साक्षी की शादी रजत से हुई थी। रजत एक दवा कंपनी में नौकरी करता था और काम के कारण महीने में कई बार तीन-चार दिनों के लिए शहर से बाहर रहता था।
घर में रजत की मां सावित्री और छोटा भाई अंशुल भी रहते थे।
कुछ महीनों से सावित्री एक बात गौर कर रही थीं।
रजत जब भी बाहर जाता, अंशुल देर रात तक साक्षी के कमरे के आसपास दिखाई देता।
कभी हाथ में कोई फाइल होती।
कभी मोबाइल।
कभी वह कमरे के अंदर चला जाता और दरवाजा बंद हो जाता।
शुरुआत में सावित्री ने ध्यान नहीं दिया।
लेकिन यह सिलसिला लगातार होने लगा।
सास के मन में पैदा हुआ शक
एक रात करीब साढ़े ग्यारह बजे सावित्री पानी लेने उठीं।
उन्होंने देखा कि अंशुल दबे पांव साक्षी के कमरे की तरफ जा रहा था।
उसके हाथ में एक काला बैग था।
अंशुल ने चारों तरफ देखा और कमरे में चला गया।
दरवाजा अंदर से बंद हो गया।
सावित्री वहीं रुक गईं।
उनके मन में तरह-तरह के सवाल उठने लगे।
उन्होंने रजत को फोन करने का सोचा, लेकिन फिर रुक गईं।
"बिना सबूत बेटे का घर क्यों खराब करूं?"
उन्होंने तय किया कि पहले खुद सच्चाई जानेंगी।
अगले दिन साक्षी से पूछा सवाल
सुबह सावित्री ने सामान्य तरीके से पूछा—
"अंशुल रात में तुम्हारे कमरे में क्यों आया था?"
साक्षी अचानक घबरा गई।
उसने कहा—
"कुछ जरूरी कागज देने आया था।"
"रात के साढ़े ग्यारह बजे?"
साक्षी चुप हो गई।
यही चुप्पी सावित्री का शक बढ़ाने के लिए काफी थी।
फिर रजत तीन दिनों के लिए बाहर चला गया
सावित्री अब सतर्क थीं।
पहली रात कुछ नहीं हुआ।
दूसरी रात करीब 12 बजे अंशुल फिर साक्षी के कमरे में गया।
इस बार सावित्री भी पीछे पहुंच गईं।
उन्होंने दरवाजे के बाहर कान लगाया।
अंदर से साक्षी की आवाज आई—
"अगर रजत को यह मिल गया तो सब खत्म हो जाएगा।"
अंशुल ने कहा—
"इसलिए आज ही इसे यहां से निकालना होगा।"
सावित्री के पैरों तले जमीन खिसक गई।
सास ने अचानक दरवाजा खोल दिया
दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं था।
सावित्री ने उसे धक्का दिया।
साक्षी और अंशुल दोनों चौंक गए।
सामने बिस्तर पर कई कागज फैले हुए थे।
वही काला बैग खुला पड़ा था।
और उसके पास नोटों की कुछ गड्डियां रखी थीं।
सावित्री ने गुस्से में पूछा—
"यह सब क्या चल रहा है?"
साक्षी की आंखों में डर साफ दिखाई दे रहा था।
अंशुल ने कहा—
"मां, जैसा आप सोच रही हैं वैसा कुछ नहीं है।"
सावित्री बोलीं—
"तो आधी रात को बंद कमरे में ये पैसे और कागज क्या कर रहे हैं?"
काले बैग में निकला चौंकाने वाला सामान
सावित्री ने बैग उठाया।
अंदर नकदी के अलावा कई संपत्ति दस्तावेज, बैंक की रसीदें और एक पुरानी डायरी थी।
डायरी रजत के दिवंगत पिता महेश की थी।
महेश की दो साल पहले अचानक मृत्यु हो गई थी।
सावित्री ने डायरी पहचान ली।
उन्होंने पूछा—
"यह तुम्हारे पास कहां से आई?"
अंशुल ने कहा—
"पिताजी की अलमारी के पीछे मिली थी।"
डायरी के आखिरी पन्नों पर था एक नाम
महेश ने अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले कई लेनदेन दर्ज किए थे।
एक ही व्यक्ति का नाम बार-बार लिखा था—
दिनेश मल्होत्रा।
वह महेश का पुराना कारोबारी साझेदार था।
लेकिन एक जगह महेश ने लिखा था—
"अगर मेरे साथ कुछ गलत होता है तो दुकान के पीछे वाले लॉकर की जांच जरूर करना।"
सावित्री के हाथ कांपने लगे।
उन्होंने वह लाइन दोबारा पढ़ी।
साक्षी और अंशुल इतने दिनों से क्या कर रहे थे?
साक्षी ने आखिरकार सच बताना शुरू किया।
कुछ महीने पहले उसे घर की सफाई के दौरान यह डायरी मिली थी।
उसने अंशुल को बताया।
दोनों ने रजत से इसलिए बात नहीं की क्योंकि रजत और दिनेश के बीच अब भी कारोबारी संबंध थे।
उन्हें डर था कि रजत बात पर विश्वास नहीं करेगा और सीधे दिनेश से पूछ बैठेगा।
इसलिए दोनों पहले सबूत जुटाना चाहते थे।
लेकिन नकदी कहां से आई?
सावित्री ने नोटों की तरफ इशारा किया।
"ये पैसे?"
