नर्मदा ने क्यों ठुकराया विवाह और बदल ली अपनी दिशा? सोनभद्र और जुहिला से जुड़ी है मां नर्मदे की स्वाभिमान की अमर कथा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, अंधकासुर राक्षस का वध करने के बाद भगवान शिव अत्यंत थक गए थे। वे अमरकंटक की पर्वत श्रृंखलाओं में विश्राम कर रहे थे। इसी दौरान उनके मस्तक से गिरी पसीने की एक बूंद से एक अत्यंत सुंदर कन्या का जन्म हुआ। कहा जाता है कि उस कन्या ने भगवान शिव के मन को नर्म अर्थात सुख और शांति प्रदान की, इसलिए भगवान शिव ने उनका नाम नर्मदा रखा।

भगवान शिव ने नर्मदा को आशीर्वाद दिया कि प्रलय के समय भी उनका अस्तित्व समाप्त नहीं होगा। इसी कारण नर्मदा को सनातन परंपरा में अत्यंत पवित्र और दिव्य नदी के रूप में माना जाता है।

किंवदंती के अनुसार, नर्मदा का विवाह सोनभद्र नदी से तय हुआ था। दोनों एक-दूसरे से प्रेम करते थे। विवाह से पहले नर्मदा के मन में अपने होने वाले पति को देखने की इच्छा जागी। उन्होंने अपनी प्रिय सखी एवं दासी जुहिला को संदेश और उपहार देकर सोनभद्र के पास भेजा।

नर्मदा ने जुहिला को अपने आभूषण भी पहना दिए, जिससे वह राजकुमारी जैसी दिखाई देने लगी।

जब सोनभद्र ने सजी-धजी जुहिला को देखा, तो वे उसे ही नर्मदा समझ बैठे और उसके सौंदर्य पर मोहित हो गए। जुहिला भी इस आकर्षण में बह गई और उसने सोनभद्र को सच्चाई नहीं बताई।

इधर, जब काफी समय बीत जाने के बाद भी जुहिला वापस नहीं लौटीं, तो नर्मदा स्वयं सोनभद्र से मिलने निकल पड़ीं। वहाँ पहुँचकर उन्होंने जो देखा, उससे उनका हृदय आहत हो गया। सोनभद्र और जुहिला को साथ देखकर उन्हें अपने प्रेम में विश्वासघात का अनुभव हुआ।

नर्मदा ने उसी क्षण निर्णय लिया कि वे अब कभी विवाह नहीं करेंगी और जीवनभर कुमारी रहेंगी। उन्होंने अपनी दिशा बदल ली और पश्चिम की ओर बह चलीं, जबकि सोनभद्र पूर्व दिशा की ओर बहते रहे।

इसी लोककथा से यह मान्यता जुड़ी है कि भारत की अधिकांश प्रमुख नदियाँ पूर्व की ओर बहती हैं, लेकिन नर्मदा पश्चिम की ओर बहती हैं।

नर्मदा से जुड़ी पौराणिक मान्यताएँ यहीं समाप्त नहीं होतीं। कहा जाता है कि गंगा में स्नान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह नर्मदा के केवल दर्शन मात्र से प्राप्त हो जाता है।

एक लोकविश्वास के अनुसार, जब गंगा संसार के पापों को धोते-धोते स्वयं मलिन हो जाती हैं, तब वे एक काली गाय का रूप धारण करके नर्मदा में स्नान करने आती हैं और अपने को पुनः पवित्र करती हैं।

इसीलिए नर्मदा को केवल एक नदी नहीं, बल्कि पवित्रता, तप, स्वाभिमान और आत्मनिर्णय की प्रतीक भी माना जाता है।

नर्मदा की यह कथा हमें यह संदेश देती है कि विश्वासघात और पीड़ा के सामने भी अपने आत्मसम्मान से समझौता करना आवश्यक नहीं। उन्होंने परिस्थितियों के आगे झुकने के बजाय अपनी राह स्वयं चुनी।

आज भी नर्मदा का पश्चिम की ओर प्रवाह लोककथाओं में उनके उसी स्वाभिमान, संकल्प और स्वतंत्र अस्तित्व का प्रतीक माना जाता है।

 हर हर महादेव 

 जय मां नर्मदे 

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