रात के करीब 1 बजकर 43 मिनट हुए थे।
सिया अपने कमरे में सो रही थी। उसका पति निखिल काम के सिलसिले में दो दिनों के लिए शहर से बाहर गया था।
अचानक दरवाजे पर जोर-जोर से दस्तक हुई।
सिया घबराकर उठी।
बाहर से किसी पुरुष की घबराई हुई आवाज आई—
"भाभी... दरवाजा खोलिए। जल्दी। मुझे अंदर छिपा लीजिए।"
सिया ने आवाज पहचानी।
वह करण था।
करण उसके पति निखिल का सबसे करीबी दोस्त था।
सिया ने दरवाजे के पास जाकर पूछा—
"करण? इतनी रात को क्या हुआ?"
बाहर से जवाब आया—
"मेरे पीछे पुलिस है। दरवाजा नहीं खोला तो मैं फंस जाऊंगा।"
सिया के हाथ कांपने लगे।
उसने दरवाजा खोल दिया।
करण तेजी से अंदर आया और उसके हाथ में पकड़ा काला बैग फर्श पर रख दिया।
उसके चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।
बैग में क्या था?
सिया ने दरवाजा बंद किया।
बाहर सड़क पर गाड़ियों की आवाज सुनाई दे रही थी।
करण ने फुसफुसाकर कहा—
"लाइट बंद कर दीजिए।"
सिया ने पूछा—
"तुमने ऐसा क्या किया है कि पुलिस तुम्हारे पीछे है?"
करण ने कोई जवाब नहीं दिया।
बस बैग को अपनी तरफ खींच लिया।
तभी बाहर दरवाजे पर फिर दस्तक हुई।
इस बार आवाज पुलिस की थी।
"दरवाजा खोलिए। हमें करण नाम के व्यक्ति की तलाश है।"
सिया का चेहरा सफेद पड़ गया।
उसने करण की तरफ देखा।
करण ने हाथ जोड़कर इशारा किया—
"कुछ मत कहना।"
पुलिस के जाने के बाद करण ने खोला मुंह
करीब पांच मिनट बाद बाहर की आवाजें बंद हो गईं।
करण ने राहत की सांस ली।
सिया ने गुस्से में कहा—
"अब मुझे पूरी बात बताओ।"
करण ने बैग खोला।
अंदर कुछ पुराने दस्तावेज, एक मोबाइल फोन और कई तस्वीरें थीं।
सिया ने तस्वीरें उठाईं।
एक तस्वीर देखकर वह चौंक गई।
उसमें उसका पति निखिल दिखाई दे रहा था।
लेकिन तस्वीर करीब छह साल पुरानी थी।
निखिल एक पुराने गोदाम के सामने खड़ा था।
उसके साथ दो और लोग थे।
सिया ने पूछा—
"यह क्या है?"
करण ने कहा—
"यही वजह है कि मैं आज रात यहां आया हूं।"
छह साल पुराना रहस्य
करण ने बताया कि छह साल पहले वह और निखिल एक छोटी परिवहन कंपनी में काम करते थे।
एक रात कंपनी के गोदाम से महंगे इलेक्ट्रॉनिक सामान का एक बड़ा माल गायब हो गया था।
सारा शक निखिल पर गया।
लेकिन निखिल ने कहा था कि वह निर्दोष है।
मामला कुछ समय बाद दब गया।
करण ने नौकरी छोड़ दी।
निखिल भी दूसरी जगह चला गया।
लेकिन कुछ महीने पहले करण को पुराने दस्तावेजों में कुछ ऐसा मिला जिससे उसे लगा कि उस चोरी के पीछे असली कहानी कुछ और थी।
काले बैग में था सबूत
करण ने बताया कि बैग में उसी पुराने मामले से जुड़े दस्तावेज थे।
कुछ बैंक लेनदेन की प्रतियां।
कुछ तस्वीरें।
और एक पुराना मोबाइल।
सिया ने पूछा—
"इस फोन में क्या है?"
करण ने कहा—
"एक रिकॉर्डिंग।"
उसने मोबाइल चालू किया।
रिकॉर्डिंग में तीन लोगों की आवाजें थीं।
एक आवाज निखिल की लग रही थी।
सिया के चेहरे का रंग उड़ गया।
क्या निखिल भी उस अपराध में शामिल था?
सिया ने करण से पूछा—
"अगर निखिल इसमें शामिल था तो तुम उसके दोस्त होकर यह सब मेरे पास क्यों लाए?"
