राजस्थान के डूंगरपुर से जुड़ी यह कहानी इंसानियत और साहस की एक ऐसी तस्वीर सामने रखती है, जिसे पढ़कर शायद आपका दिल भी भर आए।
बताया जा रहा है कि एक कार अचानक अनियंत्रित होकर करीब 10 फीट गहरे तालाब में जा गिरी। कार में एक परिवार फंसा हुआ था और देखते ही देखते पानी गाड़ी के अंदर भरने लगा। किनारे पर लोग मौजूद थे, लेकिन गहरे पानी और तेजी से डूबती कार को देखकर कोई अंदर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।
इसी बीच पानी के अंदर से एक मासूम बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी।
यह आवाज वहां मौजूद 38 वर्षीय सुरता परमार के कानों तक पहुंची।
उस पल उन्होंने यह नहीं सोचा कि पानी कितना गहरा है, कार कितनी तेजी से डूब रही है या उनकी अपनी जान खतरे में पड़ सकती है। उनके सामने बस एक सवाल था—उस मासूम को बचाया कैसे जाए?
सुरता ने बिना देर किए तालाब में छलांग लगा दी।
तेज पानी के बीच वह डूबती कार तक पहुंचीं। बताया जाता है कि उन्होंने कार की खिड़की तोड़कर अंदर पहुंचने की कोशिश की और सबसे पहले 11 महीने के बच्चे को बाहर निकाला।
मासूम को अपनी बाहों में लेकर वह किसी तरह किनारे तक पहुंचीं और बच्चे को सुरक्षित लोगों के हवाले किया।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
बच्चे को सुरक्षित पहुंचाने के बाद सुरता दोबारा उसी तालाब में उतर गईं।
इस बार कार के अंदर फंसे उसके माता-पिता को बाहर निकालना था।
उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना फिर से पानी में जाकर परिवार के दोनों सदस्यों को बाहर निकालने की कोशिश की। एक-एक करके उन्हें कार से बाहर लाया गया।
जिस वक्त किनारे पर खड़े लोग सिर्फ उस भयावह हादसे को देख पा रहे थे, उस वक्त सुरता लगातार पानी के भीतर जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही थीं।
एक तरफ डूबती कार थी...
दूसरी तरफ एक मासूम की जिंदगी।
और सुरता ने अपनी जिंदगी की परवाह किए बिना उस बच्चे को प्राथमिकता दी।
बाद में जब उनके साहस की चर्चा हुई तो उनके नाम के साथ बहादुरी की मिसाल दी जाने लगी। लेकिन उनकी बातों में कोई घमंड नहीं था।
उनका भाव यही था कि किसी बच्चे को मुसीबत में देखकर कोई मां जैसी संवेदना रखने वाला इंसान कैसे पीछे हट सकता है।
यही इस घटना का सबसे भावुक पहलू है।
सुरता के लिए वह बच्चा कोई अपना नहीं था। न उससे कोई रिश्ता था, न कोई पहचान।
लेकिन संकट की उस घड़ी में उन्होंने रिश्ते नहीं देखे।
उन्होंने सिर्फ एक जिंदगी देखी।
आज जब किसी हादसे के वक्त कई लोग मदद करने से पहले वीडियो बनाने लगते हैं, ऐसी घटनाएं यह याद दिलाती हैं कि मुश्किल समय में इंसानियत का असली मतलब क्या होता है।
हालांकि पानी में डूबती कार को बचाने के लिए छलांग लगाना बेहद खतरनाक हो सकता है और हर व्यक्ति के लिए ऐसा करना सुरक्षित नहीं होता। ऐसी स्थिति में प्रशिक्षित बचाव दल और स्थानीय आपातकालीन सेवाओं की मदद लेना सबसे सुरक्षित तरीका है।
लेकिन अगर उपलब्ध विवरण सही हैं, तो सुरता परमार का साहस और उस मासूम के लिए दिखाई गई ममता निश्चित रूप से सम्मान के योग्य है।
कभी-कभी किसी की जिंदगी बचाने के लिए सिर्फ कुछ सेकंड का फैसला काफी होता है।
और उस दिन सुरता ने वही फैसला लिया।
इस जांबाज महिला के साहस को दिल से सलाम।
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