सबसे पहले माता लक्ष्मी जी ने राजा बलि को राखी बांधी थी।

रक्षाबंधन से जुड़ी एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा में माता लक्ष्मी और राजा बलि का प्रसंग मिलता है।

कथा के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी और दो पग में पृथ्वी तथा स्वर्ग नाप लिया, तब तीसरे पग के लिए बलि ने अपना सिर अर्पित कर दिया। भगवान विष्णु उनकी भक्ति और दानशीलता से प्रसन्न होकर पाताल लोक में बलि के द्वारपाल बन गए।

माता लक्ष्मी भगवान विष्णु को वापस लाना चाहती थीं। वे एक साधारण स्त्री के रूप में राजा बलि के पास गईं और उन्हें राखी बाँधकर अपना भाई बनाया। बलि ने बहन से उपहार माँगने को कहा। तब माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को अपने साथ ले जाने का वर माँगा।

राजा बलि ने बहन की इच्छा स्वीकार कर भगवान विष्णु को उनके साथ जाने दिया। इसी कारण इस कथा को राखी के पर्व में भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और रक्षा के प्रतीक के रूप में सुनाया जाता है।

ध्यान दें: यह कथा मुख्यतः राखी/रक्षाबंधन की लोक-परंपरा और बाद की पौराणिक कथाओं में प्रसिद्ध है; अलग-अलग ग्रंथों और परंपराओं में इसके विवरण अलग मिलते हैं।

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