हनुमान चालीसा की रचना कैसे हुई? तुलसीदास को जब अकबर ने कैद किया तो बंदीगृह में लिखी गईं 40 चौपाइयों की सुनिए प्रचलित कथा


 हनुमान जी की आराधना करने वाले करोड़ों भक्त रोज हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं। संकट के समय लोग श्रद्धा से कहते हैं—“संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।”

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर हनुमान चालीसा की रचना कैसे हुई थी?

लोकप्रिय धार्मिक कथा के अनुसार, इसके पीछे गोस्वामी तुलसीदास जी से जुड़ी एक बेहद रोचक घटना सुनाई जाती है। कथा में मुगल बादशाह अकबर, बीरबल, तुलसीदास और हनुमान जी की भक्ति का प्रसंग आता है।

कहानी के अनुसार यह वह समय था जब तुलसीदास जी रामभक्ति में पूरी तरह डूबे हुए थे और श्रीरामचरितमानस की रचना के कारण उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल चुकी थी।

एक बार तुलसीदास जी मथुरा की ओर जा रहे थे। रास्ते में रात होने लगी तो उन्होंने आगरा में विश्राम करने का निर्णय लिया। जैसे ही लोगों को पता चला कि महान रामभक्त तुलसीदास जी आगरा में ठहरे हैं, उनके दर्शन के लिए लोगों की भीड़ जुटने लगी।

यह बात धीरे-धीरे मुगल दरबार तक भी पहुंची।

कथा के अनुसार बादशाह अकबर ने अपने दरबार में बीरबल से पूछा—

“यह तुलसीदास कौन हैं, जिनके दर्शन के लिए इतनी भीड़ उमड़ रही है?”

बीरबल ने बताया कि तुलसीदास महान रामभक्त हैं और उन्होंने भगवान श्रीराम के जीवन पर आधारित रामचरितमानस की रचना की है।

अकबर ने भी तुलसीदास से मिलने की इच्छा जताई।

कहा जाता है कि बादशाह की ओर से तुलसीदास जी को दरबार में आने का संदेश भेजा गया। लेकिन तुलसीदास जी ने दरबार में जाने से इनकार कर दिया।

उनका भाव यही था कि वे किसी राजा या बादशाह की कृपा पाने के लिए नहीं, बल्कि भगवान श्रीराम की भक्ति के लिए जीवन समर्पित कर चुके हैं।

जब यह बात अकबर तक पहुंची तो उन्हें बहुत क्रोध आया।

लोकप्रिय कथा के अनुसार, आदेश दिया गया कि तुलसीदास जी को जबरन दरबार में लाया जाए।

तुलसीदास जी को बंदी बनाकर अकबर के सामने पेश किया गया।

अकबर ने उनसे कहा कि यदि वे वास्तव में कोई महान संत और चमत्कारी पुरुष हैं, तो उन्हें कोई करिश्मा करके दिखाना चाहिए।

तुलसीदास जी ने कथित रूप से स्पष्ट कहा कि वे कोई जादूगर नहीं हैं। वे तो केवल भगवान श्रीराम के भक्त हैं। चमत्कार दिखाना उनका उद्देश्य नहीं है।

इस उत्तर से अकबर और नाराज हो गए और कथा के अनुसार तुलसीदास जी को बंदीगृह में डाल दिया गया।

यहीं से कहानी का सबसे प्रसिद्ध और अद्भुत हिस्सा शुरू होता है।

कहा जाता है कि बंदीगृह में तुलसीदास जी ने सांसारिक सहायता की उम्मीद छोड़कर भगवान श्रीराम और पवनपुत्र हनुमान का स्मरण करना शुरू कर दिया।

वे लगातार प्रभु का नाम लेते रहे।

उनकी आंखों से आंसू बहते रहे और वे हनुमान जी से अपनी रक्षा की प्रार्थना करते रहे।

लोकप्रिय मान्यता के अनुसार इसी अवस्था में उनके भीतर से हनुमान जी की भक्ति से भरी चौपाइयां फूटने लगीं।

