कहा जाता है कि पुराने समय में जूनागढ़ में साधु-संतों के भिक्षा मांगने को लेकर एक कठोर नियम लागू था। यदि कोई साधु भिक्षा मांगते हुए पकड़ा जाता, तो उसे जेल भेज दिया जाता था। उस समय जेल में बंद साधुओं से चक्की चलाने जैसे कठिन काम भी करवाए जाते थे।
इसी दौरान एक संत के शिष्य को भी भिक्षा मांगने के आरोप में पकड़ लिया गया और जेल में डाल दिया गया।
जब संत को अपने शिष्य की गिरफ्तारी की जानकारी मिली तो वे उससे मिलने के लिए स्वयं जूनागढ़ पहुंच गए। लेकिन नगर में प्रवेश करते ही सिपाहियों ने उन्हें भी पकड़ लिया। इस तरह जिस शिष्य से मिलने वे आए थे, उसी जेल में उन्हें भी कैद कर दिया गया।
जेल में पहुंचकर संत ने देखा कि कई साधु-संत चक्कियां चला रहे हैं। उन्होंने अपने शिष्य और दूसरे साधुओं से चक्की छोड़ देने को कहा। लेकिन सिपाहियों ने संत से भी चक्की चलाने का आदेश दिया।
लोककथा के अनुसार, संत ने अपनी छड़ी उठाई और एक चक्की को स्पर्श करते हुए कहा—“चलना शुरू कर।”
कहानी में बताया जाता है कि इसके बाद वह चक्की अपने आप चलने लगी। जेल में मौजूद लोग यह देखकर हैरान रह गए। कुछ ही देर में वहां रखी दूसरी चक्कियां भी बिना किसी व्यक्ति के चलने लगीं।
इस असाधारण घटना की खबर जब जूनागढ़ के नवाब तक पहुंची तो वह स्वयं जेल में संत से मिलने पहुंचा। नवाब ने संत के सामने अपनी गलती स्वीकार की और साधु-संतों को मुक्त करने की बात कही।
संत ने उससे कहा कि साधु-संत भिक्षा मांगकर अपना जीवन चलाते हैं। उनके लिए भिक्षा मांगना जीवन-यापन का साधन है, अपराध नहीं। इसलिए केवल भिक्षा मांगने के कारण उन्हें दंडित करना उचित नहीं है।
लोकप्रचलित कथा के अनुसार, नवाब ने संत की बात स्वीकार कर ली और जेल में बंद साधु-संतों को रिहा कर दिया।
इस कहानी का सबसे बड़ा संदेश यही माना जाता है कि किसी पर नियम लागू करने से पहले उसके जीवन, परिस्थितियों और परंपरा को समझना जरूरी है। साथ ही, यह प्रसंग संतों के प्रति लोगों की आस्था और उस दौर की धार्मिक लोकपरंपराओं की झलक भी देता है।
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