हर गांव में एक ऐसा आदमी जरूर होता है जो खुद चाहे कोई खास काम न करे, लेकिन गांव में किसी के सामने कोई परेशानी आ जाए तो लोग सबसे पहले उसी के पास पहुंचते हैं। उसे रास्ता निकालने में महारत हासिल होती है।
ऐसे ही एक गांव में रहते थे संकट चौधरी।
चौधरी साहब खेती-बाड़ी या कोई खास काम नहीं करते थे, लेकिन गांव में किसी का भी संकट हो, लोग कहते—
“चलो संकट चौधरी के पास, कुछ न कुछ जुगाड़ जरूर बताएंगे।”
इसी वजह से गांव वालों ने उनका नाम ही रख दिया था—संकट चौधरी।
एक दिन एक पंडित जी उनके पास पहुंचे। उन्होंने कहा—
“चौधरी साहब, मुझे तीर्थ यात्रा पर जाना है। गांव वाले कुछ पैसे दे देंगे, लेकिन आप अपनी घोड़ी दे दीजिए और मुझे रास्ते की भी थोड़ी सलाह दे दीजिए।”
संकट चौधरी ने कहा—
“घोड़ी ले जाओ। रास्ता भी बिल्कुल साफ है। बस एक गांव रास्ते में पड़ेगा, वहां के लोगों से जरा संभलकर रहना। वे बड़े मीठे बोलेंगे, खूब सेवा करेंगे और मौका मिलते ही तुम्हारा माल साफ कर देंगे।”
पंडित जी बोले—
“आप चिंता मत करो चौधरी साहब, मैं सावधान रहूंगा।”
पंडित जी गांव वालों से मिले पैसे लेकर चौधरी की घोड़ी पर सवार होकर निकल पड़े।
कई गांव पार करने के बाद शाम हो गई। थके हुए पंडित जी उसी गांव में पहुंचे जिसके बारे में संकट चौधरी ने चेतावनी दी थी।
जैसे ही उन्होंने गांव में प्रवेश किया, कुछ लोग दौड़कर आए और घोड़ी की लगाम पकड़ ली।
“अरे पंडित जी! तीर्थ यात्रा पर हमारे गांव से होकर जा रहे हैं और हमें सेवा का मौका दिए बिना निकल जाएंगे? ऐसा कैसे हो सकता है?”
पंडित जी को लगा कि चौधरी ने बेवजह शक किया था। गांव वालों ने उनकी खूब खातिरदारी की। स्वादिष्ट खीर-चूरमा खिलाया, खूब बातें कीं और रात में आराम से सुला दिया।
लेकिन सुबह जब पंडित जी उठे तो कहानी बदल चुकी थी।
तकिए के नीचे रखे पैसे गायब थे।
और जिस जगह उन्होंने घोड़ी बांधी थी, वहां घोड़ी भी गायब थी।
पंडित जी ने गांव वालों से पूछा—
“मेरी घोड़ी कहां गई?”
गांव वाले मासूम बनकर बोले—
“घोड़ी? कौन-सी घोड़ी? पंडित जी, हमने तो आपके पास कोई घोड़ी देखी ही नहीं।”
पंडित जी बोले—
“अरे रात को यहीं बांधी थी!”
“पंडित जी, आप हमें बदनाम मत कीजिए। हमारे गांव में तो आज तक किसी घोड़ी की चोरी नहीं हुई।”
पंडित जी ने बहुत समझाया, विनती की, यहां तक कहा कि घोड़ी रख लो, कम से कम मेरे पैसे ही वापस कर दो।
लेकिन किसी ने उनकी एक न सुनी।
आखिरकार पंडित जी खाली हाथ अपने गांव लौट आए।
संकट चौधरी ने उन्हें देखते ही पूछा—
“क्यों पंडित जी, कर आए तीर्थ?”
पंडित जी ने मायूस होकर कहा—
“कहां चौधरी साहब! वही हुआ जिसकी आपने चेतावनी दी थी।”
संकट चौधरी मुस्कुराए।
“कोई बात नहीं। अब तुम कुछ दिन आराम करो। तीर्थ यात्रा तुम जरूर करोगे।”
कुछ दिन बाद संकट चौधरी खुद एक बेहद कमजोर और मरीयल घोड़ी पर सवार होकर उसी गांव की तरफ निकल पड़े।
गांव में पहुंचते ही उन्होंने घोड़ी पर उल्टी दिशा में बैठना शुरू कर दिया और लगाम घोड़ी की पूंछ से बांध ली।
गांव वालों ने दूर से देखा तो बोले—
“अरे वाह! यह तो पंडित से भी बड़ा मूर्ख लग रहा है। इसे ठगना तो बहुत आसान होगा।”
उन्होंने संकट चौधरी को भी उसी तरह खूब सम्मान दिया। बढ़िया खाना खिलाया, सेवा की और रात में आराम से सुला दिया।
रात में जब उन्होंने चौधरी के सामान की तलाशी ली तो कुछ खास मिला ही नहीं।
ऊपर से उसकी घोड़ी इतनी कमजोर थी कि कोई उसे चोरी करने के लायक भी नहीं समझ रहा था।
लेकिन उन्हें क्या पता था कि असली खेल तो शुरू होने वाला था।
संकट चौधरी सुबह सबसे पहले उठ गए। उन्होंने चुपचाप अपनी पगड़ी में छिपाकर रखी कुछ सोने की मुहरें निकालीं और उन्हें घोड़ी की लीद में मिला दिया।
सुबह गांव वाले उठे तो चौधरी ने आवाज लगाई—
“भाई, एक बड़ा तसला देना।”
गांव वालों ने तसला दे दिया।
चौधरी ने उसमें घोड़ी की लीद भर ली और मेजबान से कहा—
“भाई, आपने बड़ी सेवा की। भगवान आपको खूब बरकत दे। अब मैं चलता हूं।”
गांव वाले बोले—
“ठीक है चौधरी साहब, जाइए।”
चौधरी ने लीद से भरा तसला घोड़ी की पीठ पर रख लिया।
गांव वालों ने हैरानी से पूछा—
“लेकिन चौधरी साहब, इस लीद का क्या करेंगे?”