एक के बाद एक चौपाइयां लिखी जाती गईं।

इन्हीं चालीस चौपाइयों को आगे चलकर “हनुमान चालीसा” के नाम से जाना गया।

हनुमान चालीसा वास्तव में भगवान हनुमान की महिमा, शक्ति, ज्ञान, भक्ति और श्रीराम के प्रति उनकी अनन्य सेवा का स्तवन है। इसकी शुरुआत गुरु के चरणों की वंदना से होती है और फिर हनुमान जी के गुणों का वर्णन आता है। उपलब्ध धार्मिक स्रोत भी इसे तुलसीदास से संबद्ध 40 पदों/चौपाइयों वाली हनुमान स्तुति बताते हैं।

लेकिन कथा यहीं खत्म नहीं होती।

लोकप्रिय कहानी के अनुसार, अगले दिन आगरा के किले और आसपास के इलाके में अचानक बड़ी संख्या में बंदर दिखाई देने लगे।

कहा जाता है कि बंदरों के झुंड ने पूरे इलाके में उत्पात मचा दिया। कहीं सामान बिखरने लगा, कहीं अफरा-तफरी मच गई और दरबार के लोग परेशान हो उठे।

अकबर को समझ नहीं आया कि अचानक इतनी बड़ी संख्या में बंदर कहां से आ गए।

उन्होंने बीरबल से इसका कारण पूछा।

कथा के अनुसार बीरबल ने जवाब दिया—

“हुजूर, आप तुलसीदास जी से चमत्कार देखना चाहते थे। शायद अब आपको अपने सवाल का उत्तर मिल गया है।”

अकबर को तब तुलसीदास जी की शक्ति से ज्यादा उनकी भक्ति का एहसास हुआ।

कहानी के अनुसार उन्होंने तुरंत तुलसीदास जी को बंदीगृह से मुक्त करने का आदेश दिया।

उनकी बेड़ियां खोल दी गईं।

तुलसीदास जी ने बताया कि उन्होंने बंदीगृह में अपने दुख और संकट के समय श्रीराम तथा हनुमान जी का स्मरण किया और उसी भक्ति में हनुमान जी की स्तुति के रूप में ये चौपाइयां लिखीं।

कथा की मान्यता है कि यही रचना आगे चलकर हनुमान चालीसा के रूप में भक्तों के बीच प्रसिद्ध हुई।

अकबर ने तुलसीदास जी से क्षमा मांगी और उन्हें सम्मानपूर्वक विदा किया—ऐसा इस लोकप्रिय कथा में बताया जाता है।

इसके बाद हनुमान चालीसा भक्तों के बीच लगातार लोकप्रिय होती चली गई।

आज भी मंगलवार और शनिवार को लाखों लोग इसका पाठ करते हैं। कोई इसे संकट के समय पढ़ता है, कोई मानसिक शांति के लिए और कोई हनुमान जी के प्रति अपनी भक्ति प्रकट करने के लिए।

हनुमान चालीसा की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इसमें हनुमान जी को केवल शक्ति के प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि श्रीराम के परम भक्त, सेवक, ज्ञान और विनम्रता के आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

इसलिए भक्तों के बीच हनुमान जी को “संकटमोचन” कहा जाता है।

एक जरूरी ऐतिहासिक बात

इस कथा को सुनाते समय “यह एक प्रमाणित ऐतिहासिक सत्य है” कहना उचित नहीं होगा। अकबर-तुलसीदास की कैद और बंदरों द्वारा किले में उत्पात वाली घटना मुख्यतः लोकप्रिय धार्मिक परंपरा और कथा के रूप में प्रचलित है। वहीं तुलसीदास द्वारा हनुमान चालीसा की रचना की परंपरा व्यापक रूप से स्वीकार की जाती है। उपलब्ध धार्मिक स्रोत भी हनुमान चालीसा को तुलसीदास की रचना और 40 चौपाइयों वाली स्तुति के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

भक्ति की दृष्टि से इस कथा का संदेश बहुत सुंदर है—जब मनुष्य हर सांसारिक सहारे से दूर हो जाता है, तब भी सच्ची श्रद्धा और ईश्वर का स्मरण उसके भीतर शक्ति और विश्वास जगा सकता है।

जय श्रीराम।
जय बजरंगबली।
जय हनुमान।

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