करण ने कहा—
"क्योंकि रिकॉर्डिंग पूरी सुनोगी तो कहानी बदल जाएगी।"
रिकॉर्डिंग आगे चली।
निखिल की आवाज सुनाई दी—
"मैं यह काम नहीं करूंगा। किसी निर्दोष को फंसाना गलत है।"
फिर दूसरी आवाज आई—
"अगर तुमने मुंह खोला तो तुम्हारा परिवार भी सुरक्षित नहीं रहेगा।"
रिकॉर्डिंग वहीं खत्म हो गई।
सिया कुछ समझ नहीं पा रही थी।
करण ने बताया असली बात
करण ने कहा—
"निखिल उस रात अपराध रोकने की कोशिश कर रहा था।"
लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं हुआ।
जिस व्यक्ति ने चोरी की योजना बनाई थी, उसने सारा दोष निखिल पर डालने की कोशिश की।
निखिल ने अपने परिवार को खतरे से बचाने के लिए चुप रहना चुना।
करण ने भी वर्षों तक कुछ नहीं बताया।
लेकिन अब उसे वही लोग दोबारा धमका रहे थे।
फिर पुलिस करण के पीछे क्यों थी?
सिया का अगला सवाल यही था।
करण ने कहा—
"पुलिस मुझे अपराधी समझकर नहीं, पूछताछ के लिए ढूंढ रही थी।"
सिया ने हैरानी से पूछा—
"तो तुमने मुझसे झूठ क्यों कहा?"
करण ने सिर झुका लिया।
"क्योंकि मुझे डर था कि मेरे पीछे जो लोग हैं, वे पुलिस से पहले मुझे ढूंढ लेंगे।"
उसने बताया कि जिस पुराने गोदाम में चोरी हुई थी, वहां से हाल ही में एक नया सबूत मिला था।
वही सबूत इस बैग में था।
लेकिन तभी फोन बजा
अचानक बैग में रखा पुराना मोबाइल बज उठा।
दोनों चौंक गए।
स्क्रीन पर कोई नंबर नहीं था।
सिर्फ लिखा था—
"UNKNOWN"
करण ने फोन उठाया।
दूसरी तरफ कुछ सेकंड खामोशी रही।
फिर आवाज आई—
"बैग पुलिस को दे दो। वरना अगली बार तुम्हारे घर नहीं, तुम्हारे दोस्त के घर आएंगे।"
फोन कट गया।
सिया ने तुरंत निखिल को फोन किया।
लेकिन उसका फोन बंद था।
अब उसे करण की बात पर पूरा विश्वास हो चुका था।
सुबह सामने आया असली सच
करण और सिया ने सारे दस्तावेज पुलिस को सौंप दिए।
जांच शुरू हुई।
पुराने बैंक रिकॉर्ड और तस्वीरों की जांच हुई।
रिकॉर्डिंग की आवाज की भी जांच कराई गई।
धीरे-धीरे पता चला कि छह साल पहले हुई चोरी में निखिल का इस्तेमाल सिर्फ एक मोहरे की तरह किया गया था।
असली रकम किसी और खाते में गई थी।
और उस खाते का संबंध उस व्यक्ति से था जो उस समय कंपनी के वित्तीय कामकाज को संभालता था।
निखिल ने इतने साल चुप्पी क्यों साधी?
जब निखिल वापस आया तो सिया ने उससे सीधे सवाल किया।
निखिल ने कहा—
"मुझे डर था कि अगर मैंने सच बताया तो तुम्हें भी खतरा हो सकता है।"
सिया ने कहा—
"लेकिन तुमने मुझे अंधेरे में रखा।"
निखिल बोला—
"मैं तुम्हें बचाना चाहता था।"
सिया ने जवाब दिया—
"किसी रिश्ते में डर से ज्यादा जरूरी भरोसा होता है।"
निखिल ने सिर झुका लिया।
आखिरी मोड़
जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि जिस व्यक्ति ने छह साल पहले चोरी की योजना बनाई थी, वही पिछले कुछ महीनों से करण को धमका रहा था।
उसका मकसद था—
पुराने सबूत हमेशा के लिए खत्म करना।
लेकिन करण के पास मौजूद बैग ने पूरी कहानी बदल दी।
पुराने मामले की दोबारा जांच शुरू हुई।
निखिल पर लगा शक भी साफ हो गया।
और छह साल से दबा अपराध आखिरकार सामने आ गया।
उस रात सिया को लगा था कि उसके पति का दोस्त किसी अपराध से भागकर उसके घर आया है।
लेकिन सुबह होते-होते उसे पता चला कि करण खुद अपराधी नहीं था।
वह तो छह साल पुराने अपराध का आखिरी गवाह और सबसे महत्वपूर्ण सबूत लेकर भाग रहा था।
और वह काला बैग?
उसमें सिर्फ कागज नहीं थे।
उसमें तीन परिवारों को सालों से परेशान कर रहा एक ऐसा सच बंद था, जिसे बाहर आने में छह साल लग गए।
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