विद्वान ने 5 रुपए लेकर बताई थीं पांच बातें, चैन सिंह ने जीवनभर याद रखा… पांचवीं बात ने राजा का महल छोड़ने पर मजबूर कर दिया

चैन सिंह नाम के ठाकुर के इलाके में अकाल पड़ गया वो दाने दाने को मोहताज हो गया और आखिर में अपने घोड़े पर सवार होकर निकल पड़ा कि अब किसी दूसरे राज्य में जाकर गुजर बसर करना पड़ेगा। चलते चलते एक इलाके में पहुंचा जहां ठाकुरों के घर थे, चैन सिंह एक ठाकुर के घर रूक गया।

उस ठाकुर के घर एक घोड़ी थी जोकि हर साल बच्चा देती लेकिन उसके बच्चे पता नहीं क्या कारण लेकिन दुध नहीं पीते थे और तीन चार दिन बाद मर जाते। आज भी ठाकुर की घोड़ी ने बच्चा दिया था ठाकुर परेशान था कि अब ये बच्चा भी नहीं बचेगा। चैन सिंह ने ठाकुर का चेहरा देखकर पढ़ लिया कि वह परेशान है।

चैन सिंह के पुछने पर उसने अपनी परेशानी बताई, चैन सिंह ने कहा कि इसका तो मुझे बहुत तजुर्बा है अतः मैं घोड़ी के बच्चे को दूध पिला दूंगा और उसने ऐसा कर भी दिखाया, घोड़ी के बच्चे को दूध पीते देख ठाकुर बड़ा प्रसन्न हुआ और चैन सिंह को 25 रुपए दिए। लेकिन चैन सिंह ने इनकार करते हुए कहा कि मैंने आपके घर का नमक खाया है अतः आपसे पैसे नहीं ले सकता।

खैर ठाकुर नहीं माना तो चैन सिंह ने 5 रूपए रख लिए और अपने घोड़े पर सवार होकर आगे बढ़ चला, एक जगह एक व्यक्ति बहुत सारी पुस्तकों की गठरी बांध कर आ रहा था, चैन सिंह ने पूछा आप कहां से आ रहे हैं? आदमी ने कहा कि मैं काशी से पढ़कर आया हूं। दोनों पेड़ के नीचे बैठकर सुस्ताने लगे तो चैन सिंह ने पूछा कि आप काशी पढ़े हैं तो आप तो बड़ी अच्छी अच्छी बातें जानते होंगे। विद्वान ने कहा कि हां भाई मैं बड़ी अच्छी बातें पढ़कर आया हूं लेकिन उन्हें बताने के लिए एक बात का एक रूपया लेता हूं।

अब चैन सिंह के पास 5 रुपए थे तो उसने विद्वान को एक रूपया देते हुए कहा कि एक अच्छी बात बताओ, विद्वान ने रूपया जेब में रखते हुए कहा कि जिस राज्य में आप रहें तो सुबह भगवान की माला रटना और साथ ही एक माला उस राज्य के राजा के नाम की भी रटना क्योंकि उसकी भूमि पर आप कमा खा रहे हो। चैन सिंह ने कहा ठीक बात है, अब लो एक और रूपया अगली बताओ।

विद्वान बोला अगर किसी का कोई राज पता चल जाए तो उसे उजागर मत करो अपने दिल में दबा लो। चैन सिंह ने कहा कि ये भी बिल्कुल सही है उसने एक और रूपया दिया और अगली बात पूछी। विद्वान ने बताया कि कितनी भी जल्दी हो अगर कोई जान पहचान का यारा प्यारा आदमी मिल जाए तो दो मिनट उसके पास जरूर ठहरो हाल चाल पूछो। चैन सिंह को ये बात भी बड़ी अच्छी लगी और एक रूपया देते हुए अगली बात पूछी विद्वान ने कहा कि अपने से पद या उम्र में छोटा आदमी साथ हो तो काम उसी से करवाओ बेशक अपने पास समय हो, हां अपने से बड़े को कोई काम नहीं बताना चाहिए।

चैन सिंह ने कहा सही बात है अब पांचवा और अंतिम रूपया है एक बात और बताओ। विद्वान ने रूपया जेब में रखते हुए कहा कि जहां मन में भेद आ जाए बेशक सोने का महल बना हो वहां रहना ही नहीं चाहिए। चैन सिंह ने कहा कि ठीक है भाई राम-राम। ऐसा कहकर वह चल पड़ा।

