ऑर्केस्ट्रा के मंच पर कलाकार या तमाशे का सामान?
उत्तर प्रदेश के किसी गांव में आयोजित एक ऑर्केस्ट्रा कार्यक्रम का बताया जा रहा एक मामला लोगों को यह सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर मंच पर मनोरंजन करने वाले कलाकारों की सुरक्षा और सम्मान की जिम्मेदारी किसकी है।
बताया जाता है कि एक लड़की छोटे से मंच पर डांस कर रही थी। कार्यक्रम के दौरान अचानक एक युवक मंच पर चढ़ गया और उसने कथित तौर पर लड़की के हाथ और कमर को पकड़ लिया।
लड़की ने इसका विरोध किया और नाचने से साफ इनकार कर दिया।
लेकिन आरोप है कि युवक ने उसे धमकाते हुए कहा कि उसका चाचा नेता है और अगर उसने नाचने से मना किया तो गोली तक चलवा दी जाएगी।
मामला यहीं खत्म नहीं हुआ।
बताया जाता है कि मौके पर मौजूद कुछ लोगों ने युवक की हरकत रोकने के बजाय शोर-शराबा करके उसका उत्साह बढ़ाया। इसके बाद लड़की पर अश्लील गानों पर डांस करने का दबाव बनाया गया।
अगर यह घटनाक्रम वास्तव में इसी तरह हुआ है, तो यह सिर्फ एक कलाकार के साथ बदसलूकी का मामला नहीं है, बल्कि भीड़ की मानसिकता पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
मंच पर कलाकार की अपनी मर्जी कहां रह जाती है?
ऑर्केस्ट्रा कार्यक्रमों में महिला कलाकारों के डांस को अक्सर मनोरंजन का हिस्सा माना जाता है। लेकिन किसी कलाकार का मंच पर होना यह अधिकार नहीं देता कि कोई भी व्यक्ति उसके शरीर को छुए, उसे जबरन पकड़ ले या उसकी इच्छा के खिलाफ उसे डांस करने के लिए मजबूर करे।
कलाकार चाहे फिल्म में काम करता हो, स्टेज पर डांस करता हो या किसी स्थानीय कार्यक्रम में प्रस्तुति देता हो—उसकी सहमति और सम्मान सबसे महत्वपूर्ण हैं।
कुछ महिला कलाकारों का कहना है कि उन्हें मंच पर प्रस्तुति देने में परेशानी नहीं है। उनकी शिकायत उस माहौल से है, जहां दर्शकों में मौजूद कुछ लोग कलाकार और दर्शक के बीच की सीमा भूल जाते हैं।
उनका कहना है कि वे भी कलाकार हैं और अपने हुनर से पैसा कमाती हैं। लेकिन कई बार मंच पर उनकी सुरक्षा और सम्मान को लेकर उन्हें असुरक्षा महसूस होती है।
उत्तर प्रदेश और बिहार में ऑर्केस्ट्रा कार्यक्रमों का चलन
उत्तर प्रदेश और बिहार के ग्रामीण इलाकों में स्थानीय आयोजनों और समारोहों में ऑर्केस्ट्रा कार्यक्रम देखे जाते हैं। इन कार्यक्रमों में डांस और संगीत प्रस्तुत करने वाले कलाकार दर्शकों का मनोरंजन करते हैं।
लेकिन हर कार्यक्रम का माहौल एक जैसा नहीं होता और किसी एक घटना के आधार पर सभी ऑर्केस्ट्रा या सभी दर्शकों को एक जैसा बताना उचित नहीं होगा।
फिर भी, जहां भी कलाकारों के साथ बदसलूकी, जबरदस्ती या धमकी की स्थिति बनती है, वहां आयोजकों और स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
फिर सोशल मीडिया की ओर क्यों जा रही हैं कुछ कलाकार?
इसी पूरी बहस का एक दूसरा पहलू सोशल मीडिया भी है।
कुछ महिला डांसर अब इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर अपने डांस वीडियो बनाकर पोस्ट कर रही हैं। उनका कहना है कि सोशल मीडिया पर उन्हें अपने कंटेंट पर ज्यादा नियंत्रण मिलता है।
वह तय कर सकती हैं कि क्या शूट करना है, किस तरह का डांस करना है और वीडियो किस तरह प्रस्तुत करना है।
इसके मुकाबले लाइव ऑर्केस्ट्रा में दर्शकों के बीच से कोई व्यक्ति अचानक मंच पर पहुंच जाए या कलाकार के बहुत करीब आने की कोशिश करे, तो स्थिति को नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है।
इसी वजह से कुछ कलाकारों को लगता है कि रील की दुनिया में उन्हें अपने काम पर ज्यादा नियंत्रण और सुरक्षा का एहसास होता है।
इसके अलावा सोशल मीडिया पर लगातार व्यूज और फॉलोअर्स बढ़ने के बाद कमाई के दूसरे रास्ते भी खुल सकते हैं।
सवाल डांस का नहीं, सम्मान का है
यह बहस इस बात पर नहीं होनी चाहिए कि कोई लड़की डांस क्यों कर रही है या उसे मंच पर जाना चाहिए या नहीं।
असल सवाल यह है कि क्या किसी कलाकार को उसकी इच्छा के खिलाफ छूना, धमकाना या जबरदस्ती डांस करवाना सही है?
इसका जवाब साफ है—नहीं।
किसी कलाकार का पहनावा, उसका पेशा या उसका डांस किसी दूसरे व्यक्ति को उसके साथ बदसलूकी करने का अधिकार नहीं देता।
मंच पर तालियां बजाना दर्शकों का अधिकार हो सकता है, लेकिन कलाकार की गरिमा और व्यक्तिगत सीमा का सम्मान करना भी उतना ही जरूरी है।
कलाकार मनोरंजन करने के लिए मंच पर आता है, अपनी इज्जत गंवाने के लिए नहीं।
और अगर किसी कार्यक्रम में कलाकार खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करता, तो सवाल सिर्फ उस कलाकार से नहीं बल्कि आयोजक, भीड़ और प्रशासन—तीनों से पूछा जाना चाहिए।
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