जाजलि' नाम के एक अत्यंत तेजस्वी मुनि थे। उन्होंने समुद्र के तट पर खड़े होकर कई वर्षों तक ऐसी कठोर तपस्या की कि वे अपनी देह की सुध-बुध भूल गए। वे काठ (लकड़ी के खंभे) की भांति बिल्कुल निश्चल खड़े रहते थे इतने वर्षों तक स्थिर रहने के कारण उनके सिर की जटाएं आपस में उलझकर घनी हो गईं।
एक दिन पक्षियों के एक जोड़े (कौआ और कबूतरी) ने सोचा कि यह कोई सूखा पेड़ है। उन्होंने मुनि के सिर की जटाओं के भीतर अपना घोंसला बना लिया। जाजलि मुनि को जब इसका भान हुआ, तो उन्होंने दयावश तनिक भी हिलना-डुलना बंद कर दिया ताकि पक्षियों के अंडे न गिरें।
मुनि जाजलि महीनों तक उसी प्रकार अडिग खड़े रह अंडों से नन्हे बच्चे निकले माता-पिता ने उन्हें दाना खिलाया जब बच्चों के पंख निकल आए और वे उड़ने लगे, तब जाकर मुनि जाजलि अपनी समाधि से हिले पक्षियों को सकुशल उड़ते देख मुनि जाजलि के भीतर एक भारी अहंकार भर गया। उन्होंने समुद्र की ओर देखकर अपनी छाती ठोकी और गर्जना की तीनों लोकों में मेरे समान बड़ा तपस्वी, दयालु और धर्मात्मा कौन है? मैंने अपने सिर पर पक्षियों के वंश का पालन किया है और अपनी इंद्रियों को पूरी तरह जीत लिया है!
जैसे ही मुनि ने यह अहंकार प्रकट किया, उसी क्षण आकाश से एक गंभीर, अलौकिक आकाशवाणी गूंजी हे जाजलि! व्यर्थ अहंकार मत करो। धर्म और सत्य के मामले में तुम वाराणसी के उस साधारण व्यापारी 'तुलाधार वैश्य' के चरण की धूल के बराबर भी नहीं हो!
यह सुनते ही मुनि जाजलि का अभिमान चूर-चूर हो गया। वे स्तब्ध रह गए कि एक साधारण हाट-बाज़ार में सामान बेचने वाला व्यापारी उनसे बड़ा धर्मात्मा कैसे हो सकता है मुनि सत्य का रहस्य जानने के लिए तुरंत वाराणसी (काशी) की ओर चल पड़े।
काशी पहुँचकर मुनि ने देखा कि एक साधारण सी पंसार (किराने/जड़ी-बूटी) की दुकान पर 'तुलाधार' नाम का एक सीधा-साधा वैश्य अपनी तराजू (तुला) लेकर बैठा है। वह ग्राहकों को तेल जड़ी-बूटियाँ और अन्न तौलकर दे रहा था जैसे ही जाजलि मुनि दुकान के सामने पहुँचे, तुलाधार ने तराजू नीचे रखी और उठकर मुनि के चरण स्पर्श किए तुलाधार मुस्कुराते हुए बोला:
"हे महर्षि जाजलि! आपका स्वागत है। मुझे ज्ञात है कि आप अपने सिर पर पक्षियों के बच्चे पालने के बाद आकाशवाणी की बात सुनकर सीधे मेरे पास आ रहे हैं मुनि जाजलि सन्न रह गए कि इस साधारण दुकानदार को यह सब कैसे पता!
मुनि जाजलि ने हाथ जोड़कर पूछा हे तुलाधार! तुमने न कोई वन में तप किया, न कोई बड़ा यज्ञ किया। फिर तुम्हें यह अलौकिक दिव्य-दृष्टि और धर्म का ऐसा सर्वोच्च पद कैसे प्राप्त हुआ?
तुलाधार ने अत्यंत सहज भाव से धर्म का वह रहस्य समझाया जो शास्त्रों का निचोड़ है:
"हे मुनिवर! मेरा धर्म इस 'तराजू की सुई' की तरह है, जो सदा बिल्कुल बीच में स्थिर रहती है—न इधर झुकती है, न उधर।
मैं न किसी से अत्यधिक मित्रता रखता हूँ, न किसी से शत्रुता। मैं हर प्राणी को अपने समान देखता हूँ।
मैं किसी ग्राहक को ठगता नहीं, घटिया माल में मिलावट नहीं करता, कम नहीं तौलता और न ही किसी की मजबूरी का फायदा उठाकर अधिक दाम लेता हूँ।
मैं अपनी आजीविका के लिए किसी जीव को पीड़ा नहीं पहुँचाता।
अपने गृहस्थ-कर्म को बिना किसी लोभ, छल और अहंकार के सत्यनिष्ठा से निभाना ही मेरी सबसे बड़ी तपस्या है।
तुलाधार के इन सरल किंतु वज्र जैसे सत्य वचनों को सुनकर मुनि जाजलि को अपनी भूल का बोध हुआ उन्हें समझ आया कि जंगल में जाकर खड़े हो जाना और फिर उसका अहंकार पाल लेना धर्म नहीं है; बल्कि संसार में रहकर, अपने नित्य के कर्मों में निष्कपट, सत्यवादी और लोभ-मुक्त बने रहना ही सच्चा वैराग्य और सर्वोच्च धर्म है मुनि जाजलि ने तुलाधार को अपना गुरु माना, उनके चरणों में शीश झुकाया और अहंकार त्यागकर निष्काम भाव से ईश्वर-भक्ति में लीन हो गए।
!! जय श्री कृष्णा!!
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