चैन सिंह एक अच्छी नगरी में पहुंचा और वहां अपना काम धंधा आरंभ किया, उसका नियम था कि रोज सुबह कुंए पर स्नान करता और भगवान के नाम की माला रटता, साथ ही एक माला उस राज्य के राजा के नाम की भी रटता। धीरे धीरे ये बात नगर में फैल गई कि ये आदमी तो राजा के नाम की माला भी रटता है, उनके लिए ये एक नई बात थी। बात इतनी फैल गई कि राजा के पास भी पहुंची कि फलां गांव में एक आदमी आया है और आपके नाम की माला रटता है। आदमी बड़ा बढ़िया है अपने दस नाखुनों की कमाई खाता है।

राजा ने कहा कि आज के जमाने में कितना भी अच्छा काम कर लो लेकिन कोई दाद नहीं देता तो माला कौन रटेगा? राजा भेष बदलकर उस कुएं पर पहुंच गया और चैन सिंह को अपने नाम की माला रटते देख चौंक गया। अगले दिन उसे दरबार में बुलाया और पूछा कि चैन सिंह मैंने देखा है कि तुम मेरे नाम की माला रटते हो लेकिन आज किसी का कितना भी भला कर लो कोई अहसान नहीं मानता और तू माला रट रहा है इसका क्या कारण है?

चैन सिंह ने कहा कि जी मैं मुसीबतों का मारा हूं हमारे राज्य में अकाल पड़ा था, लेकिन आपकी नगरी कितनी अच्छी है मैं यहां आराम से कमा खा रहा हूं और नगरी आपकी है तो धन्यवाद भी आपका करूंगा तो इसलिए आपके नाम की माला रटता हूं।

राजा बोला कि चैन सिंह कल से दरबार में आना शुरू कर दे और करना कुछ नहीं जब भी मुझे सलाह की जरूरत हो दे दिया करना इतनी तनख्वाह दूंगा। चैन सिंह बोला कि ठीक है महाराज मुझे काम की ही तलाश है लेकिन एक शर्त है कि जब मैं दरबार में आऊं तो आपको कहना है कि आओ भाई चैन सिंह, और जब जाऊं तब कहना है कि जाओ चैन सिंह। राजा ने उसकी शर्त मान ली।

चैन सिंह दरबार में रहता और बड़ी अच्छी सलाह देता उसकी सलाह राजा के काम आतीं, वो आता तो राजा कहता कि आओ चैन सिंह और जाता तो कहता ठीक है चैन सिंह समय पूरा हुआ जाओ। एक दिन राजा ने कुछ तमाशे वाले बुला लिए और तमाशा खत्म होते होते ओलावृष्टि आरंभ हो गई कोई इधर से भागा कोई उधर से, इसी हड़बड़ाहट में राजा चैन सिंह को कहना भूल गया कि जाओ चैन सिंह।

आधी रात रानी की आंख खुली तो उसने खिड़की से बाहर झांका तभी बिजली चमकी और रानी को एक आदमी तमाशे वाली जगह बैठा दिखाई दिया और उसने राजा को बताया। राजा को याद आया कि आज चैन सिंह से कहना भूल गया था कि जाओ चैन सिंह। अतः वही होगा राजा ने पहरेदार भेजकर उसे बुलाया और देखा उसे सर्दी लग चुकी थी और कड़कड़ा रहा था राजा ने कहा कि अरे चैन सिंह क्या बात थी यार चला जाता। चैन सिंह ने कहा कि जी अपनी शर्त बंधी हुई थी बिना कहे मैं कैसे जा सकता हूं?

राजा ने कहा कि भाई जाकर आराम कर ले और ये दुशाला ओढ़कर चला जा सर्दी बहुत है। चैन सिंह ने दुशाला ओढ़ा और चल पड़ा, जैसे ही महल के पास बने मकानों को पार किया दरोगा का मकान आ गया तभी राजा की मुख्य सेविका जोकि राजा के सभी काम देखती थी और राजा उसपर आंख बंद करके भरोसा करता था दरोगा के घर से निकली, उसकी हालत देखकर चैन सिंह समझ गया कि उसका दरोगा के साथ अनैतिक संबंध है लेकिन तभी उसे विद्वान की बात याद आई कि किसी का राज पता चल जाए तो उसे भीतर ही दबा लो। तो उसने सेविका से कुछ नहीं कहा लेकिन वह कांप रही थी तो उसने राजा का दिया दुशाला उसे ओढ़ा दिया और अपने ठिकाने पर चला गया।

