दोस्त ने कहा “मेहनत कर और चने बेच”, परसा ने बात मानी और बदल दी अपनी किस्मत

 

एक गांव में परसा नाम का एक गरीब आदमी रहता था। गरीबी ऐसी थी कि कई बार उसके घर में चूल्हा जलना भी मुश्किल हो जाता था।

घर में छोटे-छोटे बच्चे थे। उनकी भूख और मासूम चेहरे देखकर परसा का कलेजा मुंह को आ जाता, लेकिन उसके पास करने को कुछ नहीं था।

एक दिन उसका पुराना दोस्त हरदेवा उससे मिलने पहुंचा।

हरदेवा ने जैसे ही परसा का घर देखा, उसकी आंखें भर आईं। घर में खाने का एक दाना तक नहीं था और बच्चे भूख से रो रहे थे।

हरदेवा ने बिना ज्यादा सवाल किए अपनी जेब से कुछ रुपये निकाले और परसा के हाथ में रख दिए।

उसने कहा,

“भाई, सबसे पहले घर का राशन ला। बच्चों को खाना खिला। लेकिन सिर्फ इन पैसों से काम नहीं चलेगा। मेरे साथ चल, मैं तुझे ऐसा काम बताता हूं जिससे तू रोज कमा सके।”

हरदेवा परसा को लेकर रेलवे स्टेशन पहुंचा।

वहां उसने एक टोकरी खरीदी और उसमें चने, टमाटर, प्याज और कुछ मसाले रखवा दिए।

फिर उसने परसा से कहा,

“ट्रेन में जाकर चने बेच। जो बिकेगा उससे पैसे मिलेंगे। उन पैसों से फिर सामान खरीद लेना और अगले दिन दोबारा बेच देना। धीरे-धीरे यही काम बड़ा कर लेना।”

परसा के पास खोने के लिए कुछ था ही नहीं।

वह पहली बार ट्रेन में चने बेचने चढ़ गया।

शुरुआत में उसे संकोच हो रहा था। लेकिन जैसे ही उसने आवाज लगाई—

“गरम चने ले लो...”

एक यात्री ने आवाज दी—

“अरे परसा, दस रुपये के चने देना।”

दूसरे ने कहा—

“परसा, बीस रुपये के चने इधर देना।”

उस दिन उसकी अच्छी बिक्री हो गई।

परसा को पहली बार महसूस हुआ कि मेहनत करके वह अपने बच्चों का पेट भर सकता है।

अगले दिन वह फिर ट्रेन में पहुंच गया।

फिर अगले दिन...

और फिर रोज।

धीरे-धीरे यात्रियों के बीच उसकी पहचान बनने लगी।

लोग उसे नाम से पुकारने लगे—

“अरे परसा, इधर आना।”

“परसा, बीस रुपये के चने देना।”

कुछ ही समय में उसकी कमाई इतनी बढ़ गई कि उसने ट्रेन में घूमकर चने बेचने की जगह रेलवे स्टेशन के बाहर अपना छोटा-सा ठेला लगा लिया।

अब लोग उसे परसा नहीं, प्यार से परशु कहने लगे।

काम बढ़ा तो उसने सामान थोक में खरीदना शुरू किया। मुनाफा बढ़ने लगा।

परसा ने वहीं नहीं रुकना चाहा।

उसने अपनी कमाई बचाई और कुछ समय बाद मंडी में एक छोटी-सी आढ़त की दुकान खोल ली।

जिस आदमी के घर कभी चूल्हा जलाना मुश्किल था, अब उसके यहां कारोबार चलने लगा था।

मेहनत, समझदारी और लगातार आगे बढ़ने की इच्छा ने उसकी जिंदगी बदल दी।

कुछ वर्षों बाद उसकी दुकान बड़ी हो गई।

फिर एक और दुकान खुली।

कारोबार बढ़ता गया।

अब नगर के बड़े व्यापारी भी उसके साथ व्यापार करने लगे।

धीरे-धीरे परसा नगर के गिने-चुने धनवान लोगों में शामिल हो गया।

अब लोग उसे परशु नहीं कहते थे।

हर कोई सम्मान से कहता—

“सेठ परशुराम जी।”

लेकिन इस बदलाव के बीच एक चीज नहीं बदली थी—उसकी मेहनत।

इधर उसका दोस्त हरदेवा कई वर्षों तक उससे नहीं मिल पाया था।

एक दिन उसे अचानक परसा की याद आई।

उसने सोचा—

“बहुत साल हो गए। पता नहीं मेरा दोस्त कैसा होगा? उसका काम चल भी रहा होगा या नहीं?”

हरदेवा अपने दोस्त को ढूंढने उसी नगर पहुंच गया।

लेकिन रेलवे स्टेशन के आसपास पूछने पर उसे परसा नाम का कोई आदमी नहीं मिला।

उसने लोगों से पूछा—

“भाई, यहां परसा नाम का एक आदमी चने बेचा करता था। जानते हो उसे?”

लोगों ने एक-दूसरे की तरफ देखा और कहा—

“परसा? यहां तो ऐसा कोई नहीं रहता। हां, हमारे नगर में एक बड़े व्यापारी हैं—सेठ परशुराम जी। लेकिन तुम्हारा दोस्त शायद वह नहीं हो सकता।”

हरदेवा ने कहा—

“उनका पता बताओ।”

लोगों ने उसे सेठ परशुराम की हवेली का रास्ता बता दिया।

हरदेवा जब हवेली पहुंचा तो सामने खड़े अमीर व्यापारी को देखकर कुछ पल के लिए चुप रह गया।

लेकिन फिर उसने ध्यान से देखा और जोर से हंसते हुए बोला—

“अरे परसा! तू तो हमारा वही परसा है!”

सेठ परशुराम भी अपने पुराने दोस्त को देखकर भावुक हो गए।

दोनों दोस्त गले मिले।

हरदेवा ने पूछा—

“भाई, तूने इतनी तरक्की कैसे कर ली?”

परशुराम मुस्कुराए और बोले—

“भाई, जिस दिन तूने मुझे पैसे देकर सिर्फ मदद नहीं की थी, बल्कि मेहनत करने का रास्ता दिखाया था, उसी दिन मेरी जिंदगी बदल गई थी।”

फिर उन्होंने हंसते हुए कहा—

“पहले मैं परसा था, फिर लोग परशु कहने लगे और आज सेठ परशुराम कहलाता हूं। असल में ये मेरे तीन नाम नहीं, मेरी जिंदगी के तीन पड़ाव हैं।”

दोनों दोस्त देर तक पुरानी बातें करते रहे।

कहानी की सीख

इंसान की शुरुआत चाहे कितनी भी छोटी क्यों न हो, अगर उसे सही दिशा, मेहनत और अवसर मिल जाए तो उसकी मंजिल बहुत बड़ी हो सकती है।

कभी-कभी किसी जरूरतमंद को सिर्फ पैसे देने से ज्यादा जरूरी होता है उसे कमाने का रास्ता दिखाना

परसा की कहानी यही बताती है कि हालात इंसान की पहचान नहीं होते, उसके कर्म और मेहनत उसकी असली पहचान बनाते हैं।

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