अंशुल ने बताया कि पुराने लॉकर में उन्हें करीब दो लाख रुपये और कुछ बैंक रसीदें मिली थीं।
पैसों का स्रोत उन्हें भी पता नहीं था।
इसीलिए वे उन्हें पुलिस तक पहुंचाने से पहले सारे दस्तावेज जोड़ रहे थे।
सावित्री ने तुरंत कहा—
"अब एक मिनट भी नहीं। पुलिस को बुलाओ।"
पुलिस आई और मामला और उलझ गया
दस्तावेजों की प्रारंभिक जांच में कुछ रसीदें संदिग्ध मिलीं।
उनमें ऐसी कंपनियों के नाम थे जिनके बारे में परिवार ने कभी नहीं सुना था।
पुराने कारोबारी रिकॉर्ड निकलवाए गए।
कुछ रकम महेश के कारोबार से दूसरे खातों में भेजी गई थी।
लेकिन उन खातों का संबंध सीधे दिनेश से साबित नहीं हुआ।
पुलिस ने जांच जारी रखी।
तभी रजत अचानक घर लौट आया
उसे पुलिस के घर आने की जानकारी मिल चुकी थी।
वह रात में ही वापस पहुंच गया।
घर में पुलिस, मां, पत्नी और भाई को देखकर वह हैरान रह गया।
उसने पूछा—
"क्या हुआ है?"
सावित्री ने डायरी उसके हाथ में रख दी।
रजत ने आखिरी पन्ना पढ़ा।
उसके चेहरे का रंग बदल गया।
उसने कहा—
"यह डायरी आपको कहां मिली?"
अंशुल ने जवाब दिया—
"पिताजी की अलमारी से।"
रजत कुछ सेकंड तक चुप रहा।
रजत पहले से डायरी के बारे में जानता था
यही कहानी का सबसे बड़ा मोड़ था।
रजत ने स्वीकार किया कि पिता की मृत्यु के बाद उसने डायरी का एक हिस्सा देखा था।
लेकिन उसने किसी को नहीं बताया।
क्यों?
क्योंकि उसमें सिर्फ दिनेश का नाम नहीं था।
एक और व्यक्ति का नाम था...
रजत खुद।
साक्षी चौंक गई।
अब शक पति पर पहुंच गया
रजत ने बताया कि पिता ने उसके नाम से कई कारोबारी लेनदेन किए थे।
रजत को उनकी पूरी जानकारी नहीं थी।
उसे डर था कि डायरी सामने आई तो शक उसी पर जाएगा।
इसलिए वह चुप रहा।
पुलिस ने उसके बयान की जांच शुरू की।
बैंक रिकॉर्ड मंगाए गए।
पुराने खातों ने खोला असली खेल
जांच में सामने आया कि रजत के नाम का इस्तेमाल करके कुछ भुगतान जरूर किए गए थे।
लेकिन कई दस्तावेजों पर उसके हस्ताक्षर मेल नहीं खाते थे।
किसी ने उसके नाम का इस्तेमाल किया था।
फिर एक पुराने कर्मचारी का बयान सामने आया।
उसने बताया कि महेश को अपनी मृत्यु से कुछ महीने पहले कारोबार में गड़बड़ी का पता चल गया था।
वह रिकॉर्ड इकट्ठा कर रहे थे।
क्या महेश की मौत भी इसी से जुड़ी थी?
यही सबसे बड़ा सवाल था।
पुलिस ने उनकी पुरानी मेडिकल और अन्य उपलब्ध रिपोर्टों की दोबारा समीक्षा की।
लेकिन तत्काल ऐसा कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया जिससे उनकी मृत्यु को अपराध से जोड़ा जा सके।
इसलिए उस हिस्से को लेकर कोई जल्दबाजी में निष्कर्ष नहीं निकाला गया।
हालांकि वित्तीय गड़बड़ी की जांच आगे बढ़ी।
आखिर सामने आया असली आरोपी
लेनदेन की कड़ियां जोड़ने पर शक कंपनी के एक पुराने लेखा कर्मचारी प्रवीण पर गया।
उसके जरिए कुछ संदिग्ध खातों तक रकम पहुंची थी।
पूछताछ और दस्तावेजी जांच में वित्तीय हेराफेरी से जुड़े महत्वपूर्ण सुराग मिले।
जिस दिनेश पर परिवार शुरुआत से शक कर रहा था, कहानी उतनी सीधी नहीं निकली।
पुलिस ने सभी संबंधित लोगों की भूमिका अलग-अलग जांची।
सास को हुआ अपनी गलतफहमी का एहसास
जांच के बाद सावित्री ने साक्षी और अंशुल को देखा।
जिस दृश्य को देखकर उन्होंने कुछ और समझ लिया था...
उसकी सच्चाई बिल्कुल अलग निकली।
सावित्री ने साक्षी से कहा—
"तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?"
साक्षी ने जवाब दिया—
"मुझे डर था कि बात रजत तक पहुंची तो सारे सबूत गायब हो सकते हैं।"
अंशुल ने कहा—
"हम सिर्फ पिताजी की डायरी का सच जानना चाहते थे।"
अंत
पति के बाहर जाते ही देवर का भाभी के कमरे में जाना देखकर सास के मन में जो शक पैदा हुआ था, वह स्वाभाविक रूप से रिश्तों की तरफ गया।
आधी रात।
बंद कमरा।
काला बैग।
नकदी।
और छिपकर होने वाली बातचीत।
हर चीज किसी बड़े राज की तरफ इशारा कर रही थी।
लेकिन असलियत सामने आई तो मामला देवर-भाभी के रिश्ते का नहीं, बल्कि परिवार के पुराने कारोबार में छिपी वित्तीय गड़बड़ी का निकला।
और सबसे हैरान करने वाली बात—
जिस पति से दोनों पूरा मामला छिपा रहे थे, उसका नाम भी उसी रहस्यमयी डायरी में दर्ज था।
Post a Comment