सुबह जब वह सेविका उठी तो उसने दुशाला पहचान लिया कि राजा का है और चैन सिंह राजा का सलाहकार है अतः उसका भेद खुल जाएगा और राजा से मृत्यु दण्ड मिलेगा। अतः वह उस दुशाले को लेकर राजा के पास पहुंची और कहा कि दुहाई हो महाराज कल मेरे घर में चैन सिंह घुस गया था और जब वह भागा तो ये दुशाला वहां खींचतान में गिर गया यही उसके घर में घुसने का सबुत है।‌

राजा ने दुशाला पहचान लिया और बड़ा दुखी हुआ कि मैं उसे इतना सज्जन पुरुष समझता था और वह इतना नीच निकला, राजा ने चैन सिंह को बुलाया और एक चिट्ठी देते हुए कहा कि चैन सिंह जितना जल्दी हो सके फलां जगह एक तौपची है उसे देकर आजा। चैन सिंह ने कहा कि ठीक है और चल पड़ा तभी रास्ते में उसे अपना ठाकुर दोस्त मिल गया जिसकी घोड़ी के बच्चे को दूध पिलाया था। विद्वान की बात याद आई कि कितनी भी जल्दबाजी हो अपना कोई दोस्त मिल जाए तो दो मिनट रूककर उससे हाल-चाल पूछ लेना चाहिए।

वे दोनों खड़े ही हुए थे तभी वहां वही दरोगा आ गया जिसके संबंध उस सेविका से थे, तभी चैन सिंह को विद्वान की बात याद आई कि अपने से पद में छोटे व्यक्ति से काम लेना चाहिए। तो वह ठहरा राजा का सलाहकार उसके सामने दरोगा मामूली नौकर, तो दरोगा से कहा कि जितना जल्दी हो सके ये चिट्ठी फलां तौपची को दे आ। दरोगा ने चिट्ठी ली और सलाम करके चला गया।

उधर जैसे ही तौपची ने वो चिट्ठी पढ़ी दरोगा को तोप से बांधकर उड़ा दिया। इधर चैन सिंह दरबार पहुंचा तो राजा ने देखा कि ये तो वापस आ गया जबकि मैंने चिट्ठी में लिखा था कि जो चिट्ठी लेकर आया है इसे तोप से बांधकर उड़ा दो। उसने पूछा हां चैन सिंह चिट्ठी दे आया? चैन सिंह बोला कि जी दरोगा देने के लिए।

राजा ने कहा ओह उसे तो तौपची ने उड़ा दिया होगा। चैन सिंह का माथा ठनका बोला कि महाराज आपने मुझे उडाने के लिए वहां भेजा था? राजा बोला कि हां चैन सिंह मुझे नहीं पता था कि तुम इतने नीच आदमी हो जो सेविकाओं के कक्ष में घुस जाओगे, देखो जो दुशाला मैंने तुम्हें दिया था सबुत के तौर पर पड़ा है।

चैन सिंह बोला कि जी बात ये नहीं थी मैं किसी के घर नहीं घुसा, दर‌असल मैं जब यहां से निकला तो ये दरोगा के घर से निकली और बूरी तरह कांप रही थी तो मैंने दुशाला इसे ओढ़ा दिया मैं वचनों से बंधा था कि किसी का राज नहीं खोलना इसीलिए किसी को नहीं बताया। और अब जो दोषी था वो तोप से उड़ गया।

राजा बड़ा खुश हुआ और बोला कि भाई चैन सिंह आज से तेरी तनख्वाह दुगनी करता हूं। इसके साथ ही उसने उस सेविका को भी सख्त सजा दी। लेकिन तबतक चैन सिंह को विद्वान की पांचवीं बात याद आ गई थी वो बोला कि नहीं महाराज एक राजा का विवेक होता है लेकिन आपकी सेविका ने आपके कान भरे और आपने फटाफट चिट्ठी लिखकर दे दी और मुझे मरने के लिए भेज दिया वो तो मेरी किस्मत अच्छी थी जो मैं बच गया।

वरना अभी तक मेरे शरीर के चिथड़े उड़ गए होते। तो जिस राजा में विवेक नहीं सही गलत फैसले लेने की क्षमता नहीं उसके पास रहकर मैं क्या करूंगा। चैन सिंह वहां से चल पड़ा घोड़ी पर सवार होकर अपने गांव पहुंचा तो देखा कि अकाल खत्म हो गया है और उसने दोबारा अपनी खेती बाड़ी शुरू कर दी।

उसके पास न राजा का दरबार था, न बड़ी तनख्वाह रही लेकिन अब उसके पास अनुभव था। और शायद उसने समझ लिया था कि आदमी की असली संपत्ति वह नहीं जो वह कमाता है, बल्कि वह समझ है जो उसे यह तय करना सिखाती है कि उसे कहाँ रहना है और कहाँ से चले जाना है।

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