रात के अंधेरे में बहू के कमरे से आती थी अजीब आवाजें, सास ने दरवाजा खोला और अलमारी में जो देखा उसके बाद तुरंत पुलिस को बुलाना पड़ा

 


सास को बहू पर काफी समय से शक था। उसे लगता था कि पति के घर से बाहर जाते ही बहू किसी से फोन पर बात करती है और घर में कुछ ऐसा चल रहा है जिसकी जानकारी परिवार के बाकी लोगों को नहीं है। काल्पनिक शहर शिवगढ़ में रहने वाली सरोज ने कई बार बहू नंदिनी को देर रात फोन पर बात करते देखा था, लेकिन हर बार नंदिनी किसी सहेली या रिश्तेदार से बात करने की बात कहकर मामला टाल देती थी। सरोज ने शुरुआत में इस बात को नजरअंदाज किया, लेकिन एक रात उसे नंदिनी के कमरे से कुछ गिरने की आवाज सुनाई दी।

सरोज कमरे के पास पहुंची तो दरवाजा अंदर से बंद था। उसने आवाज लगाई, लेकिन नंदिनी ने तुरंत दरवाजा नहीं खोला। कुछ मिनट बाद दरवाजा खुला तो नंदिनी के हाथ में एक छोटा सा बैग था। सरोज ने पूछा कि बैग में क्या है, लेकिन नंदिनी ने कोई जवाब नहीं दिया और बैग को अलमारी में रख दिया। सरोज का शक और गहरा गया।

अगली सुबह नंदिनी के घर से बाहर निकलने के बाद सरोज ने अलमारी खोलने की कोशिश की। वहां उसे एक पुराना लिफाफा दिखाई दिया। लिफाफे के अंदर कुछ कागज और एक पुरानी तस्वीर थी। तस्वीर में सरोज के दिवंगत पति के साथ एक अनजान व्यक्ति खड़ा था। तस्वीर के पीछे सिर्फ एक तारीख लिखी थी और नीचे दो शब्द थे—"पुराना हिसाब।"

सरोज ने उस तस्वीर को पहचानने की कोशिश की, लेकिन उसे याद नहीं आया कि वह व्यक्ति कौन था। उसी शाम नंदिनी घर लौटी तो सरोज ने सीधे उससे पूछ लिया कि वह आदमी कौन है। नंदिनी का चेहरा बदल गया। उसने कहा कि उसे भी उसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है।

सरोज ने पूछा, "फिर यह तस्वीर तुम्हारे पास कैसे आई?"

नंदिनी कुछ देर चुप रही और फिर बोली कि उसे यह तस्वीर कुछ महीने पहले पुराने सामान की सफाई के दौरान मिली थी। इसके बाद उसने उस व्यक्ति के बारे में पता लगाने की कोशिश की थी। सरोज ने उससे पूछा कि अगर ऐसा था तो उसने परिवार को पहले क्यों नहीं बताया।

नंदिनी ने कहा कि उसे डर था कि मामला पुराना होने के कारण बिना सबूत किसी पर आरोप लगाना ठीक नहीं होगा।

सरोज को उसकी बात पर पूरी तरह भरोसा नहीं हुआ। अगले कुछ दिनों तक उसने नंदिनी पर नजर रखी। एक शाम नंदिनी घर से निकली और शहर के पुराने हिस्से में स्थित एक बंद पड़ी दुकान के पास पहुंची। वहां एक आदमी पहले से उसका इंतजार कर रहा था। सरोज भी कुछ दूरी से उसका पीछा करते हुए वहां पहुंच गई।

नंदिनी ने उस आदमी को वही पुरानी तस्वीर दिखाई। आदमी ने तस्वीर देखते ही कहा, "अब इतने साल बाद इसे बाहर निकालने की क्या जरूरत पड़ गई?"

सरोज यह सुनकर सामने आ गई। दोनों अचानक घबरा गए। सरोज ने पूछा, "तुम कौन हो और मेरे पति की तस्वीर तुम्हारे पास कैसे आई?"

