गाँव के बड़े से मकान में रहता था रामअवतार—एक विधुर, जिसकी उम्र करीब 60 साल थी। उसका बेटा संजय शहर में नौकरी करता था और उसकी बहू सीमा घर संभालती थी। संजय महीने में एक-दो बार ही घर आता था। बाकी वक्त सीमा अकेले ससुर के साथ। रामअवतार बाहर से सबको बहुत सीधा-सादा लगता था, लेकिन अंदर से वह एक ऐसा इंसान था, जिसकी नज़रें अपनी बहू पर बुरी तरह टिकी थीं।
पहले-पहले सीमा को कुछ अजीब लगता था, लेकिन वह नज़रअंदाज कर देती थी। जब वह रसोई में काम करती, ससुर किसी बहाने से वहाँ से गुज़र जाते। जब वह आँगन में पोछा लगाती, तो वह उसके पीछे खड़े होकर उसे घूरते। सीमा को बहुत बुरा लगता, लेकिन वह घर-गृहस्थी का मामला समझकर पति को कुछ नहीं बताती थी। उसे डर था कि कहीं वह उसे दब्बू न समझ ले।
एक दिन सीमा नहाने के लिए गई। घर में कोई नहीं था, लेकिन रामअवतार बाहर से आकर किसी बहाने से उसके कमरे के पास गया। नहाने के कमरे का दरवाज़ा पूरी तरह बंद नहीं था—ऊपर से थोड़ी जगह खुली थी। रामअवतार ने उस जगह से झाँका और सीमा को नहाते हुए देखा। उसके बुरे ख़यालात और बढ़ गए।
कुछ दिनों बाद जब सीमा आँगन में पोछा लगा रही थी, तो रामअवतार उसके पीछे आ गया और किसी और काम की बहाने से उसके पास खड़ा हो गया। उसने सीमा को ज़मीन पर झुककर पोछा लगाते देखा और उसके शरीर पर गंदी नज़रें दौड़ाने लगा। सीमा को एहसास हुआ, उसने अपना काम रोका और बिना कुछ बोले कमरे में चली गई। उसका मन बहुत उदास था। वह पूरी तरह से परेशान हो चुकी थी, लेकिन फिर भी पति को कुछ नहीं बताया।
एक दिन रामअवतार ने बहुत आगे बढ़ गया। रात को जब सीमा रसोई में खाना बना रही थी, तो उसने आकर उसका हाथ पकड़ा और उसे गंदी बातें कही। उसने कहा, "बहू, मैं तो बहुत दिनों से तुझे देख रहा हूँ। बेटा तो यहाँ आता भी नहीं, तू अकेली है। मुझे अकेला मत छोड़।" सीमा के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसने अपना हाथ छुड़ाया और कमरे में जाकर दरवाज़ा बंद कर लिया। उस रात उसे नींद नहीं आई। उसने सोचा कि अब वह चुप नहीं रहेगी।
अगले दिन सीमा ने अपने पति संजय को कॉल किया और सारी बात बताई। पहले संजय को यकीन नहीं हुआ, लेकिन जब सीमा ने रोते-रोते सब कुछ विस्तार से बताया, तो वह सन्न रह गया। उसने कहा, "मैं कल ही आ रहा हूँ।"
संजय जब घर आया, तो उसने अपने पिता से बात की। रामअवतार ने सब कुछ नकार दिया और कहा कि सीमा झूठ बोल रही है, वह उससे दूर रहना चाहती है, इसलिए ऐसा कह रही है। संजय दोनों के बीच फंस गया। उसे नहीं पता था कि किस पर भरोसा करे, लेकिन सीमा की आँखों में आँसू देखकर उसने फैसला किया कि वह सीमा का साथ देगा। उसने सीमा को कहा कि वह उसे अपने साथ शहर ले जाएगा और वे अलग रहेंगे। रामअवतार को जब यह पता चला, तो वह बौखला गया। उसने संजय को धमकी दी कि अगर वह ऐसा किया, तो उसे विरासत में कुछ नहीं मिलेगा।
लेकिन संजय अपने फैसले पर अडिग रहा। वह सीमा को लेकर शहर चला गया। कुछ दिनों के बाद रामअवतार अकेला पड़ गया। उसे अपनी करतूत पर पछतावा हुआ, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उसकी बहू और बेटा दोनों उससे दूर हो चुके थे। अब वह अपने बड़े-से-बड़े मकान में अकेले बैठा अपनी गलती पर पछताता रहता है, लेकिन गाँव के लोग अब भी फुसफुसाते हैं कि रामअवतार ने अपनी ही बहू के साथ ऐसा क्यों किया।
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