एक समय की बात है। बनवारी लाल नाम के एक व्यापारी अपने इलाके में अपनी समझदारी और सूझ-बूझ के लिए जाने जाते थे। उनकी कपड़ों की अच्छी-खासी दुकान थी और व्यापार भी खूब चलता था।
एक दिन दोपहर के समय बनवारी लाल खाना खाकर अपनी दुकान की गद्दी पर बैठे ही थे कि उधर से एक अजनबी व्यक्ति गुजर रहा था।
उसने बनवारी लाल को देखा और मन ही मन सोचा—
“अच्छा-खासा खाते-पीते सेठ हैं। अभी खाने का समय भी है। क्यों न आज इनके यहां मुफ्त में भोजन का इंतजाम किया जाए?”
वह तुरंत दुकान पर आया और हाथ जोड़कर बोला—
“जय गोपाल की!”
बनवारी लाल ने भी मुस्कुराकर जवाब दिया—
“जय गोपाल की! आइए सेठ जी, बैठिए। पानी पिएंगे?”
अजनबी बोला—
“पानी भी पीऊंगा और भोजन भी करूंगा। भोजन के बाद आपसे धंधे की कुछ बातें भी करनी हैं।”
बनवारी लाल उसकी बात सुनकर समझ गए कि यह कोई व्यापारी नहीं, बल्कि मुफ्त का भोजन पाने की कोशिश कर रहा है।
लेकिन उन्होंने उसे सीधे मना नहीं किया।
उन्होंने अपने नौकर हरिया को बुलाया और कहा—
“हरिया, देखो! सेठ जी बहुत दूर से आए हैं। इनके लिए भोजन की अच्छी व्यवस्था करो।”
यह सुनकर ठग मन ही मन बहुत खुश हुआ।
उसने सोचा—
“वाह! आज तो शुद्ध घी का खाना पक्का है।”
कुछ देर बाद उसके सामने खाना आया।
दाल, चावल और दो रोटियां देखकर ठग ने पूछा—
“सेठ जी, शुद्ध घी नहीं है क्या?”
बनवारी लाल ने बड़ी गंभीरता से कहा—
“अरे सेठ जी, आप भी व्यापारी हैं। आजकल बाजार में घी में बहुत मिलावट है। हमारे यहां शुद्ध घी घर पर रखा है। लेकिन उसका एक नियम है।”
ठग ने उत्सुकता से पूछा—
“कैसा नियम?”
बनवारी लाल बोले—
“जो नया व्यापारी हमारे साथ धंधा करना चाहता है, वह पहले एक दिन हमारे साथ काम करता है। उसके बाद ही उसे हमारे शुद्ध घी के भंडार के दर्शन होते हैं।”
ठग ने सोचा—
“एक दिन काम करने में क्या जाता है? इसके बाद रोज शुद्ध घी का खाना मिलेगा।”
वह तुरंत तैयार हो गया।
बनवारी लाल ने कहा—
“तो आज आप दुकान के बाहर खड़े होकर ग्राहकों को बुलाइए। आप बड़े सयाने लगते हैं, यह काम आप अच्छी तरह कर लेंगे।”
अब ठग फंस चुका था।
पूरे दिन वह दुकान के बाहर धूप में खड़ा होकर ग्राहकों को आवाज लगाता रहा—
“आइए जी! बनवारी लाल की दुकान पर सस्ता कपड़ा!”
सुबह का मुफ्त भोजन पाने के चक्कर में वह शाम तक मेहनत करता रहा।
गला सूख गया, शरीर पसीने से तर हो गया और आवाज तक बैठने लगी।
शाम को बनवारी लाल ने उससे कहा—
“वाह सेठ जी! आज तो आपने मेरी बिक्री बढ़ा दी। अब भोजन कर लीजिए।”
ठग खुशी से बैठ गया।
लेकिन जब थाली सामने आई तो उसमें फिर वही दाल, चावल और रोटी थी।
घी गायब था।
ठग का पारा चढ़ गया।
वह बोला—
“ये क्या मजाक है? शुद्ध घी कहां है?”
इस बार बनवारी लाल जोर से हंस पड़े।
उन्होंने कहा—
“अरे ठग जी! मैं तो सुबह ही समझ गया था कि आप व्यापारी नहीं, मुफ्त का भोजन खाने आए हैं।”
ठग चुप हो गया।
बनवारी लाल ने आगे कहा—
“आपने मुफ्त के भोजन का जुगाड़ करना चाहा था, मैंने आपके लिए काम का जुगाड़ कर दिया। आज आपने मेरी दुकान के लिए मेहनत की और बदले में आपको भोजन मिल गया। इससे बड़ा सौदा और क्या चाहिए?”
ठग के पास अब कोई जवाब नहीं था।
वह शर्मिंदा होकर वहां से चला गया।
कुछ ही समय में पूरे बाजार में यह बात फैल गई कि मुफ्त का खाना खाने आया ठग खुद ही पूरे दिन काम करके चला गया।
कहानी की सीख
मुफ्त में पाने की लालच अक्सर इंसान से उससे कहीं ज्यादा कीमत वसूल कर लेती है।
मेहनत से कमाया हुआ साधारण भोजन भी उस भोजन से बेहतर है, जिसके लिए किसी को छल या धोखा देना पड़े।
मेहनत की कमाई में ही असली स्वाद और सम्मान है।
ये थी Class 6 की किताब की बनवारी लाल की पूरी कहानी - कैसी लगी? कमेंट में बताओ!
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