देवेंद्र, अपनी बहू काव्या को लेकर पिछले कुछ महीनों से परेशान थे। उन्हें शक था कि काव्या का शहर के एक निजी चिकित्सक डॉ. नील से कोई छिपा हुआ रिश्ता है।
हालांकि उनके पास कोई ठोस सबूत नहीं था।
काव्या की शादी देवेंद्र के बेटे अंकित से हुई थी और दोनों का एक छोटा बेटा भी था। अंकित काम के सिलसिले में अक्सर दूसरे शहर में रहता था।
इसी दौरान देवेंद्र ने कई बार देखा कि काव्या रात में किसी से फोन पर धीमी आवाज में बात करती थी।
जब भी वह कमरे में जाते, काव्या फोन काट देती।
देवेंद्र का शक बढ़ता गया।
लेकिन असली कहानी उन्हें तब पता चली, जब एक रात करीब 1 बजे उन्हें घर की पिछली सीढ़ियों के पास किसी के चलने की आवाज सुनाई दी।
रात के अंधेरे में कौन आया था?
देवेंद्र ने कमरे का दरवाजा थोड़ा खोलकर बाहर देखा।
एक आदमी चुपचाप घर के अंदर जा रहा था।
चेहरा साफ नहीं दिखाई दे रहा था।
वह सीधे काव्या के कमरे की तरफ बढ़ा।
देवेंद्र को लगा कि आखिर उनका शक सही निकला।
उन्होंने तुरंत बेटे अंकित को फोन किया।
लेकिन अंकित का फोन बंद था।
देवेंद्र ने उस आदमी का पीछा करने का फैसला किया।
वह काव्या के कमरे के बाहर पहुंचे तो अंदर से आवाज आई—
"आपको आज यहां नहीं आना चाहिए था।"
देवेंद्र चौंक गए।
यह काव्या की आवाज थी।
लेकिन दूसरी आवाज सुनकर वह और ज्यादा हैरान हो गए।
वह आवाज डॉक्टर नील की नहीं थी।
दरवाजा खुला तो सामने आया पहला रहस्य
देवेंद्र ने दरवाजा खोल दिया।
काव्या और सामने खड़ा आदमी दोनों घबरा गए।
देवेंद्र ने गुस्से में पूछा—
"यह कौन है?"
काव्या कुछ नहीं बोली।
उस आदमी ने अपना नाम राघव बताया।
देवेंद्र उसे पहचानते नहीं थे।
लेकिन राघव ने जेब से एक पुरानी तस्वीर निकालकर उनके सामने रख दी।
तस्वीर में देवेंद्र का बेटा अंकित करीब दस साल पहले दिखाई दे रहा था।
उसके साथ राघव भी खड़ा था।
देवेंद्र ने पूछा—
"तुम अंकित को कैसे जानते हो?"
राघव ने कहा—
"मैं सिर्फ अंकित को नहीं जानता... मैं उस रात को भी जानता हूं, जिसके बारे में आपके परिवार को कभी सच नहीं बताया गया।"
दस साल पुराना मामला
राघव ने बताया कि दस साल पहले अंकित और उसके कुछ दोस्त एक सड़क दुर्घटना में फंस गए थे।
उस हादसे में एक व्यक्ति की मौत हुई थी।
मामला दुर्घटना मानकर बंद कर दिया गया।
लेकिन राघव के पास मौजूद दस्तावेजों के मुताबिक वह सामान्य दुर्घटना नहीं थी।
जिस गाड़ी से हादसा हुआ था, उसके चालक की पहचान बदल दी गई थी।
और उस समय किसी ने पुलिस को गलत जानकारी दी थी।
देवेंद्र के चेहरे का रंग उड़ गया।
उन्होंने पूछा—
"अंकित इसमें कैसे शामिल है?"
राघव ने कहा—
"अंकित गाड़ी नहीं चला रहा था। लेकिन वह उस रात वहां मौजूद था।"
फिर काव्या इस मामले में क्यों शामिल थी?
