एक समय मे वासदत्ता मथुरा की सबसे सुंदर गणिका थी। हर कोई उसे पाने के लिए मुह मांगा धन दे देता था। दूर दूर के नगरों तक वासदत्ता के रूप, नृत्य और गुणों की चर्चा थी। उन्ही दिनों भिक्षु उपगुप्त धार्मिक सभाएं करते हुए मथुरा पहुँचे और अनुनायियों के आग्रह पर शहर में कुछ दिन प्रवास करने का मन बना लिया।
एक दिन वासदत्ता भी उसी मार्ग से गुजरी और उपगुप्त के चेहरे का तेज और सौंदर्य देखकर मोहित हो गई। जिस पर नगर के बड़े बड़े धनी लौलुप थे वो उपगुप्त को पाना चाहती थी।
सो उसने उपगुप्त को बुलावा भिजवाया।
उपगुप्त नहीं गए...
वासदत्ता खुद उन्हें लेने आई और साथ चलने का आग्रह किया तब उपगुप्त ने भविष्य का कुछ विचार करते हुए उसे वचन दिया "वर्तमान में तुम जिस किसी को इशारा करोगी हर कोई तुम्हारी जरूरतें पूरी करने के लिए सहर्ष आगे आ जायेगा पर मैं उस दिन तुम्हारे घर आऊंगा जब वास्तव में तुम्हे मेरी जरूरत होगी"
समय बीता और नगर में भारी प्लेग फेल गया।
लोग महामारी की चपेट में आने लगे। गणिकाएं भी अछूती नहीं रही। लोगों ने गणिकाओं के यहाँ जाना बंद कर दिया और अचानक वासदत्ता भी प्लेग और कोढ़ से ग्रसित हो गई कोई एक बूंद पानी तक देने को तैयार नहीं था।
तब उपगुप्त आये और उस बीमार गणिका की सेवा की।
वो उसके सौंदर्य पर मोहित नहीं हुए पर उसके अंदर छिपे मानवीय मन को छू गए।
वासदत्ता को अब ज्ञात हो चुका था वास्तव में उसका रूप लोगों की वासना मिटाने का एक साधन मात्र था जबकि उपगुप्त ने वासना से परे जाकर तब उसे स्पर्श किया जब निष्काषित कर दी गई थी।
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