मेरे पड़ोस में एक बुजुर्ग दंपत्ति रहते थे। जब पति का निधन हो गया, तो वह महिला बिल्कुल अकेली रह गईं। उनकी तबीयत भी ठीक नहीं रहती थी, इसलिए जब तक उनके घरवाले नहीं आ जाते, मैंने एक वीकेंड उनके साथ ही बिताने का फैसला किया।
वह महिला रात को टीवी चलाकर सोने लगी थीं। मुझे लगा कि शायद उन्हें अंधेरे से डर लगता है या फिर यह उनकी आदत होगी।
फिर एक रात, लगभग दो बजे मेरी नींद खुली और मैं पानी पीने उठी। टीवी अब भी चल रहा था और शांत लिविंग रूम में उसकी हल्की नीली रोशनी फैली हुई थी।
वह बुजुर्ग महिला सोफे पर दुबककर सो रही थीं, मानो ठंड से खुद को समेटने की कोशिश कर रही हों।
मैं टीवी बंद करने के लिए धीरे से आगे बढ़ी।
तभी मैंने उन्हें नींद में अस्फुट आवाज़ में बड़बड़ाते सुना:
“इसे चलने दो… इससे घर थोड़ा भरा-भरा लगता है।”
मैं वहीं ठिठक गई।
उसी पल मुझे सब समझ आ गया।
उन्हें अंधेरे से डर नहीं लगता था… उन्हें तो सन्नाटे से डर लगता था।
उस घर का सन्नाटा, जहाँ कभी बच्चों की किलकारियाँ और हँसी गूँजा करती थी।
उस रसोई का सन्नाटा, जहाँ कभी पूरे परिवार के लिए प्यार से खाना बनता था।
दरवाज़े पर उन आहटों के इंतज़ार का सन्नाटा, जो अब अरसे से सुनाई नहीं देतीं।
पूरे दिन का वह भारी सन्नाटा, जिसमें यह पूछने वाला कोई नहीं होता—
“माँ, रात को नींद कैसी आई?”
जब उनके बच्चे अपनी दुनिया बनाने में मशगूल थे—काम, यात्राएँ, योजनाएँ और लगातार यह कहना कि “मैं बहुत व्यस्त हूँ”—तब उन्होंने टीवी पर अजनबियों की आवाज़ों के सहारे सोना सीख लिया था।
क्योंकि जिन आवाज़ों को सुनने के लिए उनके कान तरसते थे, वे उनके अपने बच्चों की आवाज़ें थीं।
उस रात मैं सो नहीं सकी।
मैं चुपचाप बैठकर उनके थके हुए, झुर्रियों भरे हाथों को देखती रही।
ये वही हाथ थे जिन्होंने डर के साए में अपने बच्चों की उँगलियों को थाम रखा था।
ये वही हाथ थे जिन्होंने उन्हें लोरी गाकर पुचकार कर सुलाया था।
ये वही हाथ थे जिन्होंने पूरी ज़िंदगी बिना किसी स्वार्थ के केवल देना और संभालना सीखा था।
और अचानक, एक कड़वी सच्चाई बहुत शिद्दत से महसूस हुई:
माता-पिता को हमारे पैसों से ज़्यादा हमारी मौजूदगी की ज़रूरत होती है।
उन्हें किसी लंबी मुलाक़ात का लालच नहीं होता।
कभी-कभी बस एक फोन कॉल काफी होता है।
साथ बैठकर चाय की एक चुस्की।
हाल-चाल पूछने के कुछ पल।
कोई ऐसा, जो बिना घड़ी पर नज़र टिकाए बस कुछ देर उनके पास बैठ सके।
उम्र के इस मोड़ पर पहुँचकर कई माता-पिता साथ माँगना छोड़ देते हैं…
इसलिए नहीं कि उन्हें इसकी ज़रूरत नहीं होती,
बल्कि इसलिए कि वे अपने ही बच्चों पर बोझ नहीं बनना चाहते।
और शायद यही इस दुनिया की सबसे दुखद बात है।
जिन लोगों ने कभी हमारे बचपन को अपनी हँसी, दुलार और गर्माहट से भरा था, वे उम्र के आखिरी पड़ाव पर टीवी के शोर में तसल्ली ढूँढने को मजबूर हो जाते हैं…
ताकि घर का सन्नाटा उन्हें काटने न दौड़े।
इसलिए अगर आपके माता-पिता अभी आपके साथ हैं, तो उनके बुलाने का इंतज़ार मत कीजिए।
उन्हें फोन कीजिए।
उनसे मिलने जाइए।
उनके पास बैठिए।
और प्यार से पूछिए कि वे कैसे हैं।
क्योंकि एक दिन, आपके पास सब कुछ होगा… बस उनकी वह थकी हुई आवाज़ सुनने को कान तरस जाएँगे, जो कभी कहा करती थी:
“अच्छा हुआ तुम आ गए... मैं कब से तुम्हारा ही इंतज़ार कर रही थी।”
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