सत्यवादी हरिश्चंद्र एक ऐसे राजा थे, जो अपने दिए वचन के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते। उनके इसी धर्म के कारण एक बार उनका सब कुछ छिन गया। पर क्या आप जानते हैं, इसके पीछे सूर्य पुत्र शनिदेव की वक्र दृष्टि, एक बड़ा कारण बनी।
‘सम्पूर्ण शनि उपासना’ पुस्तक में एक कथा है, जिसमें पहले शनिदेव ने राजा को रंक बनाया और फिर उनके इस कृत्य के लिए, उन्हें भी शाप भोगना पड़ा। तो चलिए सुनते हैं राजा हरिश्चंद्र और शनिदेव से जुड़ी, यह अनूठी कथा।राजा हरिश्चंद्र, सतयुग के एक बड़े प्रतापी राजा थे। सत्य उन्हें अपने प्राणों से भी प्रिय था, यही कारण है कि उन्हें सत्यवादी हरिश्चंद्र के नाम से आज भी जाना जाता है। उनके राज में न तो प्रजा को अकाल का सामना करना पड़ा और न ही कोई व्यक्ति अधर्म का कार्य करता। जब सब कुछ सही चल रहा था तो इंद्र देव को राजा हरिश्चंद्र के प्रति द्वेष होने लगा। उन्हें यह बात सताने लगी कि कहीं सत्यवादी हरिश्चंद्र अपने सत्य धर्म के बल पर उनका इंद्रासन न छीन लें।
इस बात से चिंतित होते हुए, उन्होंने ऋषि विश्वामित्र को बुलाया और कहा कि कुछ भी कर के ऋषि, राजा के सत्य बोलने के व्रत को विफल बना दें।ऋषि ने भी इंद्र का यह कार्य सहर्ष स्वीकार कर लिया और वे निकल पड़े, पृथ्वी पर अपनी योजना को पूरा करने के लिए। उन्होंने धरती पर रहते हुए तप करने का निश्चय किया और अपनी सुरक्षा का जिम्मा राजा हरिश्चंद्र पर छोड़ दिया। तपस्या के दौरान, उन्होंने अपनी योजना को सफल बनाने के लिए शनिदेव का आवाहन किया। शनिदेव भी चुपके से राजा हरिश्चंद्र के मस्तक पर बैठ गए।
रात में सोते समय राजा हरिश्चंद्र को एक सपना आया कि उन्होंने अपना पूरा राज-पाट एक ऋषि को दान में दे दिया है। फिर क्या था अगले दिन महर्षि विश्वामित्र सभा में पहुँच गए और उन्होंने राजा से सपने में किए हुए दान को माँगा। महर्षि ने कहा कि अगर तुम सच में सत्यवादी हो तो सपने में जो तुमने अपने राज्य का दान किया है, वह मुझे दे दो।
राजा हरिश्चंद्र ने स्वप्न की बात को स्वीकार किया और विश्वामित्र जी को राज-पाट, धन-कोष, हाथी-घोड़े सभी कुछ दान में दे दिया। जब राजा सभा से जाने लगे तो महर्षि ने उन्हें कहा कि अगर तुम अपना सब कुछ मुझे सौंप रहे हो तो फिर यह कीमती आभूषण और वस्त्रों को भी यहाँ छोड़ कर इस राज्य से चले जाओ। राजा ने उनकी यह बात भी मान ली। जब इस पर भी महर्षि संतुष्ट नहीं हुए तो राजा को रोकते हुए वे बोले कि राजा इस महादान की दक्षिणा तो तुमने मुझे दी ही नहीं।तब राजा ने उन्हें कहा कि जब मैं सब कुछ ही आपको दे चुका हूँ तो अभी दक्षिणा कहाँ से दूँ। राजा ने महर्षि से दक्षिणा देने के लिए एक माह का समय माँगा। राजा को चेतावनी देते हुए महर्षि ने कहा कि अगर वह एक माह में दक्षिणा देने में असफल रहे तो वे राजा को शाप दे देंगे।
