शहर की भीड़भाड़ वाली सड़क के किनारे एक बुजुर्ग अम्मा चुपचाप बैठी थीं। उनके सामने कुछ छोटे-छोटे सामान रखे थे। वह आने-जाने वाले लोगों को देखतीं और कभी-कभी धीमी आवाज में कहतीं—
“बेटा, कान साफ करने वाला है... सिर्फ 20 रुपये का।”
लेकिन लोग अपनी-अपनी जल्दी में आगे बढ़ते जा रहे थे।
सड़क पर भीड़ बहुत थी, मगर अम्मा के पास रुकने वाला कोई नहीं था। ऐसा लग रहा था जैसे सैकड़ों लोगों के बीच बैठी वह बुजुर्ग महिला अपनी छोटी सी दुनिया में बिल्कुल अकेली हो गई हों।
काफी देर से एक युवक दूर खड़ा होकर यह सब देख रहा था।
उसने गौर किया कि अम्मा लगातार लोगों से सामान खरीदने की गुजारिश कर रही हैं, लेकिन कोई उनकी ओर ध्यान नहीं दे रहा।
आखिरकार युवक उनके पास गया और पूछा—
“अम्मा, क्या बेच रही हो?”
अम्मा ने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा—
“बेटा, कान साफ करने वाला है... सिर्फ 20 रुपये का।”
युवक कुछ देर तक अम्मा को देखता रहा। फिर उसने धीरे से कहा—
“अम्मा, मैं काफी देर से आपको देख रहा हूं... आपसे कोई कुछ खरीद नहीं रहा।”
अम्मा कुछ नहीं बोलीं।
युवक ने फिर पूछा—
“अम्मा, आपकी उम्र कितनी है?”
अम्मा ने हल्की सी मुस्कान दी और बोलीं—
“पता नहीं बेटा... अब याद नहीं।”
युवक को यह जवाब सुनकर कुछ अजीब लगा।
उसने फिर पूछा—
“आपके बच्चे कहां हैं?”
अम्मा ने बताया कि उनके बच्चे कोलकाता में रहते हैं।
युवक कुछ पल चुप रहा। फिर उसने हिम्मत करके पूछा—
“तो क्या वो आपका ख्याल नहीं रखते?”
इस सवाल पर अम्मा की आंखें झुक गईं।
कुछ क्षण तक वह बिल्कुल खामोश रहीं।
फिर धीमी आवाज में बोलीं—
“उन्होंने मुझे छोड़ दिया है बेटा...”
यह सुनते ही युवक भी कुछ नहीं बोल पाया।
उसके सामने अब सिर्फ एक बुजुर्ग महिला नहीं थीं, बल्कि एक ऐसी मां बैठी थी जो भीड़ के बीच अपना सामान बेच रही थी और शायद अपने बच्चों का इंतजार भी कर रही थी।
युवक ने कुछ सेकंड बाद अपनी जेब में हाथ डाला।
उसने अम्मा को सिर्फ 20 रुपये देने के बजाय जेब में मौजूद जितने पैसे थे, सब उनके हाथ में रख दिए।
लेकिन उसकी मदद यहीं खत्म नहीं हुई।
वह वहीं खड़ा हो गया और आने-जाने वाले लोगों से कहने लगा—
“अम्मा से खरीद लो... ये सिर्फ सामान नहीं, दुआ बेच रही हैं।”
उस युवक की बात सुनकर कुछ लोग रुक गए।
किसी ने सामान खरीदा, फिर दूसरे ने खरीदा और धीरे-धीरे लोगों का ध्यान अम्मा की ओर जाने लगा।
कुछ ही देर में वहां ऐसा माहौल बन गया कि जो लोग पहले बिना देखे निकल जा रहे थे, वही अब अम्मा के पास रुककर सामान खरीदने लगे।
देखते ही देखते अम्मा का सारा सामान बिक गया।
अम्मा लगातार लोगों को देख रही थीं।
उनकी आंखों में आंसू थे।
लेकिन इस बार शायद उन आंसुओं में अकेलेपन और मजबूरी का दर्द कम और किसी अनजान इंसान के अपनेपन की खुशी ज्यादा थी।
जिस युवक ने उनकी मदद की थी, वह उनके लिए शायद अजनबी था, लेकिन उस वक्त उसने जो किया, वह किसी अपने से कम नहीं था।
कहानी हमें यही याद दिलाती है कि इंसानियत हमेशा खत्म नहीं होती। कई बार लोग बस किसी ऐसे व्यक्ति का इंतजार कर रहे होते हैं जो उनकी परेशानी को देखे, समझे और दूसरों को भी देखने के लिए प्रेरित करे।
कभी-कभी किसी की पूरी जिंदगी बदलने के लिए बड़ी रकम नहीं, बस थोड़ी सी संवेदना और मदद के लिए बढ़ा हुआ एक हाथ ही काफी होता है।
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