एक साधू का अंतिम समय आ गया समाधी लेने से पहले मुख्य शिष्य ने कहा कि गुरूजी कोई ज्ञान दें ताकि उसपर चलकर हमारा उद्धार हो सके। साधु ने कहा कि भाई कुछ भी हो जाए मगर बिल्ली मत पालना। ऐसा कहकर साधु समाधी ले गया।
पूरे गांव में बात फैल गई कि साधू ये कहकर मरा है कि बिल्ली मत पालना, अतः सारे गांव ने बिल्ली पालनी बंद कर दी। लेकिन जो मुख्य शिष्य था उसके गले से बात नहीं उतरी सोचा कि भाई 80 साल तपस्या की और मरते वक्त ज्ञान दिया की कभी बिल्ली मत पालना, इस बात को लेकर वह परेशान रहता।
शिष्य एक दिन उस साधु के गुरू भाई के पास पहुंचा और अपनी समस्या बताई। गुरू भाई ने कहा कि बिल्कुल सही कहकर गए हैं बिल्ली पालकर आपके गुरुजी बर्बाद हो गए। दरअसल बहुत सालों पहले जब आपके गुरुजी इस आश्रम में आए थे तो एकाएक आश्रम में बहुत सारे चुहे हो गए, तो गांव वालों ने कहा कि महाराज बिल्ली पाल लो।
बिल्ली पाली गई वह दूध पीती और चूहों को मार देती, गांव वालों ने कहा कि इतनी दूर रोज कौन दूध पहुंचाए? चलिए आपको एक गाय दे देते हैं ताकि बिल्ली दूध पी सके। गाय आ गई बिल्ली दूध पीती और शिकार जारी रहता। फिर पता चला कि गाय आ गई है अब उसे चारा भी चाहिए, गांव वाले कुछ दिनों तक चारा लाए फिर कहा कि कौन चारा लाए रोज रोज? ऐसा करते हैं बाबाजी आपको एक खेत दे देते हैं, आपकी गाय चारा खाती रहेगी।
कुछ दिनों में उस खेत का चारा खत्म हो गया, तो समस्या आई कि इसपर अब दोबारा चारा उगाने के लिए खेती कौन करे? साधु ने कहा कि मैं हरि भजन के लिए साधु बना था अब गाय की सेवा में ही लगा रहता हूं हरि भजन कब करूं? गांव वालों ने कहा कि बाबाजी गांव में एक बेचारी विधवा है वो यहां रहकर खेती करेगी और गाय को संभालेगी, उसकी दो रोटी और मकान की समस्या खत्म हो जाएगी आपकी काम करने वाले दिक्कत दूर हो जाएगी।
विधवा महिला आश्रम में ठहर गई, महिला बड़ी सुंदर लावणयमयी थी और साधु की सेवा भी करती कभी पैर दबाती कभी सिरदर्द होता तो सिर दबा देती,अब साथ रहते तो जाहिर है लगाव बनना ही था, नजदिकियां भी बढ़नी थीं तो एक दिन गांव वालों ने साधु और विधवा को साथ देख लिया, इकट्ठा होकर आश्रम में आए और कहा कि बाबाजी ऐसे नहीं आपको विधवा से विवाह करना होगा।
अब विवाह हो गया तो बच्चे भी हो गए उनका पालन पोषण किया, शादी करवाई। तेरे गुरू का सारा जीवन इसी में निकल गया और इसीलिए तुम्हें ज्ञान देकर गए हैं कि कुछ भी हो मगर बिल्ली मत पालना।
मुसीबत हमेशा बड़ी चीज बनकर नहीं आती। कई बार वह एक छोटी-सी सुविधा के रूप में आती है, जिसे हम बिना सोचे स्वीकार कर लेते हैं। फिर वही सुविधा धीरे-धीरे हमारी पूरी जिंदगी की दिशा बदल देती है।
ये कहानी मैंने ओशो रजनीश जी के एक विडियो में सुनी थी। साभार
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