देवेंद्र को अब भी समझ नहीं आ रहा था कि काव्या और राघव के बीच क्या संबंध था।
काव्या ने आखिरकार बताया कि कुछ महीने पहले उसे अंकित के पुराने सामान में एक डायरी मिली थी।
डायरी में उसी हादसे का जिक्र था।
उसे लगा कि अंकित ने वर्षों से परिवार से एक बड़ी बात छिपा रखी है।
काव्या ने राघव को इसलिए बुलाया था क्योंकि वह उस घटना का प्रत्यक्ष गवाह था।
डॉक्टर नील से उसका कोई प्रेम संबंध नहीं था।
वह वास्तव में नील से अंकित के पुराने मेडिकल रिकॉर्ड के बारे में जानकारी ले रही थी।
लेकिन सबसे बड़ा झटका अभी बाकी था
राघव ने बताया कि उस हादसे के बाद एक व्यक्ति ने अंकित को धमकी देकर चुप करा दिया था।
अगर वह सच बताता तो परिवार को नुकसान पहुंचाने की धमकी दी गई थी।
काव्या को यह बात डायरी से पता चली थी।
लेकिन उसे यह नहीं पता था कि वह व्यक्ति आज भी उनके परिवार के आसपास मौजूद है।
देवेंद्र ने पूछा—
"कौन?"
राघव ने जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली।
तस्वीर देखते ही देवेंद्र के हाथ कांपने लगे।
उस तस्वीर में वही व्यक्ति था जो पिछले कई वर्षों से उनके परिवार का सबसे करीबी दोस्त बना हुआ था।
अचानक घर की बिजली चली गई
उसी समय पूरे घर की बिजली चली गई।
काव्या ने खिड़की से बाहर देखा।
सड़क पर एक काली गाड़ी खड़ी थी।
राघव ने धीमी आवाज में कहा—
"वह हमें ढूंढते हुए यहां पहुंच गया है।"
देवेंद्र को पहली बार एहसास हुआ कि मामला सिर्फ दस साल पुराने हादसे का नहीं था।
कोई अब भी उस सच को दबाना चाहता था।
सुबह पुलिस तक पहुंचा पूरा मामला
काव्या, देवेंद्र और राघव ने पुराने दस्तावेज पुलिस को सौंप दिए।
जांच शुरू हुई।
दस साल पुराने रिकॉर्ड फिर से निकाले गए।
वाहन के कागजों, पुराने फोन रिकॉर्ड और बैंक लेनदेन की जांच की गई।
धीरे-धीरे सामने आया कि दुर्घटना से पहले कुछ लोगों के बीच बड़ी रकम का लेनदेन हुआ था।
जिस व्यक्ति पर राघव ने शक जताया था, उससे भी पूछताछ की गई।
अंत में खुला असली सच
जांच में पता चला कि दुर्घटना के बाद सबूत बदलने की कोशिश की गई थी।
अंकित उस घटना का मुख्य आरोपी नहीं था, लेकिन उसने डर के कारण वर्षों तक पूरी सच्चाई नहीं बताई थी।
काव्या ने जब पुराने दस्तावेज खोजे तो उसने मामले को दोबारा सामने लाने की कोशिश की।
देवेंद्र को जिस चीज का शक था, वह पूरी तरह गलत निकला।
जिसे वह बहू का प्रेम प्रसंग समझ रहे थे, वह असल में दस साल पुराने अपराध का सच खोजने की कोशिश थी।
अंत
कुछ दिनों बाद अंकित घर लौटा।
उसने काव्या से कहा—
"तुमने मुझसे यह सब छिपाकर बहुत बड़ा जोखिम लिया।"
काव्या ने जवाब दिया—
"क्योंकि तुमने भी मुझसे दस साल पुराना सच छिपाया था।"
देवेंद्र चुपचाप दोनों को देखते रहे।
उन्हें समझ आ चुका था कि शक कितनी आसानी से रिश्तों को गलत दिशा में ले जा सकता है।
जिस रात उन्हें लगा था कि उनकी बहू किसी दूसरे पुरुष से मिलने वाली है...
उसी रात उनके घर में दस साल पुराने अपराध का सबसे बड़ा सबूत पहुंचा था।
और जिस आदमी पर उन्हें शक था, वह प्रेमी नहीं...
उस रात का गवाह था।
यह कहानी भारतीय क्राइम रिपोर्टिंग में दिखने वाले पारिवारिक रिश्ते, छिपे संबंध के शक, पुराने अपराध और जांच के दौरान खुलते सबूत वाले पैटर्न से प्रेरित है; ऐसी वास्तविक घटनाओं में ससुर-बहू, प्रेमी और हत्या/साजिश जैसे रिश्तों के एंगल सामने आए हैं।
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