महेश ने गाड़ी की स्पीड थोड़ी कम कर दी।

“किस बात का?”

लड़की बोली,

“मुझे नहीं पता घर पहुंचने के बाद मां मुझे पहचानेंगी भी या नहीं।”

महेश चौंक गया।

“क्यों? क्या हुआ आपकी मां को?”

लड़की ने अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।

फिर बोली,

“तीन महीने पहले मैं नौकरी के लिए दूसरे शहर चली गई थी। मां ने बहुत रोका था। कहती थीं—‘बेटी, ज्यादा दूर मत जाना।’”

“लेकिन मुझे लगा कि जिंदगी में कुछ करना है। मैं चली गई।”

वह कुछ पल रुकी।

“शुरुआत में रोज फोन करती थी। फिर काम बढ़ता गया। फोन कम होते गए।”

महेश चुपचाप गाड़ी चलाता रहा।

लड़की बोली,

“दो दिन पहले पड़ोसी का फोन आया था। उन्होंने कहा कि मां की तबीयत बहुत खराब है।”

“मैंने सोचा छुट्टी मिलते ही आ जाऊंगी।”

उसकी आवाज कांपने लगी।

“लेकिन आज शाम को पड़ोसी ने फोन करके कहा कि अगर मां को आखिरी बार देखना है तो आज ही आ जाओ।”

महेश के हाथ स्टीयरिंग पर कस गए।

“भैया, क्या मैं बहुत देर कर चुकी हूं?”

लड़की ने अचानक पूछा,

“भैया…”

“जी?”

“क्या मैं बहुत देर कर चुकी हूं?”

महेश के पास इस सवाल का कोई आसान जवाब नहीं था।

उसने कुछ सेकंड बाद कहा,

“जब तक इंसान अपने किसी अपने के पास पहुंच सकता है, तब तक देर नहीं होती।”

लड़की ने उसकी तरफ देखा।

“अगर मां ने मुझे माफ नहीं किया तो?”

महेश बोला,

“मां नाराज हो सकती है, शिकायत कर सकती है… लेकिन मां का दिल बच्चों के लिए ज्यादा देर तक नाराज नहीं रह सकता।”

लड़की चुप हो गई।

फिर उसने पूछा,

“आपकी मां हैं?”

महेश मुस्कुराया।

“नहीं मैडम… अब नहीं हैं।”

“कब गईं?”

“बहुत साल पहले।”

महेश की आवाज अचानक धीमी हो गई।

“मैं भी एक बार काम के चक्कर में गांव नहीं जा पाया था। सोचा था अगले हफ्ते चला जाऊंगा।”

“लेकिन अगले हफ्ते मां नहीं थीं।”

कैब के अंदर फिर खामोशी छा गई।

अचानक लड़की ने कहा—“भैया, गाड़ी रोकिए!”

करीब आधे रास्ते में लड़की ने अचानक कहा,

“भैया, गाड़ी रोकिए।”

महेश ने तुरंत ब्रेक लगाया।

“क्या हुआ?”

लड़की ने अपना बैग खोला और उसमें से एक छोटा सा डिब्बा निकाला।

उसमें मिठाई का छोटा पैकेट था।

महेश ने पूछा,

“ये क्या है?”

लड़की बोली,

“मां को मिठाई बहुत पसंद है।”

फिर वह मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोली,

“मैं सोच रही थी मां से मिलकर सबसे पहले ये दूंगी।”

महेश ने कहा,

“तो फिर इसे संभालकर रखिए।”

लड़की ने डिब्बा वापस बैग में रखा।

“भैया… अगर मां ने आंखें नहीं खोलीं तो?”

महेश ने उसकी तरफ देखा।

“तब भी उनके पास बैठकर कहना—‘मां, मैं आ गई।’”

“क्योंकि कुछ बातें सुनने के लिए आंखों का खुलना जरूरी नहीं होता।”

लड़की की आंखों से आंसू बहने लगे।

घर के बाहर पहुंचते ही लड़की दौड़ पड़ी

करीब 40 मिनट बाद कैब उस पते पर पहुंच गई।

घर के बाहर कुछ लोग खड़े थे।

लड़की ने दरवाजा खुलते ही कैब से उतरकर दौड़ लगा दी।

महेश ने देखा कि घर के बाहर खड़े एक बुजुर्ग व्यक्ति ने उसे देखते ही कहा,

“बेटी… जल्दी अंदर जा।”

लड़की के कदम लड़खड़ा गए।

वह कमरे में पहुंची।

बिस्तर पर उसकी मां बेहोश पड़ी थीं।

लड़की उनके पास बैठ गई।

“मां…”

कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई।

उसने मां का हाथ अपने हाथों में लिया।

“मां… मैं आ गई।”

कुछ सेकंड तक कोई हलचल नहीं हुई।

लड़की फूट-फूटकर रोने लगी।

“मां, मुझे माफ कर दो… मैं बहुत देर से आई।”

तभी बिस्तर पर पड़ी मां की उंगलियां हल्की-सी हिलीं।

लड़की ने सिर उठाया।

“मां?”

मां ने धीरे-धीरे आंखें खोलीं।

कमजोर आवाज में सिर्फ इतना कहा—

“तू आ गई बेटी?”

लड़की मां से लिपटकर रोने लगी।

“हां मां… अब कहीं नहीं जाऊंगी।”

दरवाजे पर खड़ा महेश यह सब देख रहा था।

उसने चुपचाप फोन निकाला और कैब की स्क्रीन पर राइड खत्म कर दी।

लड़की ने किराया देना चाहा, लेकिन…

लड़की बाहर आई और बोली,

“भैया, कितना हुआ?”

महेश ने कहा,

“ऐप में जितना है उतना दे दीजिए।”

लड़की ने पैसे भेज दिए।

फिर उसने कहा,

“भैया, आपने आज मेरी बहुत मदद की।”

महेश मुस्कुराया।

“मैंने कुछ नहीं किया। बस आपको आपके घर पहुंचाया है।”

लड़की बोली,

“नहीं भैया… आपने रास्ते में मुझे हिम्मत दी।”

महेश ने कहा,

“एक बात कहूं?”

“जी।”

“कल सुबह अपनी मां के साथ बैठकर चाय पीजिएगा।”

लड़की मुस्कुराई।

“जरूर।”

महेश कैब में बैठा और जाने लगा।

कुछ दूर पहुंचने के बाद उसका फोन बजा।

उसकी अपनी बेटी का फोन था।

“पापा, आप कब आओगे?”

महेश ने मुस्कुराकर कहा,

“बस बेटा, थोड़ी देर में आ रहा हूं।”

फिर उसने कैब की रफ्तार बढ़ा दी।

उस रात उसने पहली बार महसूस किया कि वह सिर्फ लोगों को एक जगह से दूसरी जगह नहीं पहुंचाता।

कभी-कभी एक कैब ड्राइवर किसी को उसके घर तक नहीं, बल्कि उसके अपनों तक पहुंचाता है।

और शायद उस रात की सबसे बड़ी कमाई उसके खाते में आए कुछ रुपये नहीं थे।

सबसे बड़ी कमाई थी एक बेटी का अपनी मां से दोबारा मिल जाना।

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