राजा अपनी पत्नी और पुत्र के साथ पैदल ही चलते हुए काशी नगरी तक पहुँचे। इस बीच उन्हें शनिदेव का कुप्रभाव भी झेलना पड़ा, जिस कारण उनके मार्ग में कई कठिनाइयाँ भी आईं। एक माह का समय भी देखते-देखते बीत गया और विश्वामित्र, वहाँ भी उनसे अपनी दक्षिणा लेने के लिए पहुँच गए। पहले ही शनिदेव की वक्र दृष्टि के कारण जैसे-तैसे राजा अपने परिवार के साथ समय बिता रहे थे। लेकिन अपने वचन को पूरा करने के लिए राजा ने अपनी पत्नी, शैब्या को एक ब्राह्मण को बेच दिया। पर दक्षिणा का मूल्य पूरा नहीं हुआ, इसलिए उनके बेटे ने भी ब्राह्मण की दासता स्वीकार कर ली।
फिर उन्होंने खुद को एक डोम यानी चाण्डाल के हाथों बेच दिया और उस मूल्य से उन्होंने महर्षि विश्वामित्र जी को दक्षिणा दी।
इस पर भी शनिदेव को हरिश्चंद्र पर दया नहीं आई। अब चाण्डाल ने राजा हरिश्चंद्र को एक ऐसा कार्य सौंप दिया, जिसे वे सपने में भी नहीं सोच सकते थे। चाण्डाल ने उनसे कहा कि श्मशान में मुर्दा को जलाने के लिए आने वाले लोगों से वे कर वसूल करने का काम करेंगे।
वहीँ ब्राह्मण के घर में काम करते समय राजा के बेटे रोहित को शनिदेव ने साँप बन कर डस लिया और उसकी मृत्यु हो गई।अपने पुत्र की देह को अपनी बाँहों में उठाए हुए शैब्या श्मशान भूमि में दाह संस्कार के लिए पहुँची। अपने प्रिय पुत्र के शव को देख कर राजा संतप्त हो गए। लेकिन उसी समय उन्हें अपने स्वामी की बात याद आ गई, जिसमें बिना कर लिए संस्कार करने की अनुमति नहीं थी।
अब राजा ने अपने ही पुत्र का संस्कार करने के लिए, अपनी पत्नी शैब्या से कर के रूप में आधा कफन और एक स्वर्ण मुद्रा की माँग कर डाली। रानी शैब्या के पास तो कफन भी नहीं था, इसलिए वह अपने पुत्र को अपने ही आँचल में लपेट कर लाई थी।
उसने रोते-बिलखते हुए अपने आँचल का आधा भाग जैसे ही फाड़ना चाहा, वैसे ही आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी और देखते ही देखते सभी देवी-देवता श्मशान भूमि पर उतर आए। देवताओं के साथ महर्षि विश्वामित्र और इंद्र देव भी थे। उसी समय राजा हरिश्चंद्र का पुत्र रोहित भी जीवित हो गया। तभी विश्वामित्र ने उनसे कहा कि राजा उनकी कठिन परीक्षा में सफल हुए इसीलिए मैं तुम्हें पृथ्वी लोक ही नहीं, बल्कि स्वर्ग में भी अचल राज्य का आशीर्वाद देता हूँ। अपनी योजना में साथ देने के लिए विश्वामित्र जी ने शनिदेव का धन्यवाद भी किया।
जब राजा को शनिदेव के कार्यों की जानकारी हुई तो उन्होंने क्रोधित होते हुए शनिदेव को ही शाप दे डाला कि भविष्य में परोपकारी, धार्मिक और सत्यवादी लोगों पर शनि का कोई प्रभाव नहीं होगा।
इस तरह से देवताओं ने सत्यवादी हरिश्चंद्र की मिल कर परीक्षा ली, लेकिन राजा अपने धर्म के पथ से बिलकुल भी डगमगाए नहीं।
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