कानपुर में रहने वाले 39 वर्षीय अरुण की शादी को पांच साल हो चुके थे। उसकी पत्नी स्मिता हर मंगलवार शाम करीब 7 बजे घर से निकलती थी। वह हमेशा कहती कि मंदिर जा रही है, लेकिन करीब दो घंटे बाद ही लौटती।
अरुण ने कई बार पूछा, लेकिन स्मिता हर बार बात टाल देती।
एक मंगलवार अरुण ने उसका पीछा करने का फैसला किया। स्मिता मंदिर जाने के बजाय शहर के पुराने इलाके में पहुंची और एक छोटे से मकान के सामने रुक गई। उसने दरवाजा खटखटाया और अंदर चली गई।
करीब आधे घंटे बाद अरुण भी वहां पहुंच गया।
दरवाजा खुला तो सामने करीब 60 साल का एक व्यक्ति खड़ा था। अरुण ने स्मिता से पूछा कि वह यहां क्यों आती है।
स्मिता कुछ देर चुप रही और फिर उस व्यक्ति की तरफ देखने लगी।
उस व्यक्ति ने अंदर से एक पुराना लकड़ी का संदूक निकाला।
संदूक खुलते ही अरुण की नजर कुछ पुरानी तस्वीरों और कागजात पर पड़ी। एक तस्वीर में अरुण के पिता भी दिखाई दे रहे थे।
अरुण के होश उड़ गए।
स्मिता ने बताया कि यह व्यक्ति उसके पिता का पुराना कारोबारी साथी था। करीब 12 साल पहले दोनों ने मिलकर एक जमीन खरीदी थी, लेकिन कागजात में गड़बड़ी के कारण मामला अदालत तक पहुंच गया था।
स्मिता को कुछ महीने पहले पुराने दस्तावेज मिले थे। उसे पता चला कि उस जमीन के एक हिस्से पर अब अरुण के परिवार का भी दावा था।
वह हर मंगलवार इसी व्यक्ति से मिलकर पुराने दस्तावेज जुटा रही थी ताकि सच्चाई सामने आ सके।
लेकिन कहानी का सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब संदूक के नीचे से एक और फाइल निकली।
उसमें जमीन की मूल रजिस्ट्री थी।
रजिस्ट्री पर जिस व्यक्ति के हस्ताक्षर थे, वह कोई बाहरी व्यक्ति नहीं बल्कि अरुण का अपना चचेरा भाई था।
अरुण को समझ आ गया कि परिवार में जमीन को लेकर चल रहा विवाद सिर्फ पैसों का मामला नहीं था। वर्षों पहले दस्तावेजों में बदलाव करके संपत्ति का हिस्सा बदलने की कोशिश की गई थी।
स्मिता ने यह बात पति से इसलिए छिपाई थी क्योंकि उसे डर था कि परिवार में विवाद और बढ़ जाएगा।
अगले दिन दोनों ने सभी दस्तावेज लेकर कानूनी सलाह ली और मामले की जांच शुरू कराई।
अरुण को जिस बात का शक था कि पत्नी हर मंगलवार किसी से छिपकर मिलने जाती है, उसके पीछे न कोई प्रेम संबंध था और न कोई गुप्त रिश्ता—बल्कि उसके अपने परिवार से जुड़ा 12 साल पुराना संपत्ति विवाद था।
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