बहुत समय पहले की बात है। एक शक्तिशाली राजा ने पड़ोसी राज्य पर युद्ध किया और अंततः उसे हरा दिया।
जीत के बाद राजा के मन में अपने खजाने को और भरने का लालच जागा। उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया—
“जाओ, उस राज्य में जितना धन-संपत्ति मिले, सब लेकर आओ। सोना, चांदी, अशर्फियां, हीरे-जवाहरात… कुछ भी मत छोड़ना।”
राजा का आदेश मिलते ही सैनिक उस राज्य में फैल गए।
कुछ सैनिक बड़े-बड़े संदूक उठाकर लाए। किसी के पास सोने की अशर्फियां थीं तो कोई चांदी के बर्तन और आभूषण लेकर आया। किसी ने कीमती रत्नों से भरी थैलियां लाकर राजा के सामने रख दीं।
दरबार में खुशी का माहौल था।
राजा एक-एक सैनिक को देखकर प्रसन्न हो रहा था।
वह कहता—
“शाबाश! तुमने मेरे राज्य का खजाना भर दिया।”
तभी दरबार के बाहर से एक सैनिक आया।
लेकिन उसके हाथ में न सोने की बोरी थी, न हीरे-जवाहरात की थैली।
उसके साथ एक अधेड़ उम्र का व्यापारी था।
राजा ने व्यापारी को देखते ही भौंहें चढ़ा लीं।
उसने सैनिक से पूछा—
“यह क्या है? मैंने तुम्हें धन-संपत्ति लाने के लिए भेजा था और तुम एक आदमी को पकड़कर ले आए?”
सैनिक ने सिर झुकाकर कहा—
“जी महाराज।”
राजा गुस्से में बोला—
“क्या तुम्हें मेरा आदेश समझ नहीं आया था? बाकी सैनिक देखो, कोई सोना ला रहा है, कोई चांदी और कोई हीरे। तुम क्या लेकर आए हो?”
सैनिक ने बड़ी शांति से जवाब दिया—
“महाराज, मैं आपके लिए इस राज्य की सबसे कीमती चीज लेकर आया हूं।”
राजा ने हैरानी से व्यापारी की तरफ देखा।
“इस आदमी में ऐसा क्या खास है?”
सैनिक बोला—
“महाराज, बाकी सैनिक जो धन लेकर आए हैं, वह एक दिन खत्म हो जाएगा। सोना खर्च होगा, चांदी बिक जाएगी और हीरे-जवाहरात भी एक दिन खजाने से निकल जाएंगे।”
राजा ध्यान से उसकी बात सुनने लगा।
सैनिक ने आगे कहा—
“लेकिन यह आदमी जिस जगह रहेगा, वहां धन पैदा करता रहेगा।”
राजा अब थोड़ा उत्सुक हो चुका था।
उसने पूछा—
“तुम कहना क्या चाहते हो?”
सैनिक ने व्यापारी की ओर इशारा करते हुए कहा—
“महाराज, यह कोई साधारण सेठ नहीं है। इसे धन कमाने की कला आती है। इसे व्यापार की समझ है। बाजार की पहचान है। लोगों का भरोसा जीतना आता है। यह खाली हाथ भी किसी शहर में चला जाए तो कुछ समय बाद अपना कारोबार खड़ा कर सकता है।”
फिर सैनिक मुस्कुराया और बोला—
“महाराज, आपने अंडे मांगे थे… मैं मुर्गी ही ले आया।”
पूरा दरबार कुछ पल के लिए शांत हो गया।
राजा सैनिक को देखता रह गया।
उसने पहली बार महसूस किया कि सैनिक की बात में गहरी सच्चाई थी।
अब राजा ने उस व्यापारी से पूछा—
“सेठ, अगर तुम्हारे पास एक भी अशर्फी न हो तो क्या तुम दोबारा व्यापार खड़ा कर सकते हो?”
सेठ ने विनम्रता से कहा—
“महाराज, धन मेरे लिए साधन है, असली पूंजी मेरी समझ और अनुभव है। पैसा चला जाए तो मेहनत और बुद्धि से दोबारा कमाया जा सकता है।”
राजा को यह जवाब बहुत पसंद आया।
उसने पूछा—
“और अगर तुम्हें पूरे राज्य का व्यापार संभालने की जिम्मेदारी दे दी जाए?”
सेठ ने सिर झुकाकर कहा—
“अगर महाराज का विश्वास मिला तो पूरी ईमानदारी से प्रयास करूंगा।”
राजा मुस्कुराया।
उसने सैनिक की ओर देखा और कहा—
“आज तुमने मुझे एक ऐसी बात सिखाई है जो मेरे खजाने में मौजूद किसी हीरे से ज्यादा कीमती है।”
फिर राजा ने उसी समय घोषणा कर दी—
“आज से यह सैनिक हमारे राज्य का महामंत्री होगा।”
इसके बाद राजा ने उस व्यापारी को भी अपने दरबार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंप दी और उसे राज्य की आर्थिक व्यवस्था संभालने का काम दिया।
दरबार में मौजूद वे सैनिक, जो सुबह तक सोने-चांदी की बोरियां लेकर अपनी जीत पर गर्व कर रहे थे, अब उस सैनिक को देखकर सोच रहे थे।
उन्होंने बहुत सारा धन लूटा था।
लेकिन उस सैनिक ने धन पैदा करने वाला इंसान ढूंढ लिया था।
और राजा समझ चुका था कि—
खजाना कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसे बढ़ाने और संभालने वाला हुनरमंद इंसान उससे कहीं ज्यादा कीमती होता है।
कहानी की सीख
पैसा खो जाए तो दोबारा कमाया जा सकता है, लेकिन हुनर, अनुभव और काबिलियत रखने वाला इंसान हर किसी को नहीं मिलता।
सोना-चांदी सिर्फ संपत्ति है, लेकिन हुनरमंद इंसान वह पूंजी है जो संपत्ति पैदा कर सकती है।
इसलिए किसी व्यक्ति की कीमत सिर्फ उसके पास मौजूद पैसों से नहीं, बल्कि उसकी काबिलियत, बुद्धि, अनुभव और कुछ नया खड़ा करने की क्षमता से समझनी चाहिए।
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