आदमी ने अपना नाम दिलीप बताया। उसने कहा कि वह कई साल पहले सरोज के पति के साथ कारोबार करता था। कारोबार बंद होने से पहले दोनों के बीच पैसों को लेकर विवाद हुआ था। दिलीप का दावा था कि सरोज के पति ने कुछ जरूरी दस्तावेज अपने पास रख लिए थे, जबकि सरोज के पति के परिवार का मानना था कि कारोबार में किसी और ने गड़बड़ी की थी।

नंदिनी ने बताया कि उसे कुछ समय पहले अपने पति विवेक के पुराने कागजों में एक बैंक रिकॉर्ड मिला था। उस रिकॉर्ड में ऐसे लेनदेन थे जिनका कोई स्पष्ट हिसाब परिवार के पास नहीं था। उसने दिलीप से इसलिए संपर्क किया क्योंकि उसका नाम उन्हीं पुराने कागजों में दिखाई दिया था।

सरोज ने पूछा कि फिर नंदिनी ने यह बात अपने पति से क्यों छिपाई। नंदिनी ने कहा कि उसे डर था कि विवेक बिना पूरी जानकारी के अपने पिता के पुराने कारोबारी विवाद में किसी पर आरोप लगा देगा। वह पहले यह पता करना चाहती थी कि असली दस्तावेज कहां हैं।

दिलीप ने तभी एक और कागज निकाला। उस पर सरोज के पति के हस्ताक्षर थे। कागज में एक पुराने बैंक खाते का जिक्र था और साथ में लिखा था कि अगर कभी यह दस्तावेज परिवार के हाथ लगे तो पुराने गोदाम के रिकॉर्ड जरूर जांचे जाएं।

सरोज को अपने पति का पुराना गोदाम याद आया, जो पिछले कई वर्षों से बंद पड़ा था।

अगले दिन नंदिनी, सरोज और दिलीप पुलिस की मौजूदगी में उस पुराने गोदाम पहुंचे। वहां एक लकड़ी की अलमारी के पीछे कुछ पुराने दस्तावेज मिले। दस्तावेजों में कारोबार से जुड़ी रकम के कई लेनदेन दर्ज थे। कुछ भुगतान ऐसे खातों में किए गए थे जिनका संबंध परिवार के किसी सदस्य से नहीं था।

पुलिस ने पुराने बैंक रिकॉर्ड और दस्तावेज अपने कब्जे में ले लिए। जांच के दौरान पता चला कि वर्षों पहले कारोबार में बड़ी रकम का हिसाब गायब हुआ था। कई लोगों से पूछताछ की गई और पुराने दस्तावेजों की जांच शुरू हुई।

लेकिन कहानी में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब पुलिस को पता चला कि नंदिनी जिस पुराने रिकॉर्ड को खोज रही थी, उसमें उसके अपने पति विवेक का नाम भी दर्ज था। विवेक ने पूछताछ में बताया कि उसके पिता ने कारोबार खत्म होने से पहले उसके नाम पर कुछ खाते खुलवाए थे, लेकिन उसे उनके इस्तेमाल की पूरी जानकारी नहीं थी।

जांच में उसके बयान की भी पड़ताल की गई। कुछ दस्तावेजों पर हस्ताक्षर मेल नहीं खाते थे, जिससे यह संभावना सामने आई कि किसी ने वर्षों पहले दूसरे लोगों के नाम और दस्तावेजों का इस्तेमाल किया था।

सरोज को तब समझ आया कि जिस बात को वह अपनी बहू का कोई छिपा हुआ रिश्ता समझ रही थी, वह असल में परिवार के पुराने कारोबारी विवाद से जुड़ी थी। नंदिनी ने भी माना कि उसने सच छिपाकर गलती की थी, लेकिन उसका मकसद परिवार को धोखा देना नहीं था।

मामले की जांच आगे बढ़ती रही। पुराने बैंक रिकॉर्ड, दस्तावेज और तस्वीरें जांच का हिस्सा बन गए। कई साल पहले बंद हो चुका मामला अचानक फिर चर्चा में आ गया था।

सरोज ने बाद में नंदिनी से सिर्फ इतना कहा, "अगर तुमने शुरुआत में मुझे बता दिया होता तो शायद मैं तुम पर शक नहीं करती।"

नंदिनी ने जवाब दिया, "मुझे भी डर था कि सच बताने से पहले ही सब कुछ बिगड़ जाएगा।"

उस रात सरोज को पहली बार एहसास हुआ कि कभी-कभी परिवार के अंदर दिखाई देने वाला रहस्य वैसा नहीं होता जैसा पहली नजर में लगता है। जिस बहू पर उसे शक था, वही पुराने मामले का सच सामने लाने की कोशिश कर रही थी। लेकिन अब पुलिस के सामने एक नया सवाल था—सरोज के पति के कारोबार से आखिर वह रकम किसने निकाली थी और इतने वर्षों तक असली दस्तावेज किसने छिपाकर रखे थे?

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