संकट चौधरी ने रहस्यमय अंदाज में कहा—
“अरे, यह कोई साधारण लीद नहीं है। भगवान की करामात है। चलो, कुएं पर दिखाता हूं।”
अब गांव वालों की उत्सुकता बढ़ गई।
वे चौधरी के पीछे-पीछे कुएं तक पहुंच गए।
चौधरी ने तसले की लीद पानी में धोनी शुरू की।
कुछ ही देर में लीद साफ हो गई और उसमें से चमकती हुई सोने की मुहरें दिखाई देने लगीं।
गांव वालों की आंखें फटी की फटी रह गईं।
चौधरी ने बड़ी शान से कहा—
“तुम लोग इस घोड़ी को देखकर इसे मरीयल समझते हो। अरे, यह तो रोज रात को सोने की मुहरें देती है। मैं इसे ऐसे ही थोड़े घुमाता हूं!”
बस फिर क्या था!
गांव वालों की आंखों में लालच उतर आया।
जिस घोड़ी को कुछ देर पहले कोई मुफ्त में भी नहीं लेना चाहता था, अब वही उन्हें सोने की खान नजर आने लगी।
गांव के बुजुर्गों ने आपस में सलाह की और आखिरकार संकट चौधरी से बोले—
“चौधरी साहब, यह घोड़ी हमें बेच दीजिए।”
चौधरी ने थोड़ा नखरा दिखाते हुए कहा—
“बेच तो दूंगा, लेकिन मेरे लिए भी तो कोई घोड़ी चाहिए। मुझे तीर्थ यात्रा पर जाना है।”
गांव वालों ने तुरंत कहा—
“पूरे गांव में से जो घोड़ी पसंद आए, ले जाइए।”
चौधरी ने गांव की सबसे अच्छी घोड़ी चुनी।
फिर बोले—
“और तीर्थ में दान-पुण्य भी करना है। इसलिए मुझे 2000 सोने की मुहरें भी चाहिए।”
गांव वालों को यह रकम बहुत ज्यादा लगी, लेकिन सोने की मुहरें देने वाली घोड़ी के लालच में उन्होंने गांव भर से पैसे इकट्ठे किए और चौधरी को 2000 मुहरें दे दीं।
संकट चौधरी घोड़ी लेकर अपने गांव लौट आए।
वहां पहुंचकर उन्होंने सबसे पहले पंडित जी को बुलाया और उस ठग गांव में लूटे गए उनके पैसे वापस कर दिए।
बाकी मुहरें उन्होंने अपने पास रख लीं।
इधर ठग गांव में लोगों को रात होने का बेसब्री से इंतजार था।
जैसे ही रात हुई, वे उस घोड़ी के पास तसले लेकर बैठ गए।
घोड़ी ने जैसे ही लीद की, वे उसे जमा करने लगे।
उनकी आंखों के सामने पहले से ही सोने की मुहरों के सपने घूम रहे थे।
सुबह होते ही उन्होंने लीद धोनी शुरू की।
लेकिन पानी में लीद घुलती गई…
और उसके अंदर से एक भी सोने की मुहर नहीं निकली।
गांव वालों ने बार-बार लीद धोई।
लेकिन नतीजा वही रहा—सिर्फ लीद!
तभी उन्हें समझ आया कि पिछली रात जो सोना निकला था, वह घोड़ी की करामात नहीं थी।
वह तो संकट चौधरी की चाल थी।
जिस लालच में उन्होंने 2000 मुहरें और गांव की सबसे अच्छी घोड़ी दे दी थी, उसी लालच ने उन्हें बुरी तरह फंसा दिया।
गांव के एक बुजुर्ग ने सिर पकड़कर कहा—
“अरे! संकट चौधरी ने तो हमारा ही संकट काट दिया!”
और इस तरह जिस गांव ने एक भोले पंडित को ठगकर खुद को बहुत चालाक समझ लिया था, उसी गांव को एक ऐसे आदमी ने मात दे दी जिसने उसकी कमजोरी पहचान ली थी।
कहानी की सीख:
दूसरों को मूर्ख समझकर लालच करना अक्सर इंसान को खुद ही मूर्ख बना देता है। बुद्धि सिर्फ चाल चलने में नहीं, बल्कि सामने वाले की नीयत और कमजोरी समझने में होती है।
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