शादी को चार साल हो चुके थे।
रवि और पूजा की जिंदगी बाहर से बिल्कुल सामान्य दिखाई देती थी। दोनों की एक छोटी-सी बेटी थी और घर में किसी चीज की कमी नहीं थी।
लेकिन पिछले कुछ महीनों से पूजा को अपने पति के व्यवहार में बदलाव महसूस हो रहा था।
रवि पहले ऑफिस से सीधे घर आता था।
अब वह अक्सर देर से लौटने लगा था।
फोन पहले से ज्यादा देखने लगा था।
और सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात थी—
हर शुक्रवार शाम वह किसी न किसी बहाने घर से बाहर चला जाता।
एक दिन पूजा ने अचानक उसके मोबाइल की स्क्रीन पर एक नाम देखा।
"नेहा"
बस इतना ही।
कोई फोटो नहीं।
कोई पहचान नहीं।
लेकिन उसी रात पूजा ने देखा कि रवि ने वह नंबर तुरंत मिटा दिया।
उसके मन में पहला शक पैदा हुआ।
शुक्रवार की शाम आया बड़ा मोड़
अगले शुक्रवार रवि ने कहा—
"आज ऑफिस का जरूरी काम है। शायद देर हो जाएगी।"
पूजा ने कुछ नहीं कहा।
लेकिन इस बार उसने तय कर लिया कि वह रवि का पीछा करेगी।
करीब 7 बजे रवि घर से निकला।
पूजा कुछ दूरी बनाकर उसके पीछे चल पड़ी।
रवि शहर के पुराने हिस्से में पहुंचा।
फिर एक छोटी-सी चाय की दुकान के पास रुका।
कुछ देर बाद एक महिला वहां आई।
पूजा दूर खड़ी होकर दोनों को देखने लगी।
महिला ने रवि को देखते ही कहा—
"तुम्हें इतनी देर क्यों लगी?"
पूजा का दिल बैठ गया।
उसे यकीन हो गया कि उसका शक सही था।
लेकिन फिर कुछ अजीब हुआ
रवि ने महिला को एक लिफाफा दिया।
महिला ने उसे खोलकर देखा और रोने लगी।
रवि ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
फिर दोनों कुछ देर तक बात करते रहे।
पूजा ने दूर से कुछ तस्वीरें ले लीं।
उसने तय कर लिया कि घर लौटकर रवि से सीधे सवाल करेगी।
लेकिन तभी महिला ने अपना चेहरा ऊपर किया।
पूजा उसे देखकर अचानक रुक गई।
वह महिला...
रवि की प्रेमिका नहीं थी।
वह उसकी अपनी पहचान की थी।
वह महिला कौन थी?
महिला का नाम नेहा था।
और नेहा, रवि की छोटी बहन की बचपन की सहेली थी।
पूजा ने उसे कुछ साल पहले एक पारिवारिक समारोह में देखा था।
लेकिन वह रवि से अकेले क्यों मिल रही थी?
और लिफाफे में क्या था?
इस सवाल का जवाब अगले दिन मिला।
रवि ने आखिरकार पूरा सच बताया
रवि ने पूजा को बैठाया और कहा—
"मैं तुमसे यह बात इसलिए छिपा रहा था क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि तुम्हें परेशानी हो।"
नेहा के पति की कई साल पहले एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी।
उसके बाद उसके छोटे बेटे की पढ़ाई और इलाज की जिम्मेदारी लगभग पूरी तरह नेहा पर आ गई।
लेकिन कुछ महीने पहले उसे पता चला कि उसके पति के नाम पर एक पुराना बीमा दावा अटका हुआ है।
रवि उस मामले की कागजी प्रक्रिया में उसकी मदद कर रहा था।
हर शुक्रवार वह नेहा से इसलिए मिलता था ताकि जरूरी दस्तावेज पूरे कर सके।
लेकिन रवि ने पत्नी को क्यों नहीं बताया?
पूजा ने नाराज होकर पूछा—
"तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?"
रवि ने कहा—
"क्योंकि नेहा के परिवार में पहले ही बहुत बातें बन चुकी थीं। मैं नहीं चाहता था कि तुम्हारा नाम भी किसी विवाद में आए।"
पूजा ने कहा—
"लेकिन तुम्हारे छिपाने से तो शक और बढ़ गया।"
रवि के पास इसका कोई जवाब नहीं था।
लिफाफे में था असली कारण
पूजा ने पूछा—
"उस लिफाफे में क्या था?"
रवि ने बताया कि उसमें बीमा कंपनी के जरूरी दस्तावेज और अदालत से जुड़े कागज थे।
लेकिन एक और कागज था।
नेहा के बेटे के इलाज का खर्च।
रवि पिछले कई महीनों से अपनी बचत से उसकी मदद कर रहा था।
पूजा कुछ देर तक चुप रही।
जिस बात को वह बेवफाई समझ रही थी...
वह दरअसल किसी जरूरतमंद की मदद थी।
लेकिन कहानी में एक और मोड़ था
पूजा ने रवि से कहा—
"अगर तुम इतना अच्छा काम कर रहे थे तो मुझे बताने में डर क्यों लगा?"
रवि ने धीरे से कहा—
"क्योंकि मुझे डर था कि कहीं तुम मुझे गलत न समझो।"
पूजा ने जवाब दिया—
"मुझे सच से नहीं, झूठ से समस्या है।"
उसी समय रवि के फोन पर एक संदेश आया।
नेहा का था।
उसमें लिखा था—
"बीमा का पैसा मंजूर हो गया। अब मुझे आपकी मदद की जरूरत नहीं पड़ेगी। आपका बहुत धन्यवाद।"
पूजा ने संदेश पढ़ा।
अब उसे पूरा सच समझ आ गया।
कुछ दिनों बाद
नेहा खुद पूजा से मिलने आई।
उसने कहा—
"मुझे पता था कि भाभी को कभी न कभी गलतफहमी होगी। लेकिन मैं रवि को इसलिए नहीं रोक पाई क्योंकि उन्होंने मेरे बेटे की मदद की थी।"
पूजा ने उसका हाथ पकड़कर कहा—
"आपको किसी से सफाई देने की जरूरत नहीं है। बस अब से कुछ भी छिपाना मत।"
नेहा की आंखों में आंसू आ गए।
चार साल बाद भी वह शुक्रवार याद था
उस दिन के बाद रवि ने पूजा से कोई बात छिपाने की कोशिश नहीं की।
और पूजा ने भी एक बात सीख ली—
हर छिपी हुई मुलाकात बेवफाई नहीं होती।
कभी-कभी अधूरी जानकारी हमारे मन में ऐसी कहानी बना देती है, जिसका सच बिल्कुल अलग होता है।
जिस रात पूजा अपने पति का पीछा कर रही थी, उसे लगा था कि वह अपने टूटते रिश्ते का सबूत ढूंढ रही है।
लेकिन उसे वहां अपने पति का कोई दूसरा रिश्ता नहीं मिला।
उसे अपने पति का एक ऐसा चेहरा दिखाई दिया, जिसे वह शादी के चार साल बाद भी पूरी तरह नहीं जानती थी।
कभी-कभी रिश्ते को बचाने के लिए सबूत नहीं, सच की जरूरत होती है।
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