रात के 12 बजकर 47 मिनट हुए थे।
घर के सभी लोग सो चुके थे।
अचानक बेड के पास रखे अमित के मोबाइल पर एक मैसेज आया।
"अगर सच जानना है... तो सुबह 5 बजे पुराने शिव मंदिर के पीछे अकेले आना। किसी को मत बताना।"
नीचे सिर्फ एक शब्द लिखा था—
"शुभचिंतक"
अमित ने कई बार नंबर देखने की कोशिश की, लेकिन नंबर छिपा हुआ था।
उसने सोचा शायद किसी की शरारत होगी।
मोबाइल साइलेंट करके वह सो गया।
लेकिन उसकी पत्नी नेहा ने आधी खुली आँखों से वह मैसेज देख लिया था।
पूरी रात नेहा की आँखों में नींद नहीं आई।
सुबह चार बजे उसने देखा कि अमित बिना कुछ बताए चुपचाप घर से निकल गया।
उसके मन में सवालों का तूफान उठ चुका था।
आखिर ऐसी कौन-सी बात थी जो वह उससे छिपा रहा था?
नेहा ने चुपचाप उसका पीछा करने का फैसला किया।
मंदिर के पीछे जो हुआ...
सुबह की हल्की धुंध थी।
पुराने शिव मंदिर के पीछे अमित अकेला खड़ा था।
कुछ ही देर में सफेद दुपट्टे से चेहरा ढके एक बुजुर्ग महिला वहाँ पहुँची।
उन्होंने अमित को एक पुराना लिफाफा पकड़ाते हुए कहा—
"अब समय आ गया है कि तुम्हें सब सच पता चल जाए।"
इतना कहकर वह बिना पीछे देखे चली गईं।
अमित ने काँपते हाथों से लिफाफा खोला।
अंदर एक पुरानी तस्वीर थी।
तस्वीर में उसके पिता, एक छोटी बच्ची और वही बुजुर्ग महिला खड़ी थीं।
पीछे लिखा था—
"सच हमेशा लौटकर आता है।"
नेहा ने जो देखा...
नेहा दूर खड़ी यह सब देख रही थी।
उसे लगा शायद अमित का किसी महिला से पुराना रिश्ता है।
वह बिना कुछ बोले घर लौट आई।
अमित भी थोड़ी देर बाद वापस आ गया।
लेकिन पूरे दिन वह चुप रहा।
रात के खाने पर भी उसने एक शब्द नहीं बोला।
सास ने पूछा—
"सब ठीक है बेटा?"
अमित ने सिर्फ इतना कहा—
"शायद हमारी पूरी जिंदगी एक झूठ पर बनी हुई है।"
पूरा घर सन्न रह गया।
अलमारी का बंद लॉकर
रात को अमित ने अपने दिवंगत पिता की पुरानी अलमारी खोली।
सालों से बंद पड़े लॉकर की चाबी उसी लिफाफे में थी।
लॉकर खुलते ही अंदर एक डायरी मिली।
पहले पन्ने पर लिखा था—
"अगर यह डायरी तुम्हारे हाथ में है, तो समझ लेना कि मैं अब इस दुनिया में नहीं हूँ। अब तुम्हें सब सच जान लेना चाहिए।"
डायरी पढ़ते-पढ़ते अमित की आँखों से आँसू बहने लगे।
नेहा भी उसके पास बैठ गई।
28 साल पुराना सच
डायरी में लिखा था कि लगभग तीस साल पहले भारी बाढ़ आई थी।
उस अफरा-तफरी में एक नवजात बच्चा अपने माता-पिता से बिछड़ गया था।
उस बच्चे को अमित के पिता ने बचाया और उसे अपना बेटा बनाकर पाल लिया।
वह बच्चा...
अमित ही था।
जिसे वह अपने माता-पिता समझता था, उन्होंने उसे जन्म नहीं दिया था, बल्कि नई जिंदगी दी थी।
डायरी के आखिर में लिखा था—
"अगर कभी तुम्हारे असली परिवार का कोई व्यक्ति मिले, तो उनसे नफरत मत करना। हालात ने उन्हें तुमसे दूर किया था।"
सबसे बड़ा फैसला
कुछ दिनों बाद वही बुजुर्ग महिला फिर आईं।
उन्होंने बताया कि वह अमित की मौसी थीं।
उन्होंने वर्षों तक उसे ढूँढा था।
लेकिन जब उन्हें पता चला कि अमित एक अच्छे परिवार में खुश है, तो उन्होंने उसकी जिंदगी में दखल नहीं दिया।
अब उनकी उम्र हो चुकी थी।
इसलिए मरने से पहले सच बताना चाहती थीं।
अमित ने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा।
फिर वह अपने माता-पिता की तस्वीर के सामने गया।
हाथ जोड़कर बोला—
"मुझे जन्म देने वालों ने जिंदगी दी होगी...
लेकिन मुझे इंसान बनाने वाले आप थे।
मेरे लिए मेरे माता-पिता हमेशा आप ही रहेंगे।"
यह सुनकर पूरे घर की आँखें नम हो गईं।
नेहा ने अमित का हाथ पकड़ लिया।
उसे समझ आ चुका था कि आधी रात वाला वह रहस्यमयी मैसेज किसी धोखे का नहीं...
एक अधूरी कहानी को पूरा करने का जरिया था।
उस दिन के बाद अमित हर साल अपने माता-पिता और अपनी मौसी—दोनों से मिलने जरूर जाता था।
क्योंकि अब उसे समझ आ गया था...
रिश्ते सिर्फ खून से नहीं, निभाने से बनते हैं।
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